24 July 2008

तो ये क्या कुछ कम है

इस गहराई में आकर महसूस किया
ऊंचाई तो बहुत दूर है
अगर कोशिश कर
समतल को ही पा लें
तो ये क्या कुछ कम है
सागर मंथन में विष-अमृत
क्या कुछ नहीं निकला
हम भी आत्ममंथन कर लें
मन के सागर के
अमृत को पा लें
अपने ज़हर को पी लें
तो ये क्या कुछ कम है
बहती नदियां,बहती हवा
पर्वत डटा हुआ
न बहें हम, न सही
न डटें हम न सही
औंधे लेटे हुए हैं
सीधा खड़ा होकर
गीत मधुर कोई गा लें
तो ये क्या कुछ कम है

5 comments:

अंगूठा छाप said...

wakai!



ye bilkul kam nahin hai...!


andaaz achha hai...

Udan Tashtari said...

बहुत उम्दा...वाह!

कहने में क्या हानि said...

गहराई..
जैसे पहाड़ के पीछे पहाड़ हैं
पहाड़ के पीछे और बड़े पहाड़...

कहने में क्या हानि said...

पढ़ना अच्छा लगता है
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ये क्या कुछ कम है
आप पढ़ते हैं
जैसा मैं लिखा देखता हूं
इस पेज के ऊपर एक इबारत

इस पर कैसे यकीन कर लें
इस रिश्ते पर कि टीवी में
काम करते हुए
आपको पढ़ना अच्छा लग सकता है
जहां कुपढ़ों की हो भरमार

फिर तो आप यकीन करें
भारी बारिश हुई
और धरती पर कीचड़ ही न हुआ

टीवी का हर शख़्स रोज़-ब-रोज़
क्यों झूठ बोलता है

अपना दिल न तोड़ो ऐसा
अब जब झूठ बोल दिया तो
कर क्या सकते हैं
लेकिन टीवी में काम करते
ज़्यादा से ज़्यादा शख़्स
जनाब पढ़ने वालों को गाली देते हैं
जैसे आप भले ही कवि ही
क्यों न हों जाएं घटिया क़िस्म के
बस आपका लिखने-पढ़ने से
नहीं पड़ना चाहिए साबका

जेनएक्स कहता
समर की छुट्टी
बार–बार डांटते घर में कुछ पढ़ो
कोशिश करो दुनिया में क्या-क्या है
किताबें जो पसंद की जा सकती है
दिल से पढ़ो रुचि से
और यह तभी पैदा होगी
जान लिया जाए जब
तुम किस तरह की किताबें पढ़ना पसंद करते हो

लेकिन क्या यह यकीन किया जा सकता है
जिस पढ़ने की बात हो रही है
वह असल में किताब पढ़ने की ही बात है
वरना कहीं आदमी
कहीं चेहरे
कहीं साज़िशों को पढ़ने की बात तो इसमें नहीं है

हालांकि जो भी पढ़ो ज़रूर पढ़ो
और जैसे हमें बचपन में बताया गया
उसे गुणो भी।
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Nitikasha. said...
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