08 March 2013

बिगड़ी हुई लड़कियां

हां हम बिगड़ी हुई लड़कियां हैं, बिगड़ी हुई
तुम हमसे नफरत करना चाहो तो करो
हम तो मोहब्बत करना जानते हैं
और करेंगे भी
मगर तुम्हारे चरणों की दासी बन नहीं रहेंगे

हां हम बिगड़ी हुई लड़कियां हैं, बिगड़ी हुई
हम वो पहनेंगे जो पहनना चाहेंगे
और चिल्ला कर कहेंगे
हमारी स्कर्ट से ऊंची हमारी आवाज़ है
तुम चिढ़ते हो तो चिढ़ो

हां हम बिगड़ी हुई लड़कियां हैं, बिगड़ी हुई
हम रात को भी बाहर निकलेंगे
रात तो हमारी सहेली है
और लड़कों से दोस्ती भी करेंगे
बलात्कार कर हमें रोकने की कोशिश करोगे
करो, हम लड़ेंगे
मगर रोके से न रुकेंगे

हां हम बिगड़ी हुई लड़कियां हैं, बिगड़ी हुई
जब तक हैं जिएंगे
मरना तो एक दिन है ही
हम अपनी शर्तों से समझौता नहीं करेंगे
हम अपनी ज़िंदगी तुम्हारे हवाले नहीं करेंगे

हां हम बिगड़ी हुई लड़कियां हैं, बिगड़ी हुई
ये दुनिया हमारी भी उतनी ही है
जितनी तुम्हारी
हम खुद को और मज़बूत बनाएंगे
कोशिश तो करेंगे ही

हां हम बिगड़ी हुई लड़कियां हैं, बिगड़ी हुई
हम तो जीना चाहते हैं, साथ तुम्हारे
तुम बार-बार-बार हमें पीछे धकेलते हो
हम पर हमला करते हो
हम तुम्हारे हमले झेलेंगे
और फिर बढ़ चलेंगे

हां हम बिगड़ी हुई लड़कियां हैं, बिगड़ी हुई

04 March 2013

न आए ऐसी बारात






सचमुच हमारी दुनिया तेज़ी से बदल रही है। हमारी दुनिया, मतलब हम लड़कियों की दुनिया। औरतों के खिलाफ़ अपराध बढ़े हैं, ये भी एक बड़ी और कड़वी हक़ीकत है, लेकिन इस सच को नकारा नहीं जा सकता की परिवार में और परिवार से बाहर भी लड़कियां किन्हीं स्तर पर लड़कियों के हालात में सुधार हुआ है। पहले परिवार में खानपान में भी बेटियों और बेटों के बीच फर्क किया जाता था। पढ़ाई और स्कूल में फर्क किया जाता था। अब ये बदला है, बल्कि कुछ घरों में तो लड़कियों को पब्लिक स्कूल में पढ़ाया जाता है।


पर ये तो तय है कि महिलाओं से भेदभाव खत्म नहीं हुआ है। लेकिन यहां मैं उन लड़कियों के बारे में लिखना चाहती हूं शादी के दिन जो सजधज कर बारात लेकर दूल्हे के आने का इंतज़ार करती हैं, दहेज की वजह से मगर वो बारात नहीं आती और उन लड़कियों का बहुत शुक्रिया अदा करना चाहती हूं जो दहेज मांगनेवाली बारातों को शादी के मंडप से वापस लौटाती हैं।


बुलंदशहर में एक मुस्लिम परिवार की लड़की का निकाह का दिन आ गया था। मां-बाप, भाई-बहन सब शादी की तैयारियों में जुटे हुए थे। मगर शादी के दिन की सुबह ही फोन आया, लड़की के पिता से एक लाख रुपये और मोटर साइकिल की मांग की गई। पिता इस स्थिति में नहीं थे कि लड़केवालों की इस डिमांड को पूरी कर पाते। मुस्लिम परिवार में तो दहेज प्रथा भी नहीं थी, मगर लड़कियों का ये अभिशाप मुस्लिम समाज में भी तेजी से फैलता जा रहा है। लड़कीवाले बारात का इंतज़ार करते रहे, बारात नहीं आई।

जिस परिवार में लड़की का निकाह किया जा रहा था, लड़का और उसका पिता दोनों डॉक्टर थे। ये भी हैरान करनेवाली बात है। अलीगढ़ के रहनेवाले थे वो। बारात न आने पर लड़की के पिता ने पुलिस में मामला दर्ज कराया। लड़केवाले घर पर ताला डाल निकल गए।

ये तो घटना है। मगर इसके बाद जो होता है वो बारात न आने से भी ज्यादा खराब होता है। कि अब लड़की का क्या होगा। जिसके नाम पर मेहंदी रचायी, वही नहीं आया, उसकी ख़ुशियां उजड़ गईं, उसके परिवार की ख़ुशियां उजड़ गई, लड़की की ज़िंदगी बरबाद हो गई। फिर लड़की को कोसना और लड़की का खुद को कोसना। ये सबसे खराब पहलू है। पहले तो लड़की, फिर उसका परिवार, उसका मोहल्ला, रिश्तेदार और समाज ये सब मिलकर एक भयावह स्थिति बना देते हैं।

नहीं, लड़की की ज़िंदगी बरबाद नहीं हुई, बल्कि बरबाद होने से बच गई। ये बहुत ही साधारण बात है मगर इसे जटिल बना दिया गया। लड़की अगर ऐसे परिवार में चली जाती जहां भावनाओं का मोल नहीं रुपयों की ही कीमत है। उसे क्या हासिल होता। दहेज के लिए प्रताड़ित होने और चरम पर जला दिए जाने से तो अच्छा है कि दहेज के नाम पर होनेवाली शादी के टूट जाने पर राहत की एक बड़ी लंबी सांस ली जाए। ख़ुश हुआ जाए कि बेटी बच गई।

पिता तसल्ली लें और मोहल्ला संतुष्ट हो कि बच्ची बच गई। मां अपनी बेटी को पुचकारे कि किसी कमीने के लिए रचायी गई उसकी मेहंदी जितनी जल्दी छूट जाए अच्छा। फिर मेहंदी किसी और के लिए नहीं लड़की अपने लिए ही लगाती है। ऐसी बारात जो दहेज की रकम बटोरकर आए उससे अच्छा कि न आए ऐसी बारात।

और वो लड़कियां जो शादी के मंडप से दहेज मांगनेवाली बारातों को लौटाती हैं, उनका समारोह कर स्वागत किया जाना चाहिए।

20 February 2013

पागल


ध्यान लगाने के लिए ओशो कहते  हैं  कि दिमाग को खाली कर दो, कुछ मत सोचो,  कोई विचार मत लाओ, शांत हो जाओ, तब सच तुम्हारे सामने होगा, सच से तुम्हारा साक्षात्कार होगा, तुम्हें  तुम्हारे सारे अनसुलझे सवालों के जवाब मिल जाएंगे।


ओशो, कई बार कोशिश की। 10 सेकेंड भी बिना कुछ सोचे दिमाग़ को रिक्त रख पाना मुश्किल होता है। कोई न कोई विचार आ ही धमकता है या यही ख्याल दौड़ जाता है कि कुछ नहीं सोचना। बहुत मुश्किल है बिना कुछ सोचे रह पाना, दिमाग़ का रिक्त रह पाना।


मगर उसकी आंखें ही रिक्त हैं। वो शांत एकटक भाव से सब देखता है और कुछ सोचता नहीं। उसका चेहरा तो यही बताता है। सड़क पर दौड़ती-भागती गाड़ियां, शोर, कई बार तो किसी गाड़ी से टक्कर लग जाने की आशंका भी  होती है। मगर उसे कोई फर्क नहीं पड़ता। वो कुछ नहीं सुनता, देखता है और खूब देखता है। मुझे उसके चेहरे का सन्नाटा भीषण शांति सरीखा लगता है।

मैं उसे देखती हूं, सुबह दफ्तर के बाहर चाय के ठेले पर। कभी-कभार ही दिखता है। ठेले के सामने आकर खड़ा हो जाता है। चुप वो हमेशा ही रहता है। चायवाला उसके लिए एक चाय निकालकर किनारे रख देता है। वो समझ जाता है ये उसकी चाय का प्याला है (वहां चाय का इंतज़ार कर रहे और लोग भी होते हैं)। प्याला उठाता है और लौट जाता है, कहीं पर।


एक साथी ने बताया, कल जब फरवरी के ठंडे मौसम में बारिश हो रही थी, भीगने से बचने के लिए वो और उसके एक साथी  बस स्टेंड के नीचे  भागकर आ खड़े हुए।  और वो बस स्टैंड के बाहर बारिश में खडा चुपचाप भीग रहा था। जैसे बारिश में ध्यान लगा रहा हो, मैंने सोचा।


पता चला, बस स्टैंड के आसपास ही रहता है वो। सालों से नहीं बनाए गए, जट बने बाल, उलझी दाढ़ी, शून्य में ताकती नज़रें। फटे-पुराने-चीथड़े से कपड़े। फटी हुई शर्ट समने से आती ठंडी हवा को आराम से अंदर जाने की इजाज़त देती है, उसके उपर चीथड़ हो चुका एक जैकेट भी डला होता है।
एक जेब में ढेर सारी पन्नियां ठूंसे हुए दूसरे में कांच की खाली बोतल दबाए हुए, जो शराब की थी।


पागल। ऐसे कितने पागल रहते हैं हमारे ईर्द-गिर्द। सड़कों पर दिख जाया करते हैं। जिन चीजों को हम कबाड़ में फेंक देते हैं उनके साथ वो जीते हैं। क्यों जीते हैं, कैसा महसूस करते हैं?

आज सुबह वो आया तो एक बोला, मजनूं आ गया। मैंने मजनूं को याद किया जो लैला की याद में मजनूं बना था। इस पागल पर मैं बहुत पहल से ग़ौर करती आ रही हूं। हमेशा लगता है कि ध्यान लगाने के लिए मैं अपने दिमाग में जिस रिक्तता को लाने की कोशिश करती हूं, उसके दिमाग़ में वो रिक्तता मौजूद है।  वो शांत और एक समान भाव से सबकुछ देखता है, सड़क पर चलते आदमी को भी, कुत्तों को भी, बसों को भी। वो पागल न होता तो ध्यान के परम क्षणों में होता।


और ओशो, आप कहते हैं ऐसे ही क्षणों में सच से आपका परिचय होता है, तब सच अपनेआप प्रकट होता है, तब आप बुद्ध बनते हैं, कबीर बनते हैं।

ओशो, ये कौन हैं, जिसे सब पागल कहते हैं।


29 December 2012

हम सब हड़ताल पर हैं

हम  सब हड़ताल पर हैं
हम सारी स्त्रियां
हमारी बात हो गई है
नदियां नहीं बहेंगी
हवा भी नहीं चलेगी
नदियां भी हड़ताल पर हैं, हवा भी
ज़ाहिर है हमारी हड़ताल तक कोई खुश्बू नहीं मिलेगी
फूलों-तितलियों से समझौता हो गया है
वे भी हमारे साथ हड़ताल में शामिल हैं
और अग्नि ने तो धधक कर कहा है
वो चूल्हे में नहीं आएंगी
सिर्फ मोमबत्तियों की लौ बन जलेंगी
वो भी हड़ताल पर हैं, हमारे साथ

एक मुर्दा गंधहीन-बहावविहीन
जियो तुम बलात्कारियों
तुम्हारी सृष्टि ऐसी ही होनी चाहिए
तुम्हे ख़ुश्बू से हमेशा-हमेशा के लिए महरूम कर देना चाहिए
ताजी हवा-ताजा पानी
तुम्हारे हिस्से न आने पाए
तुम निवाला बनाओ अग्नि वो भोजन न पकाए
तुम्हारे लिए ऐसी सज़ा की मांग करती हैं

मगर तो हम
बेमियादी हड़ताल पर भी नहीं जा सकतीं
वरना बाकी क्या करेंगे

तो आओ
बाकी तुम सब भी
हमारी इस हड़ताल में
शामिल हो  जाओ




15 December 2012

ज़िंदगी में थोड़ा पागलपन जरूरी है

ज़िंदगी में थोड़ा पागलपन भी जरूरी है
दिसंबर की सर्द रात में
बूंद-बूंद टपकते आसमां
और घर की छत पर चढ़
पुराने यार को फोन लगा
ठिठुरते, दांत किटकिटाते
बियर के ताजा भरे घूंट का स्वाद सहेजते
दोस्त की नींद उखाड़ते हुए
बारिश की बूंदों को
मुठ्ठी में बंद करते
यादों की जमापूंजी का हिसाब-किताब
पुराने किस्से दोहराने जरूरी हैं
.....


05 August 2012

चां मामा








सुनो तो चांद
तुम जरूर इठलाते होगे
कि कितने कवियों की कल्पना हो
प्रेम के प्रतीक हो
कि तुम तक पहुंचने के लिए
शब्दों की कितनी सीढ़ियां बनाईं जा चुकी हैं
कि तुम्हारी चांदनी पर
कितने मन तरसे-बरसे
-
मेरे लिए तो तुम जैसे
एक हलचल हो
उथलपुथल मच जाती है
हसरतें, सपने, इच्छाएं, आशाएं, निराशाएं
कि जैसे समंदर में ज्वार-भाटा आता है न

-
पर मज़ेदार बात
मेरी बेटी तुम्हें ढूंढ़ती है, बुलाती है
चां-मामा
आ जाओ
चां-मामा
आज नहीं आए
चां-मामा
वो रहे
तुम नहीं दिखते तो गुस्सा होती है
तुम उसे अच्छे नहीं लगते घटते हुए
या बादल के पीछे छिपे हुए
कई बार तो नींद में भी पुकारा उसने
तुम्हें चां-मामा
वो अभी दो साल की भी नहीं हुई
-
तुम दरअसल सबके लिए अलग तरह से हो
धरती का बोझ हल्का करने की
एक उम्मीद
तुम्हारी उबड़-खाबड़ ज़मीन
जिस पर पानी ढूंढ़ने की
तमाम कोशिशें नाकाम हुईं अबतक

-
हां याद आयी
तुम्हारी सबसे अच्छी कहानी
चांद पर चरखा कातती बुढ़िया नानी
तुम्हें क्या पता होगा...
-
धरती तुम्हें लेकर बहुत बेसब्र है
तुम इतने नज़दीक जो हो
और तुमसे इतनी दूरी भी तो जरूरी है
तुम ये दूरी बनाए रखना
और इतनी नज़दीकी भी
ठीक है
चां मामा

(अब मेरी बेटी तीन की होने को है, ये कविता पहले लिखी थी यूं ही, आज प्रकाशित  कर रही हूं)

10 June 2012

गंध

एक जगह दरवेश कहते हैं:  शहरों की अपनी विशिष्ट गंध होती है, अकरा में समुद्र और मसालों की गंध होती है, हैफा से गंध आती है चीड़ों और बिस्तर की सिलवटदार चादरों की, मास्को से गंध आती है बर्फ पर पड़ी वोद्का की, काहिरा में गंध है आम और अदरक की, बेरूत में धूप और समुद्र और धुएं और नीबुओं की, पेरिस में गंध है ताजा रोटी और पनीर की और फेटा पनीर के रेशों की, दमिश्क गंधाता है चमेली और सूखे मेवा से, ट्यूनिस रात और नमक की मुश्कीं से, रबात मेंहदी और लोबान और शहद से।

कोई भी शहर जो अपनी गंध से जाना जाता है, याद किए जाने के लिए आश्वस्त नहीं हो सकता। निर्वासन की जगहों पर एक समान गंध होती है, कुछ और के लिए उत्कंठा की गंध, एक गंध जिसे याद रहती है दूसरी गंध, बाधित हुई सांस की गंध, एक भाव जो आपको ले जाता है काफी इस्तेमाल किए गए पर्यटक नक्शे की तरह पहली जगह की गंध की ओर। गंध एक स्मृति हैं और एक सूर्यास्त। यहां सूर्यास्त अजनबियों को सौंदर्य का उलाहना है।


एक अखबार में महमूद दरवेश के इस पीस का हवाला दिया गया, पढ़ते हुए बड़ी बेचैनी सी हुई, कई बार कोई बहुत अच्छी चीज हो, चाहे पढ़ने की या खाने की, बातचीत का कोई हिस्सा हो या कोई लम्हा, बहुत अच्छी चीज,  बेचैनी पैदा करती है। दरवेश के इस अंश को पढ़कर भी ऐसा ही लगा और फिर अपने शहर की गंध भी महसूस करने की कोशिश करने लगी।

लखनऊ में जैसे गंध है गंधहीन बोगनवेलिया की, पुरानी किताब की, और शाम को...कान के पीछे लगाई जानेवाली इत्र की भीनी गंध में घुल जाती है तेज़ टुंडे कबाब की गंध
गोरखपुर में साइकिल पर बर्फ़वाली आइसक्रीम की गंध है, ठीक बगल में रही आलू टिक्की की भी
वाराणसी में गेंदाफूल के मालाओं की गंध है, जलेबी के साथ सड़क की भी अपनी खास गंध है
बलिया में कच्चे आम की गंध है
नोएडा में सीमेंट की गंध उड़ाती हुई हवा की गंध
ग़ाज़ियाबाद में पेट्रोल-पसीने की गंध
पॉन्डीचेरी के समुद्र से उठती है स्ट्रॉन्ग बियर की गंध
देहरादून से ऊंचे-हरे-पेड़ों और गर्मियों में सूखी बरसाती नदियों की गंध आती है

हां सचमुच गंध एक स्मृति है, कभी-कहीं किसी ख़ास गंध से याद आ जाती है बरसों पुरानी कोई गंध, उससे जुड़ी कोई बात, कोई वाकया...

कोई पढ़ी गई किताब भी बस जाती है एक गंध की तरह हमारी स्मृतियों में।
जैसे बाबर से आती है घोड़ों के टापों से उडती धूल की गंध
टॉलस्टॉय के पुनरुत्थान से कात्या और उसकी साथिन कैदियों के पसीने की तेज़ गंध
माक्सिम गोर्की की मां से आती है रोटी की, समुद्र के नमक की गंध
पूर्वबेला में है प्रेम की गंध
रसूल हमजातोव के नाम पर खेतों की मेड़ पर पहाड़ी टोपी पहने सुस्ताते व्यक्ति की सांसों की गंध आती है
महमूद दरवेश के नाम पर रेगिस्तान की रात में चमकते तारों के बीच मेंडलिन की मीठी धुन की गूंज की गंध