30 August 2017

आधी रात की मिले आज़ादी





मुझे रात कुछ ज्यादा ही प्यारी है। रात सड़कें और सफ़र दोनों रोमांचित करते हैं। नाइट शिफ्ट के दौरान रात में कई बार दोस्तों के साथ चाय पी है। उनका ज़ायका ही कुछ और था।
रात सबको उसके हिस्से का स्पेस देती है। जब सारे काम खत्म कर आप खुद के साथ होते हैं। ये स्पेस बहुत जरूरी है।
रात डर के छिपने के लिए नहीं ढूंढने के लिए है। कोई सुर, कोई सड़क...।
आधी रात को हमारा देश आज़ाद हुआ था...वो आधी रात वाली आज़ादी हमारे हिस्से में आनी बाकी है।
रात दूर तक जाती कोई शांत सड़क, किनारे लैंप पोस्ट की मंद रोशनी, झिलमिलाते तारों वाला आसमान, आप किधर को ही मुंह घुमा के चल दें, आपका पीछा करने वाला वो बेशर्म चांद, इस रात के हक़दार तो हम भी हैं।
उस रात अखबार के दफ्तर के बाहर करीब दो बजे हमने बुढ़िया के यहां चाय पी थी। रात दो बजे एक बुढ़िया सड़क पर चाय बना रही थी। उसकी केतली से उठता भाप हवा में जमी ठंड को पिघला रही था। स्मृतियों में जमा वो रात,  रजाई ओढ़कर बिताई गई कई रातों पर भारी है।
और उस रात जब गाड़ी का पेट्रोल लगभग खत्म होने को था। ग्रेटर नोएडा का वो चमचमाता एक्सप्रेस-वे खत्म होने का नाम ही नहीं ले रहा था। कोई यू टर्न नहीं। अंधेरा सब पर भारी। रात में रास्ता भटक गए तो समझो गए। पर मैं उस रात बच ही गई। पेट्रोल पंप मिल गया। फिर रात को छकाया जा सकता  ये भयावह किस्सा रोमांचक बन गया।

अब इन सारी खुशनुमा रातों में कोई विलेन घुस जाए। कोई वर्णिका सड़क से गुजरे कोई विकास बराला पीछे पड़ जाए। ये रातें जो रोमांचक थीं, भयावह भी हो सकती थीं। और इस डर से रात में घर से निकलना भूल चुकी लड़कियों के हिस्से की कितनी कहानियां, कितनी सड़कें, कितने लैंपपोस्ट, तारों वाला कितना सारा आसमान गायब है।


हम रातों को सड़क पर न निकलें क्योंकि ये सुरक्षित नहीं, दिन के उजाले वाले जेंटलमैन की सीरत रात को बदल जाती है, ये तो भेड़ियोंवाली सी कहानी है। दिक्कत ये है कि सारा सिस्टम इसी बात को सपोर्ट करता है कि लड़कियां रात को घरों से न निकलें। इस पर ज़ोर ही नहीं दिया गया कि हमारी सड़कें रातों को भी सुरक्षित हों। हमारी लड़कियां रातों को भी बेधड़क सड़कों पर निकल सकें। ये सिर्फ लड़कियों के रात में घर से निकलने का मामला नहीं है। इससे लड़के लड़कियों में भेदभाव का हल भी निकलता है। मानिए रात को घर में किसी की तबियत बिगड़ी तो लड़की फटाफट मेडिकल स्टोर जा कर दवा ले आएगी या अस्पताल ले जाएगी। या फिर किसी को देर रात रेलवे या बस स्टेशन छोड़ने जाना हो तो लड़की छोड़ आएगी। आखिर हमारा पूरा समाज लड़कों पर ज़ोर क्यों देता है। ये भी एक वजह बनती है। सुरक्षा।


फिर लड़कियों को संस्कृति का पाठ भर भर के पढ़ानेवाले लड़कों को संस्कृति का स भी नहीं सिखा पाते। रातें हमारी हैं, हमारी हैं, हमारी हैं, रातों पर अपना हक़ हम लेकर रहेंगे। रात हमारे छिपने दुबकने के लिए नहीं है। रात के तकिए पर सिर टिकाकर हम देर तक तारों को देखेंगे, अपने विचारों को गूंथेंगे, किसी रात जब नहीं जी चाहेगा हम नहीं सोएंगे। सुबह होने तक जागेंगे, अपने हिस्से की सड़कें ढूंढ़ेगे और तुम्हारी सड़कों पर अपने नाम के पत्थर लगा देंगे। वर्षा मार्ग, दीप्ती मार्ग, कर्णिका मार्ग वगैरा वगैरा।
बात ये है कि अब लड़कियां ऐसे सपने देख भर नहीं रहीं, ऐसे आंदोलन, ऐसी मुहिम आहूत भी कर रही हैं। वे सड़कों पर निकल रही हैं ये बताने के लिए कि ये सड़कें तुम्हारी बपौती नहीं, हमारी भी हैं, उतनी ही, जितनी तुम्हारी हैं, समझे।

12 अगस्त को फेसबुक की मार्फत बहुत सारी दुस्साहसी महिलाओं ने कुछ ऐसी ही मुहिम को अंजाम दिया। मुंबई में, दिल्ली में, कोटद्वार में और अन्य शहरों की सड़कों पर वे देर रात अपनी आमद दर्ज करा रही थीं। ये मुहिम चंडीगढ़ में हरियाणा बीजेपी अध्यक्ष के बेटे विकास बराला और उसके दोस्त पर आईएएस अफसर की बेटी वर्णिका के साथ देर रात छेड़छाड़ के विरोध में आहूत किया गया।
(जनचौक वेबसाइट पर प्रकाशित)

26 August 2017

सुल्ताना ने जो सपना देखा...

इस कहानी ने अपने वक़्त में सबको हैरान कर दिया था। कि दुनिया जैसी हम देखते हैं इससे ठीक उलट भी हो सकती है। औरतों की दुनिया। बीसवीं सदी के शुरुआती दशक औरतों के माफिक तो हरगिज नहीं थे। आज़ादी की जंग लड़ रहे हिंदुस्तान में तब औरतों के अधिकार को अलग से देखा भी नहीं जाता था। उस समय में रुकैया  सखावत हुसैन ने एक कहानी लिखी जिसका नाम था -सुल्ताना का सपना। सुल्ताना अपने सपने में एक ऐसी दुनिया में प्रवेश करती है जहां हर चीज बदली हुई थी। जहां बारिश नहीं होती थी लेकिन धरती पर बहुत हरियाली थी।   

अगर पाठक चाहें तो वे भी हमारी किरदार सुल्ताना के साथ उसके सपनों की दुनिया में प्रवेश कर सकते हैं। जो एक शाम अपनी आराम कुर्सी पर पसरी हुई थी, आंखें उनींदी हुईं, सपना शुरू हुआ।

सुल्ताना अपने सपने में एक सुंदर बागीचे में थी। रात के नीले आसमान पर चांद चमक रहा था। इस समय कोई लड़की अकेली, बाहर, वो भी बागीचे में। पाठक, आप लोग क्या कहते हैं, यह कुछ अजीब है न। सुल्ताना को भी अजीब लगा। लेकिन वहां मौजूद सिस्टर सारा ने बताया कि डरने की कोई बात नहीं सभी पुरुष गहरी नींद में सो रहे हैं। सुल्ताना कुछ अचकचायी सी है। सुबह हो गई। अब वो भीड़ भाड़ भरी सड़क पर थी। लेकिन इस भीड़ में कोई मर्द नहीं था। सब औरतें थीं। उन्होंने सुल्ताना पर कुछ फिकरे कसे। सुल्ताना समझ नहीं सकी और उसने अपनी सहेली सिस्टर सारा से पूछा। सहेली ने बताया कि सुल्ताना उन्हें मर्दों की तरह शर्मीली और डरपोक लग रही है।

बीसवीं सदी की शुरुआत में सड़क पर बेधड़क चल रही सुल्ताना के लिए सब कुछ बेहद आश्चर्यचकित करने वाला था। उसे तो पर्दे में रहने की आदत थी। सड़कों पर पुरुष दिखते थे। महिलाएं ज्यादातर घर में रहा करती थीं। लेकिन सपने में सब कुछ उलट था। पुरुष घर में रहते थे और घर के कामकाज देखते थे। वे बाहर कम ही दिखाई देते थे। असल दुनिया से एक दम उलट। सुल्ताना ने अपनी सहेली से पूछा कि सारे मर्द कहां गए। सहेली ने बताया कि उनके इस देश में मर्द घर में बंद रहते हैं जैसे औरतें जनाना घर में बंद की जाती थीं। सुल्ताना का हंसने का जी चाह रहा था। वो अपनी सहेली से कहती है कि औरतें तो कुदरती तौर पर कमजोर होती हैं इसलिए उनका सड़कों पर आना सुरक्षित नहीं। सहेली बताती है कि सड़क तभी सुरक्षित नहीं जब पुरुष वहां होते हैं। इसलिए सपनों के इस देश में पुरुषों का सड़क पर निकलना मना था। अपनी बात समझाने के लिए सुल्ताना को वो शेर का उदाहरण देती है। जो जंगली होता है इसलिए उसे सड़क पर नहीं आने दिया जाता।

सपना अभी और हैरतअंगेज बातों से भरा पड़ा था। सुल्ताना को पता चलता है कि यहां सात आठ घंटे दफ्तर में काम नहीं करना होता। यहां महिलाएं सारे काम दो तीन घंटे में ही निपटा देती थीं क्योंकि वे अपना समय सिगरेट पीने में बर्बाद नहीं करती थीं। फिर सहेली सुल्ताना को रसोई दिखाने ले गई। रसोई सब्जियों के एक खूबसूरत बागीचे में बनाई गई थी। जहां सूरज की गर्मी को इकट्ठा करके खाना बनाया जाता था। हमारी प्यारी सी किरदार सुल्ताना के आश्चर्य खत्म होने का नाम नहीं ले रहे थे। तो उसकी सखी ने बताया कि कैसे लड़कियां विभिन्न वैज्ञानिक शोध के ज़रिए कुदरत को बिना नुकसान पहुंचाये अपने  सभी काम आसानी से निपटा लेती हैं। उन्होंने एक निराला गुब्बारा ईजाद किया था। जिसे वे बादलों के उपर तैराते थे। और अपनी जरूरत का पानी जुटा लेते थे। पानी लगातार लेने से बादल बनने बंद हो गए जिससे बारिश और तूफान भी नहीं आते थे। पाठकों की पीठ पर भी यहां सुरसुरी सी हो उठती है। विज्ञान का ये चमत्कार तो अब तक नहीं देखा उन्होंने।


हमारी किरदार और उसके साथ पाठकों की जिज्ञासाएं शांत ही नहीं हो रही थीं। सुल्ताना ने जानना चाहा कि आखिर सारे मर्दों ने घर में रहना स्वीकार कैसे कर लिया। वे तो ताकतवर हैं। फिर सपने की सखी ने बताया। कि एक बार बाहरी मुल्क के आक्रमण में उनके देश के ज्यादातर पुरुष युद्ध कर रहे थे। ताकतवर फौज के आगे वे हार रहे थे। तभी इस देश की रानी ने सभी महिलाओं के साथ मुलाकात की और युद्ध जीतने की एक नायाब तरकीब सोची। रानी ने सभी पुरुषों को सम्मान और स्वतंत्रता के लिए जनानखाने में आने को कहा। वे इतने थके हुए थे और घायल थे कि बिना विरोध किए रानी के आदेश को मान लिया। इसके बाद वहां की विश्वविद्यालय की प्रिंसिपल ने अपनी दो हजार छात्राओं के साथ रणभूमि की ओर कूच किया। उन्होंने सूरज की जमा की हुई रोशनी को दुश्मन सेना पर छोड़ दिया। झुलसा देने वाली गर्मी का सामना दुश्मन सेना नहीं कर सकी। फिर मर्दों ने वापस बाहर निकलने की मांग की। लेकिन ऐसा हुआ नहीं। फिर मर्दों को पर्दे में रहने की आदत पड़ गई। जनाना शब्द की जगह मरदाना शब्द ने ले ली।

महिलाओं की हुकूमत वाले इस देश में अपराध न के बराबर होते थे। अगर किसी ने जुर्म किया तो उसे देश छोड़ने का दंड दिया जाता था। महिलाएं मशीनों के जरिये खेती करती थीं। फल यहां का मुख्य भोजन था। गर्मी के मौसम में वे अपने बनाए हुए कृत्रिम गुब्बारों से धरती पर बौछार करती थीं। जाड़े के मौसम में सूरज की गर्मी से कमरे गर्म रखती थीं। सुल्ताना सवालों के बौछार कर रही थी। उसने फिर पूछा तुम्हारे देश में धर्म कौन सा है। प्रेम और सच्चाई, सहेली ने बताया।

सुल्ताना अब इस देश की महारानी को देखना चाहती थी। सहेली ने हाइड्रोजन गेंदों से संचालित एयर कार में बिठाया और उसे लेकर हवा में उड़ चली। वे महारानी से मिलीं। महारानी ने भी सुल्ताना से ढेरों बातें की। कि यहां ज़मीन के झगड़े नहीं होते, कोई तख्ता पलट नहीं होता, वे प्रकृति के उपहारों को संजोती हैं। सुल्ताना ने इस अचंभे भरे देश की प्रयोगशालाएं, विश्वविद्यालय जैसी चीजें देखी। वे वापसी के लिए अपनी एयर कार में बैठी और सपना टूट गया। सुल्ताना अपनी आरामकुर्सी पर थी। जो उसने सपने में देखा वो क्या था।
(दैनिक ट्रिब्यून के लहरें कॉलम में प्रकाशित)

17 February 2017

शहर शहर

हर वो शहर जिससे होकर हम कभी गुजरते हैं, जहां कुछ पल ठहरते हैं, जहां की सड़कें-बाज़ार-इमारतें देखते हैं, उससे एक नाता सा बना लेते हैं। हमारी स्मृतियों के जंगल में उस शहर के लिए एक कोना तैयार हो जाता है। कई बार तो ट्रेन के सफर में मंजिल के पड़ावों में जिन स्टेशनों पर ट्रेन ठहरती है, वहां पी गई चाय, वहां की ख़ास चीज का ज़ायका भी उस जगह के ख़ास अनुभव सहेज कर रख देता है।

संडीला की रेवड़ी, आगरे का पेठा, मेरठ की गुड़ पट्टी, लखनऊ के कबाब, वाराणसी की जलेबियां, देहरादून के मोमोज, मसूरी का मैगी प्वाइंट, जयपुर के मिर्चवाले पकौड़े, मुंबई का बटाटा वड़ा और ऐसे तमाम छोटे मगर कीमती जायके अपने शहर का स्वाद बनाते हैं और उनसे हमारा रिश्ता मजबूत करते हैं। लखनऊ का भूलभुलैया किसने भी बनवाया, लेकिन लखनऊ में रहनेवाले हर किसी का उस पर हक़ है कि वो यहां का बाशिंदा है। वो जब अपने घर से कोसों दूर होता है तो अपने शहर को याद करते हुए वहां की गलियों, चौराहों, बाजार में पहुंच जाता है, वहां की ऐतिहासिक इमारतों से अपना रिश्ता जोड़ लेता है। किसी की स्मृतियां अपने शहर के घंटाघर, वहां की बारादरी के ईर्दगिर्द घूमती हैं। जिन सड़कों पर कितनी सुबह-शामों को आते-जाते,उतरते-डूबते, यूं ही गुजरते देखा, वो उनकी स्मृतियों की पूंजी में जमा हो जाती हैं। अलग-अलग शहरों के बाजारों की चहलपहल की गूंज हमारे कानों में कहीं रम जाती है। राजस्थानी बंधेजी साड़ियां, जयपुर की चूड़ियां, कन्नौज का इत्र, फर्रुख़ाबाद की दालमोठ, इनके साथ इन शहरों की तस्वीर जेहन में उतराती चली जाती है। उस शहर से हमारा ख़ास रिश्ता जोड़ देती है। 

नदियों के किनारे बसे शहर के लोग तो अपनी नदियों से ख़ास लगाव रखते हैं। उनके मन में उनकी नदी अविरल-निर्मल अपने पूरे विस्तार के साथ बहती है। कोई गंगा की धार से अपने मन को सींचता है तो कोई अपने घर के आसपास बने पोखर-कुएं से ही नमी हासिल करता है। नदी के जल में ढलता कोई सूरज सालों के लिए हमारे मन में भी ढल जाता है। गोमती के किनारे उगे चटक जंगली फूल की अनुभूति भी नदी के साथ हमारे यादों से जुड़ जाती है। वो पोखर- कुएं, उनके ईर्दगिर्द घटित घटनाएं कभी हमारा पीछा नहीं छोड़ते। अपनी नदी, अपने पोखर, अपनी झील, अपने गदन, अपनी नयार से दूर बैठे व्यक्ति को कभी अकेले में याद आती है उसकी तरल ध्वनि। मई-जून की किसी बौरायी सी दोपहर में चिहुंकती नदी की तपन से गालों पर गर्म हवा के थपेड़े पड़े होंगे। हम सब की यादों में बसी हैं ऐसी कई दोपहरें। सूखी पत्तियों के झुंड का चिड़ियों सा उड़ना हम सब के मन में कहीं बसा है। हमारे स्मृतियों के जंगल की बसावट को जो और करीने से काढ़ता है। 

किसी शहर से गुजरते हुए उस शहर की एक ख़ास गंध हमारे भीतर रह जाती है। वहां की इमारतें हमारे ख्यालों में घर बना जाती हैं, उन सब से हम अपना एक ख़ास नाता जोड़ लेते हैं। अपने शहर से दूर रहनेवाले लोग जब वहां के किस्से सुनाते हैं तो जुबान नहीं रुकती, मीठी सी यादों का कारवां सा निकल पड़ता है, वो बांवरे से अपने शहर को याद करते हैं। जहां कभी वो रहे, रुके, जिये। लोगों की बातों में उनका शहर बहुत जीवंत होता है, वहां के कंकड़-पत्थर के लिए भी उनके दिल में प्यार उमड़ता है।

हमारी स्मृतियों के इन शहरों से ठीक उलट नये मिज़ाज के शहर भी तेजी से बन और बस रहे हैं, जिनसे चाह के भी कोई रिश्ता नहीं जुड़ पाता। उनकी चौड़ी सड़कों पर भागती बड़ी-लंबी गाड़ियों में हम हर वक़्त ठिठकते-ठिठकते चलते हैं। जैसे हर वक़्त किन्हीं हादसों से बच रहे हों। ऐसी शहरों की चिकनी सड़कों पर कितने साल गुजार के भी दिल का कोई तार यूं नहीं जुड़ता जैसे अपने मोहल्ले की टूटीफूटी सड़कों से जुड़ा करता था। इन तेज मिज़ाज हाईटेक शहरों में लकदक इमारते हैं, शीशे के महल जैसे मॉल हैं, बड़े-बड़े वाटर पार्क हैं लेकिन ये उस बाजार का हिस्सा हैं जहां हम सबसे बड़े प्रोडक्ट होते हैं। हम वो प्रोडक्ट होते हैं जिनके लिए कई सारे प्रोडक्ट बनाये जा रहे हैं। बढ़िया जींस, बढ़िया कपड़े की शर्ट, खुश्बूदार साबुन,डियो,परफ्यूम। हमारे खानेपीने के लिए एक से बढ़कर एक जायके, मैक्डोनल्ड का बर्गर, पिज्जाहट, शानदार कॉफी, हर शहर की मशहूर डिशेज-कुजीन। लेकिन एक ख़ास चीज की कमी होती है, एक ख़ास जायका कहीं छूटता है। कहते हैं हर शहर के पानी का स्वाद भी अलग होता है, उससे बनी चीजों का स्वाद भी अलग होता है।

हम तरक्की का, विकास का हम अपने जीवन में स्वागत करते हैं। पर कुछ तो ऐसा है जिसे हम खो रहे हैं, जिसके चलते हम हर वक़्त बेचैन रहते हैं, हम दिन रात खटते हैं, खूब काम किया करते हैं, मगर किसी काम के न रहे। ऐसे शहर को अपने जीवन के कई साल देकर भी अजनबी से ही रहे। ऐसा मोहपाश जिसमें रहा भी नहीं जाता, छोडा भी नहीं जाता। ऐसे शहर जो सिर्फ अजनबी बनाते हैं, अजनबियत को कायम रखते हैं और जिनसे कोई रिश्ता नहीं बुना जा पाता। ऐसे शहर में हर साल करोड़ों लोग आते हैं अजनबी की तरह और अजनबी ही रह जाते हैं।