10 April 2008

एक मौत


एक मौत
क्या-क्या बदल सकती है
कुछ भी नहीं, सिवाय
उस ज़िंदगी के जो खत्म हो गई
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एक मौत
क्या-क्या बदल देती है
कुछ भी नहीं, सिवाय
उस परिवार के जो अधूरा हो गया
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एक मौत
क्या-क्या बदल गई
कुछ भी नहीं, सिवाय
उस दोस्तीचक्र के जो अब पूरा न हो पाएगा
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एक मौत
जो कुछ भी नहीं
जिसका होना ही उसके न होने में हो
वो आज बता गई मुझे
कि जो चला गया वो मेरा ही एक अंश था
आज बता गई मुझे कि
हम बातों के सिवाय कुछ नहीं कर सकते
यानि 'मैं', 'तुम' और 'हम'
कुछ नहीं, कुछ है तो बस
उस मोड़ पर खड़ी,
किसी का इंतज़ार करती हुई
एक मौत
(मौत पर लिखी गई ये कविता मेरे पति के छोटे भाई धर्मवीर डोबरियाल की है, जिसकी आज से ठीक एक महीना पहले गाड़ी खाई में गिरने से मौत हो गई, उसकी एक प्रिय किताब चंद्रकांता संतति के पन्ने पलटते वक़्त ये कविता मिली, ये कविता 10 अगस्त 2004 को देर रात 12.35 पर लिखी गई थी, तब वो 27 साल का था)

2 comments:

Kalar said...

See Please Here

Divine India said...

बहुत दु:ख हुआ यह जानकर मगर क्या दिव्य दृष्टि पाई थी उन्होंने… कितना सत्य… कितना दार्शनिक…।
आपके भाई साहब को मेरा सलाम…।