14 February 2010


वेलेन्टाइन डे के सुअवसर पर टाइम्स ऑफ इंडिया में एक आर्टिकल है 'सकर्स फॉर रोमांस?' (अंग्रेजी में लिखने में कुछ दिक्कत आ रही है) औरतों के लिये। उसे पढ़कर मैंने भी मन ही मन एनलाइज किया। स्स्स्सालालाला...प्यार-रोमांस-इश्क-मुश्क ऐसी चीजें हैं जो सचमुच अच्छे-खासे इंसान को बीमार बना देते हैं।
औरतों के कमज़ोर होने की बड़ी वजहों में से एक ये रोमांटिसिज्म भी है। प्यार का एक लम्हा जो शायद दिनों, हफ्तों, महीनों, साल में एक-आध बार आता होगा उसके लिये औरतें(लड़कियां इसमें शामिल हैं) कितने दिन, हफ्ते,महीने कुर्बान कर देती हैं। क्योंकि वो एहसास उन्हें सबसे ज्यादा प्यारा है और उस "सबसे ज्यादा को हासिल करने के लिये" वो अपने कितने ही "कल-ज्यादा" एहसास, वक़्त, सेल्फ रिसपेक्ट और तमाम किस्म के मानसिक तनाव को सहती हैं। जो औरत उस रोमांटिसिजम को जितना ज्यादा जीती है वो उतनी ही ज्यादा कमज़ोर होती है।

मेरे हिसाब से ज्यादातर औरतें निगोड़े मोहब्बत के बिना जी ही नहीं पातीं (हालांकि प्यार करना बहुत मुश्किल काम होता है)। अब पता नहीं वो जो करती हैं वो प्यार ही होता है(इन सब बातों में मैं भी शामिल हूं)।

जो इसके चक्कर में कम पड़ती है वो ज्यादा सुखी रहती है। पर औरतों के कुछ स्पेशल हार्मोन्स कमबख्त प्यार-व्यार के लिये उन्हें उकसाते ही रहते हैं। कभी-कभी उन हार्मोन्स पर बहुत गुस्सा आता है( इंजेक्शन से खींच कर उन्हें बाहर निकाल फेंको)।

इसका दूसरा पहलू ये भी है कि जिन औरतों के पास उनका अपना पक्का फिक्स्ड डिपॉजिट जैसा ब्वायफ्रेंड या पति होता है वो बहुत संतुष्ट रहती हैं।
लिखते-लिखते ये भी ख्याल आ रहा ह कि लड़कियों के पास फिसलने के विकल्प लड़कों की तुलना में कम होते हैं, दूसरे सूरते-हालात भी लड़कियों की अपेक्षा लड़कों के पक्ष में ज्यादा होते हैं, इसलिये इनसिक्योरिटी का लेवल लड़कियों में ज्यादा हावी रहता है, यही उनकी व्यक्तित्व की सबसे बड़ी कमज़ोरी भी बन जाती है।
वो जिस ऊर्जा को दूसरे कई अपेक्षाकृत बेहतर कार्यों में खर्च कर सकती थीं, वो रोमांस के बॉन्ड में भर देती हैं। एलआईसी की जीवन बीमा पॉलिसी की तरह। हर महीने पैसे देते रहो, कुछ सालों के अंतराल पर थोड़ा राहत भरा एक छोटा सा अमाउंट मिल जाता है और पूरे पैसे वसूलने के लिये आपको ढेर होना पड़ेगा।
हां बॉलीवुडी फिल्मों ने भी लड़कियों को बर्बाद करने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ा। नब्बे फीसदी फिल्में तो इश्क-मुश्क पर ही बनती हैं क्योंकि मोहब्बत सबसे ज्यादा बिकता है। तो इसका एक मतलब ये भी कि देवानंद, राजेश खन्ना से लेकर सलमान,शाहरूख़ तक भी लड़कियों को बिगाड़ने के लिये ज़िम्मेदार हैं।
पर ये प्रेम कहानियां हमें इतनी पसंद क्यों आती हैं?

मैंने पिछले वेलेंटाइन डे पर प्यार के कुछ बेहतरीन उद्धरणों को एकत्र किया था। इस बार गुलाब नहीं मिला न इसलिये इतना भेजा सड़ा डाला।

6 comments:

आओ बात करें .......! said...

नारी के असुरक्षित पक्ष को लेकर...........
इतना आक्रोश......इतना दर्द.......इस कदर निराशा....
हे वर्षा..!!!
फिर भी प्यार से दूरी न बनाओ..यही है सभी की अभिलाषा.

राज भाटिय़ा said...

वर्षा जी प्यार तो पबित्र है, प्यार हम बेटी से भी करते है वही प्यार हम मां से भी करते है ओर वही प्यार बीबी से , बच्चो से , भगवान से, आम लोगो से भी करते है, लेकिन आज जिसे प्यार का नाम दिया जाता है वो शायद प्यार नही कुछ ओर है....क्योकि प्यार कभी कुछ मांगता नही...सिर्फ़ देता है, देना जानता है.

M VERMA said...

'औरतों के कमज़ोर होने की बड़ी वजहों में से एक ये रोमांटिसिज्म भी है।'
प्यार के बिना जीवन कैसा? प्यार औरत और मर्द में नही बटा है यह शाश्वत है.
और फिर प्यार किसी को कमजोर कैसे बना सकता है. यह तो सशक्तिकरण का एक सबल माध्यम है.
(क्षमा करें)

डिम्पल said...

कितना कुछ कहा जा चुका है इस इक लफ्ज़ प्रेम पे,फिर भी कितना बाकी है...यूँ तो प्रेम प्रेम है जैसे पानी पानी..चाहे बरफ बन जाये चाहे तरल रहे पानी ही होता है.ऐसे ही प्रेम को जिस किसी भी रिश्ते में बांध लो वो प्रेम ही होता है..

डॉ .अनुराग said...

पर लड़के फिसलने के लिए हमेशा एवरेडी रहते है .....यूँ भी अब फिक्स्ड डिपोजिट जैसा कोई कंसेप्ट रहा नहीं .कर्टसी "इमोशनल अत्याचार "

pushpendrapratap said...

duniya jise kahate hai jadu ka khiloyna hai
mil jaye to mitti hai kho jaye to sona hai