13 October 2008

औरतों की कवितायें (1)

`औरतों की कवितायें` शीर्षक से शुभा की कई कवितायेँ भारत ज्ञान विज्ञान समिति ने छापीं थीं. इन कविताओं का पाठ महिलाओं को संगठित करने के आंदोलनों में बहुत बार हुआ है और अक्षर सैनिकों और नवसाक्षरों ने भी इनका बार-बार उपयोग किया है. इस सीरीज़ की कवितायेँ एक-एक कर आप भी पढ़ पाएंगे. बकौल कवयित्री `ये कवितायेँ औरतों के दुखों, उनकी मेहनत और उनके इंसानियत के बारे में हैं. उनकी मेहनत और दुखों को अभी बहुत कम पहचाना जाता है.`
औरतें
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औरतें मिट्टी के खिलौने बनाती हैं
मिट्टी के चूल्हे
और झाँपी बनाती हैं

औरतें मिट्टी से घर लीपती हैं
मिट्टी के रंग के कपडे पहनती हैं
और मिट्टी की तरह गहन होती हैं

औरतें इच्छाएं पैदा करती हैं और
ज़मीन में गाड़ देती हैं

औरतों की इच्छाएं
बहुत दिनों में फलती हैं

6 comments:

ravindra vyas said...

मैं पहली बार इस ब्लॉग पर आया और वर्षा की कविता ने चकित कर दिया। बहुत सादगी से यह कविता स्त्री जीवन के मर्म को अभिव्यक्त करती है।
मैं कामना करता हूं वे जल्द ठीक होकर फिर से सक्रिय हो जाएं।
शुभकामनाएं।

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

..... पर फलती जरूर हैं।
सुंदर कविता।

रंजना said...

satya kaha..

Zakir Ali 'Rajneesh' said...

औरतों के बारे में यूं तो अरबों कविताएं लिखी गयी हैं, पर इस कविता और खासकर निम्न पंक्तियों में जो बात है, वह मुझे कहीं पढने को नहीं मिली-
औरतें इच्छाएं पैदा करती हैं और
ज़मीन में गाड़ देती हैं।
इस कविता को पढवाने का शुक्रिया।

वर्षा said...

रविंद्र व्यास जी, कविताएं मेरी नहीं, शुभा की हैं, उनकी लेखनी बहुत मज़बूत है, बहुत सादगी से बड़ी बातें कह जाती हैं वो।

gagan said...

Hi!
These days I am trying to work on Female Poetry(written by females)which is not available much.I am also trying to find about some older female poets like Akka Mahadevi.........
I am finding it quite difficult to get those poems.Do tell me if u can help.
Gagan