20 April 2007

ज़िंदगी एक जश्न है
हर मोड़ पर टूटते ख्वाब
बिखरते ख्यालात
परेशानियां, उलझनें
इन सबको समेटते हुए
ज़िंदगी एक जश्न है
थोड़ी सी ख़ुशी
और
मुश्किलों के अंबार
ठोकर खाकर गिरता-उठता इंसान
जूझता,झिंझोड़ता,
फिर चल पड़ता
उम्मीद का दामन थाम
ज़िंदगी एक जश्न है
एक दौड़, एक प्यास
जीवन के प्रारंभ से अंत तक
थक कर बैठ गए फिर भी
ज़िंदगी एक जश्न है

6 comments:

Manish said...

ऐसी सोच के साथ जिंदगी जीने से कई परेशानियाँ तो यूं ही दूर हो जाएँगी ।

Divine India said...

जिंदगी को देखने का आपका नजरिया सुंदर है…कविता में भाव उभर कर सच बयान कर रहे है…।बधाई।

कामगार-श्रमिक said...

किसी अच्छी सी कविता की किताब की एक कविता है ये.. पुस्तक कब सामने आएगी..?

Fan said...

प्रेरक रचना.. बधाई.
नीरज दीवान
http://neerajdiwan.wordpress.com

कहने में क्या हानि said...

ज़िदगी एक जश्न कैसे हो गई? जब पूरी कविता में जीवन की निराशाओं और ठोकरों की ओर इशारा है तो-एक बात। और दूसरा कि यह एक निराशा की कविता है लेकिन अच्छी बात ये ही कि इसमें निराशावाद नहीं है। निराशा ही आशा को जन्म देती है। वक्त मिले जो इसके पास ही घड़ी में है ही तो इसका शिल्प और कथ्य पर काम कर दीजीए।

कहने में क्या हानि said...

ज़िदगी एक जश्न कैसे हो गई? जब पूरी कविता में जीवन की निराशाओं और ठोकरों की ओर इशारा है तो-एक बात। और दूसरा कि यह एक निराशा की कविता है लेकिन अच्छी बात ये ही कि इसमें निराशावाद नहीं है। निराशा ही आशा को जन्म देती है। वक्त मिले जो इसके पास ही घड़ी में है ही तो इसका शिल्प और कथ्य पर काम कर दीजीए।