01 February 2015

कवि वीरेन डंगवाल से एक मुलाकात






वीरेन डंगवाल जी के साथ ये मुलाकात हासिल करना मेरे लिए एक सुंदर सपने के सच होने जैसा ही है। जिनकी कविताओं की रौशनाई में समंदर सितार बन जाता है, बच्चा कबाड़ी की संगीतमय पुकार अज़ान बन जाती है,जो अरे,अबे,ओ करुणानिधान करते हुए भगवान के कारखाने की दरयाफ्त कर आते हैं और कद्दू-समोसे, नाक तक की खबर लेते हैं। कभी अबे गधे कहकर कान खींचते हैं। अपनी ही परछाईं में खुद को ढूंढ़ते हैं तो कभी न लिए गए चुंबन में।

उनसे मिलने से पहले मैंने सोचा कि  कुछ तैयारी कर लूं, उनकी कुछ कविताएं कंठस्थ कर लूं, पर ऐसा कर न सकी। कुछ लोगों को नजदीक से देखकर लगता है कि एक साधारण व्यक्ति कितना असाधारण जीवन जी सकता है। किस तरह लोगों का मार्गदर्शन करता है। हमारी दुविधाओं से हमें उबारने में कवि कितनी मदद कर सकता है। निश्चित तौर पर वीरेन जी ऐसे ही लोगों में से एक हैं। बिना किसी आडंबर, लाग-लपेट के, साफ दिल-साफगोई, एक खुली किताब से मिलना हुआ हो जैसे।

वीरेन जी की सेहत पिछले दिनों काफी खराब रही थी। पर अब पहले से काफी सुधार था।  खुद वीरेन जी ने कहा कि एक बार फिर नए सिरे से उन्होंने लिखने की कोशिश की है। बीमारी ने जैसे दिल-दिमाग के पन्नों पर रबर से मिटाकर सबकुछ साफ कर दिया हो। बीमारी से लड़ते हुए एक बार फिर वो शब्दों का संसार रचने को तैयार हो गए हैं। अपने पोते-पोती पर लिखी एक कविता का  जिक्र  किया और बीमारी लड़ते हुए मन का भी।

इस अंधेरे में तेज़ रोशनियों ने बचाया मुझे/ या अक्टूबर की ओज से आभासित / चांद की स्मृति ने/या तुम्हारे प्यार ने/ मैं नहीं बताऊंगा/ इस बीमारी में/ अबतक दवाओं और डॉक्टरों ने बचाए रखा मुझे/ या किसी उम्मीद ने
/ या तुम्हारे प्यार ने/ मैं नहीं बताऊंगा

वीरेन जी के साथ पत्रकारिता और पत्रकारों की मौजूदा हालात पर बात हुई।  पत्रकारिता के क्षेत्र में निराशा छा गयी है जैसे। कई सालों की मेहनत के बाद अचानक नौकरी से बेदखली। एक-दो नहीं एक पूरी जमात कोअचानक सड़क पर ला देना। एक व्यक्ति के साथ एक परिवार के आगे रोजी-रोटी चलाने का आर्थिक संकट।
वीरेन जी ने कहा कि पत्रकार और पत्रकारिता इस समय बेहद संकट भरे हालात से गुजर रहे हैं।  
पत्रकारिता का इस समय जो हश्र है मेरा ख्याल है कि पिछले डेढ़ सौ सालों में ऐसा नहीं हुआ। काबिल लोग निकाले जा रहे हैं बिना किसी वजह के। जब से पूंजीपतियों के हाथ में मीडिया आ गया है, स्थिति बदतर हुई जा रही है। अखबारों और टीवी का तो अब कोई भविष्य नहीं दिखता। इंटरनेट का ज़माना आ गया है। अब भविष्य इंटरनेट और वेबसाइट्स का ही है। वर्तमान से जूझते हुए एक नए भविष्य की कल्पना से तर दिखे वो।

इस बीच उन्होंने इलाहाबादी बोली में अपनी पत्नी को कहा-ज़रा चइया त बोल दई….उधर चाय बन रही थी इधर हमने मौके का फायदा उठाते हुए कुछ तस्वीरें मोबाइल कैमरे में उतार लीं। वो भी सहर्ष तैयार हुए...हां-हां क्यों नहीं, फोटो ले लो। घर में उनकी पत्नी के साथ बेटे-बहू-पोते-पोती मौजूद थे। हमारी चाय आ गई और अब कविताओं पर कुछ बात हो रही थी। मैं उनकी वो कविता याद कर रही थी….

अपना कारखाना बंद कर के/ किस घोंसले में जा छिपे हो भगवान/ कौन सा है वो सातवां आसमान/हे, अरे, अबे, ओ करुणानिधान

वीरेन जी ने अपनी कविताएं सुनाने के लिए अगली बैठक का वादा किया और मुझसे मेरी कविता सुनाने को कहा। लगा कि उनके सामने ऐसा करने की हिमाकत मैं कैसे कर सकती हूं। मैंने भी अगली मुलाकात में कविताएं सुनाने की बात कही। फेसबुक-ट्विटर के दौर में वो बोले कि आज तो लेखक चाहते हैं कि वो फटाफट कुछ लिखें और उसे ढेर सारे लाइक्स मिल जाएं। सब्र नहीं है। अच्छी कविता, अच्छा लेख लिखने के बाद उसे समय देना चाहिए। या तो लोग लिख नहीं रहे अब, और लिख रहे हैं तो ऐसे कि बस....।  मैं मन ही मन हंसी कि सचमुच कितने लाइक्स मिले..का बेसब्री से लोग इंतज़ार करते हैं, लाइक्स गिनते हैं। वीरेन जी ने कहा कि अब वो भी फेसबुक, ब्लॉग देखने लगे हैं।  उन्होंने मुझसे मेरा ब्लॉग देखने का वादा भी किया। मेरी कविताएं ब्लॉग पर पढ़ने को मिलेंगी या  नहीं ये भी पूछ रहे थे। और मैं संकोच में डूबी जा रही थी क्या मेरी कविताएं वीरेन जो को सुनाए जाने  लायक हैं।
उन्होंने बताया कि खुद भी वो फेसबुक और सोशल साइट्स को समझने की कोशिश कर रहे हैं। कुछ लाइक-वाइक करना सीख रहे हैं।

इसके बाद उन्होंने पुराने मित्रों-परीचितों के साथ कविता पाठ का कार्यक्रम भी तय किया। मुझे भी उसमें बुलाया.- वर्षा बेटा तुम भी जरूर आना। मेरे लिए यही बड़ी बात थी।  
इलाहाबाद, पत्रकारिता, कविता, साहित्य की दुनिया से गुजरते हुए अब चलने का समय हो आया था।  अपनी आवाज़ में  निराला जी की पंक्तियां सुनाकर उन्होंने मुलाकात को और खूबसूरत बना दिया….

स्नेह निर्झर बह गया है
रेत ज्यों तन रह गया है
आम की ये डाल जो सूखी दिखी
कह रही है- “अब यहां पिक या शिखी
नहीं आते; पंक्ति मैं वह हूं लिखी
नहीं जिसका अर्थ
जीवन दह गया है”

मैंने सोचा वीरेन जी की आवाज़ में कितनी गहराई है, जैसे गले से नहीं बल्कि कविता की किसी गहरी नदी, घने जंगल से आ रही हो।

2 comments:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

सार्थक प्रस्तुति।
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आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल सोमवार (02-02-2015) को "डोरबैल पर अपनी अँगुली" (चर्चा मंच अंक-1877) पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ...
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

धीरेश said...

नाउमीदियों और संकटों में भी वे ऊर्जाओं से भरे इंसान हैं। शानदार मुलाकातों वाले दुर्लभ इंसान। बेहतरीन कवि तो हैं ही। मिलने वाले को अपनी मुहब्बत के जाल में फंसा लेने वाले वीरेन डंगवाल।