06 March 2014

अपनी दुनिया की 'हीरो'




मेरी बेटी को डोरेमॉन बहुत पसंद है। वो छोटा भीम देखती है। कृष्णा देखती है। ऑगी देखती है। टॉम एंड जेरी देखती है। उसकी कल्पना के संसार में डोरेमॉन, छोटा भीम, कान्हा, ऑगी जैसे कैरेक्टर हैं। एक ताकतवर हीरो के रूप में उसके सामने छोटा भीम है। एक स्मार्ट कैरेक्टर डोरेमॉन का है। कान्हा की बदमाशियां हैं, कान्हा बुरे लोगों को मारता है।
पिछले दिनों अपनी चार साल की बेटी की बातों से मैंने जाना कि वो खुद को कमज़ोर मानने लगी है। वो ये जानने लगी है कि लड़कियां शारीरिक तौर पर कुछ कमज़ोर होती हैं। गौर करनेवाली बात है कि वो कोमलता की बात नहीं कर रही थी, कमज़ोरी की बात कर रही थी। मैं परेशान हुई और लगातार इस बारे में सोच रही थी। उसे समझाने की कोशिश कर रही थी कि असल ताकत तो दरअसल दिमाग में होती है। चार साल की बच्ची का आत्मविश्वास कैसे बढ़ाया जाए। ये आसान बात तो नहीं।
मैंने ग़ौर किया कि मेरी बेटी की कार्टून सीरियल की दुनिया में कोई लड़की कैरेक्टर नहीं। डॉरेमॉन में शुजुका है लेकिन उसका किरदार साइड कैरेक्टर जैसा ही है। छोटा भीम में छुटकी का किरदार भी साइड लाइन वाला ही है।
फिर मैंने ऐसे कार्टून तलाशने शुरू किए जिसमें मज़बूत लड़की किरदार हो। ऐसे कार्टून सीरियल मिले तो लेकिन वो कामयाब सीरियल नहीं हैं। पावरपफ गर्ल्स समेत कुछ और ऐसे कार्टून के बारे में मैंने जाना। फिर मैंने ये भी सोचा कि लड़की कैरेक्टर वाले कार्टून खूब क्यों नहीं देखे गए। पॉप्युलर क्यों नहीं हुए। वो ऐसे बने नहीं। बने तो फिर उन्हें देखनेवाला दर्शकवर्ग (चाहे वो बालदर्शक ही क्यों न हों) ये बात स्वीकार नहीं कर सका कि लड़कियां भी चमत्कृत ढंग से कुछ काम कर सकती हैं। बच्चों की दुनिया में एक तरफ स्पाइडरमैन, सुपरमैन, बैटमैन हैं। जो बुरे लोगों और बुराई से लड़ते हैं। लोगों की मदद करते हैं। लेकिन इसके दूसरे छोर पर कोई स्ट्रॉन्ग वुमन किरदार नहीं है। फिल्म और सीरियल बनानेवाले लोगों ने ऐसे स्त्री किरदार को गढ़ने में कोई ख़ास दिलचस्पी नहीं दिखायी। उसे कामयाब करने के लिए कोई फॉर्मूला नहीं सोचा। जबकि हर कार्टून सीरियल में हीरो की एक ख़ास स्त्री दोस्त है, जो उसे समझती है, उसकी दोस्त होती है, उसके साथ मिलकर दुश्मनों से मुक़ाबला करती है लेकिन वो उस सीरियल की हीरो नहीं होती।

झांसी की रानी लक्ष्मीबाई के किरदार पर टेलिविज़न में काम तो हुआ। मगर ऐसा प्रभावी नहीं कि लोग उस सीरियल को बार-बार याद करें और देखना चाहें। कल्पनाशक्ति से नए और प्रभावी फीमेल कैरेक्टर्स उस तरह गढ़े नहीं गए। सोप ओपेरा में तो औरतों की कमज़ोर, झगड़ालू या फिर सती सावित्रीवाली छवि दर्शायी जाती है। जो और भी खराब और खतरनाक है। बच्चियों की दुनिया का क्या। बार्बी, स्नोव्हाइट परियों की सी कहानियां हैं। सिन्ड्रेला एक अच्छा राजकुमार चाहती है। ये सीरियल बच्चियों को मज़बूती तो नहीं देते हां उनके कोमल सपनों के संसार को विस्तार देते हैं।
हमारे निर्माता-निर्देशकों,फिल्म-टेलिविज़न से जुड़े लोग क्या छोटी बच्चियों के लिए वो कोई ऐसा मजबूत किरदार नहीं गढ़ सकते, जो लड़की हो, अपने दिमाग़, अपने हौसले से मुश्किलों को आसान करती हो। बड़ी से बड़ी चुनौतियों का सामना करती हो।  
जबकि असल दुनिया में तो ऐसे बहुत से किरदार हैं। इंदिरा गांधी, सोनिया गांधी, ममता बनर्जी, मायावती, जयललिता ये देश और राज्य को लीड करनेवाली महिलाएं हैं। सिनेमा तो समाज का आइना होता है। सिनेमा ऐसा कोई किरदार नहीं गढ़ पाया जो बच्चियों को उनके टेलिविज़न की दुनिया में एक महिला लीडर दे। लड़कियों के सामने कोई तो मज़बूत कैरेक्टर हो जिसकी तरह वो बनना चाहें।



जबकि इस समय में बच्चियां अपने ईर्दगिर्द अपेक्षाकृत मजबूत महिलाओं को देख रही हैं। जो स्कूल-कॉलेज-दफ्तर जा रही हैं। हालांकि घर में ज्यादातर वो पुरुष सदस्य का प्रभुत्व देखती हैं। लेकिन हमारी दुनिया के समय से इनकी दुनिया के समय में अपेक्षाकृत मजबूत महिलाएं दिख रही हैं। जो अपने फैसले खुद ले रही हैं। जो अपनी इच्छाओं को बात-बात पर मारती नहीं। बची हुई आखिरी रोटी नहीं खातीं। लड़कियों की दुनिया में अब स्कूल, स्कूल के बाद कॉलेज, कॉलेज के बाद ऑफिस की तस्वीर साफ हुई है। यानी एक कामकाजी,मज़बूत महिला की।



अपनी बेटी को बढ़ता देख मैं समझने की कोशिश कर रही हूं कि कैसे लड़कियों की दुनिया बुनी जाती है। उनके दिमाग़ में चित्र गढ़े जाते हैं। जिसमें धीरे-धीरे बच्चियां स्वीकार कर लेती हैं कि वो कुछ कमतर हैं, वो अपनी दुनिया की हीरो नहीं, साइडलाइन कैरेक्टर हैं, हीरो की दोस्त हैं। जो इसे नहीं स्वीकार करतीं रिबैलियस कहलाती हैं। मैं चाहती हूं लड़कियों की दुनिया में ज्यादा से ज्यादा रिबैलियस हों। सीधा होना अच्छा तो है मगर सफल नहीं।


 (चित्र गूगल से साभार)

2 comments:

Anurag Sharma said...

आपकी चिंता वाजिब है। निर्माता-निर्देशकों-लेखकों को इस बात पर ध्यान देना चाहिए। कार्टून फिल्मों में इस समय मुलान याद आ रही है। और टीवी कार्टून में डिज्नी की किमपॉसिबल शृंखला

Ek ziddi dhun said...

ठीक कह रही हो।