26 January 2011

घर
जो घर से ज्यादा फ्लैट है
जाड़ों में पांच बजे सुबह
जो सुबह से ज्यादा रात थी
सोसाइटी
जो मोहल्लों का संक्षिप्त, मॉर्डन रूप है

निकलते ही गाड़ी थर्ड गियर में डाली
और अंधेरे ने डरा दिया
सनसनीखेज़ वारदातों की
ख़बरें बनाने के पेशे में हूं
जिसमें
यूपी पुलिस को छक कर गालियां दी जाती हैं
सारी वारदातें सेकेंड के सौवें हिस्से में ज़ेहन से गुज़र गईं
आधा रोमांटिसिज़्म, आधा डर
और पूरी मैं

दफ्तर का रास्ता तेज़ रफ़्तार में तय किया
रास्ते में खड़े पंचर ट्रक मिले
ख्याल आया
खड़े ट्रक से भिड़कर जबरदस्त एक्सीडेंट की ख़बरें भी बनाई हैं

पर सुबह से ठीक पहले रात
बड़ी नर्म, मुलायम, प्यारी थी
रात से मुझे लगाव भी ज्यादा है

10 मिनट में दफ्तर पहुंची
और सीधा नेट पर फैज़ को पढ़ा
कम्प्यूटर के कीबोर्ड पर
अपने शब्दों की किटकिट शुरू करने से पहले
एक प्याली चाय के लिए
दफ्तर के बाहर ठेले पर गई

सामने से बस गुज़री
पीछे की दो सीटें खाली थी बस
सामने पीछे कुछ आग ताप रहे लोग भी थे
अंधेरे में आग की छोटी लपटें
बड़ी फोटोज़ेनिक लग रही थीं
एक बिस्किट के साथ बढ़िया चाय
पूरे दिन का शिड्यूल ख्याल आया
लगा
ये ज़िंदगी
या तो एक तेज़ भागती धड़धड़ाती कविता है
या फिर मशीन
सोचा इस पर कुछ लिखूंगी
कोई कविता
जो लिखनी आती नहीं

2 comments:

कुश said...

अल्टीमेट..

ना लिखना आने के बावजूद ये लिखा है तो गर आता होता तो क्या कयामत होती.. :)
बहुत साधारण सी चीजों को कितना असाधारण बना दिया.. कमाल है

संजय भास्कर said...

बहुत सार्थक और अच्छी सोच ....