31 January 2016

हॉस्टल लाइफ, ज़िंदगी जीने दो

(चित्र गूगल से साभार)

हॉस्टल। एक सख्त वॉर्डन। छोटे छोटे कमरे। कमरों में एक-दो तख्त सरीखे बिस्तर। एक छोटी सी आलमारी। किताबों का कोना। घर से लाए आचार का डिब्बा। नमकीन, मठरी, जिन्हें खाते ही मां की याद आ जाए। खट्टी मीठी यादें। गंदा कॉमन टायलेट। तमाम शिकायतें। और ढेर सारे दोस्त। ढेर सारी शरारतें। कैंटीन से चोरी। मेस के खाने की बुराई। देर रात की मस्तियां। चुपके से मैगी वाली पार्टी।  लड़कियों का हॉस्टल है तो रात आठ बजे के बाद नो एंट्री का डर। हॉस्टल के बाहर खड़े लड़के दोस्त लोग। इंतजार। बदनामियां। खिलखिलाहटें। रात हॉस्टल की खिड़की से उतरता चांद। एफएम रेनबो पर बजते पुराने गाने। सपने। ख्वाहिशें। कठिनाईयां। मुश्किलें। सफ़र। मंज़िलें।

हॉस्टल की ज़िंदगी की बात ही अलग है। मेरा अपना विचार है कि लड़कियों को कम से कम दो-तीन साल हॉस्टल में जरूर रहना चाहिए। यहां ज़िंदगी के वे सबक सीखने को मिलते हैं, जो घर की महफूज चारदीवारियों में नहीं मिलते। एक इंसान को अपनी अच्छाइयों, कमियों को देखने-समझने की जो सीख हॉस्टल में मिलती है, और कहीं नहीं मिल सकती। जीने के लिए जरूरी खुला आकाश यहीं मिलता है। बेरोकटोक ज़िंदगी। जहां आपको अपने नियम खुद बनाने होते हैं। आकाश में उड़ती चिड़िया को पता होता है कि उसे कितनी ऊंचाई तक जाना चाहिए, कहां परों को थाम लेना चाहिए। लड़कियां जानती हैं अंधेरे और उजाले का रहस्य।

हॉस्टल में हम उन छोटी छोटी चीजों की कद्र करना सीख जाते हैं, जिनकी परवाह कभी नहीं की होती। मां की डांट भी यहां से प्यारी लगती है। बगावतों का जोश भी संयम बरतना सीख जाता है। घर में रोज रोज यही सब्जी वाली शिकायत का स्वाद, हॉस्टल के मेस की थाली में परोसे भोजन से समझ आ जाता है। पैसों को उड़ाने की कीमत यहां पता चल जाती है।

लड़कियों को क्यों हॉस्टल में जरूर रहना चाहिए। दरअसल मुझे लगता है कि यहां वे अपना वजूद तलाश-तराश सकती हैं। जैसे जंगली पेड़, झाड़ियां, नदियां अपने रास्ते खुद बनाते हैं। लड़कियों को अपने सपने चुनने, रास्ते बनाने, आत्म निर्भर बनने का सलीका यहां खुद ब खुद सीखने को मिल जाता है। सही गलत की पहचान, फैसले करने की क्षमता, अपने फैसलों का नतीजा भुगतने की हिम्मत, हॉस्टल में रह कर जिंदगी के कारोबार के जरूरी दावपेंच समझ आने लगते हैं। चिड़िया के पंख मजबूत होने लगते हैं। उसे उड़ने का सलीका आने लगता है। और यही तो असल सीख है।

दिक्कत भी है। ये कि हमारे यहां लड़कियों के हॉस्टल को जेल सरीखा बना दिया जाता है। ब्वाएज हॉस्टल में फिर भी आजादी है। गर्ल्स हॉस्टल पाबंदियों से इतने बिंधे हुए होते हैं कि जेल सरीखे हो जाते हैं। आने जाने के सख्त नियम, कोई मिलने आए तो उसे शक की निगाह से देखना। गेट बंद होने के समय के बाद लड़की पहुंची तो उसके कैरेक्टर पर अपना सर्टिफिकेट नवाज देना। दिल्ली यूनिवर्सिटी की छात्राओं ने गर्ल्स हॉस्टल को जेल बनाने की इसी बेफजूल सख्ती के खिलाफ पिंजड़ा तोड़ अभियान चलाया था। जिसे लड़के लड़कियों दोनों का भरपूर समर्थन मिला। आंदोलन हॉस्टल को पिंजड़ा बनाने के खिलाफ था।

हॉस्टल की धमाचौकड़ी, वहां गुजारे गए कुछ साल, जीवन भर की धरोहर बन जाते हैं। जिसे बाद में बार-बार मिस किया जाता है। वे भी क्या दिन थे। कई लड़कियों ने अपनी हॉस्टल लाइफ के अनुभव शेयर किए।

असिस्टेंट प्रोफेसर साक्षी हॉस्टल में गुजारे अपने तीन सालों को अपनी जिंदगी का सबसे बेहतरीन वक्त बताती हैं। मम्मी-पापा की याद तो आती थी, लेकिन फिर फ्रैंड्स ही एक दूसरे को इमोशनल सपोर्ट देते थे। हम बडी शरारतें करते थे। रात में वॉडर्न से छिप छिप कर मैगी की पार्टी करते थे। किसी के कमरे का दरवाजा बाहर से लॉक कर दिया और फिर हंसी के दौर शुरू हो जाते थे। हमने अपनी हॉस्टल लाइफ को खूब एन्ज्वाय किया और बहुत कुछ सीखा। रात में आठ बजे हॉस्टल पहुंच जाना सबसे बड़ी चुनौती होती थी, चाहें आप किसी वाजिब वजह से बाहर ही क्यों न हों लेकिन आठ बजे नहीं पहुंचे तो घर फोन पहुंच जाता था, ये बड़ी सिरदर्दी थी।


झारखंड की अन्वेषा ग़ाज़ियाबाद के हॉस्टल में रहकर पढ़ाई कर रही हैं। वे कहती हैं कि पहली बार मम्मी को छोड़कर आने में बहुत डर लगा, मैं बहुत रोई। लेकिन फिर धीरे धीरे इस लाइफ को जीने लगी। मजा आने लगा। दोस्तों के साथ हम बहुत सारी चीजें सीखते हैं। हम फैसला करना सीखते हैं। अन्वेषा बताती हैं कि उनके हॉस्टल की बहुत सारी लड़कियां सिगरेट पीती हैं, बियर पीती हैं। लेकिन फर्क नहीं पड़ता। यह उनकी ज़िंदगी है, वे जैसे चाहें जिएं। ये हमें तय करना होता है कि हम क्या करना चाहते हैं। मैं तो यहां खूब घूमती हूं। शायद ही ऐसा कोई दिन हो जब मैं हॉस्टल के बाहर नहीं निकलती। हॉस्टल से जाने के बाद मैं इस ज़िंदगी को मिस करूंगी।

हॉस्टल में रह चुकीं तमाम लड़कियों से मेरी जो बातें हुईं, उससे मैं तो यही चाहती हूं कि हर लड़की को कम से कम दो साल हॉस्टल में जरूर रहना चाहिए। जहां उन्हें ज़िंदगी का स्वाद मिल सके, भले ही घर के खाने का स्वाद कुछ दिनों के लिए क्यों न छूट जाए। ज्यादातर की शिकायत हॉस्टल के खाने से ही थी। दोस्तों के साथ घूमना फिरना, मस्ती करना और पढ़ाई भी, इन चीजों को वे आज मिस करती हैं। हॉस्टल के नाम से ही उनके चेहरे पर एक मुस्कान तैर जाती है। हॉस्टल लाइफ। वे भी क्या दिन थे।




4 comments:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल सोमवार (01-02-2016) को "छद्म आधुनिकता" (चर्चा अंक-2239) पर भी होगी।
--
सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
--
चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल सोमवार (01-02-2016) को "छद्म आधुनिकता" (चर्चा अंक-2239) पर भी होगी।
--
सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
--
चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

ई. प्रदीप कुमार साहनी said...

उम्दा पोस्ट । शोध रुपी लेख ।

आपके ब्लॉग को यहाँ शामिल किया गया है ।
ब्लॉग"दीप"

यहाँ भी पधारें-
तेजाब हमले के पीड़िता की व्यथा-
"कैसा तेरा प्यार था"

संजय भास्‍कर said...


आपकी यह उत्कृष्ट प्रस्तुति कल गुरुवार, 4 फ़रवरी 2016 को ( पाँच लिंकों का आनन्द ) http://halchalwith5links.blogspot.in पर ( अंक - 202 ) पर लिंक की गयी है, कृपया पधारें और अपने विचारों से अवगत करायें ब्लॉग पर आपका स्वागत है -- धन्यवाद

--संजय भास्कर