12 May 2008

बातें

बातें कितनी अच्छी होती हैं। समंदर की बातें करिये और आप समंदर किनारे पहुंच जाते हैं। बर्फ़ की बातें करिये और दिमाग़ पैरों तले बर्फ़ की सफ़ेद चादर बिछा देता है। रेत की बात छिड़े तो रेगिस्तान के थपेड़े महसूस होने लगते हैं। बातें, दिमाग़ और शब्द मिलकर सेकेंट के सौवें हिस्से से भी कम समय में आपको भारत से अमेरिका पहुंचा सकते हैं। बातों के ज़रिये उत्तरी ध्रुव से दक्षिणी ध्रुव जाने में सेकेंड का कौन सा हिस्सा लगेगा, ये मापा भी नहीं जा सकता। हैरी पॉटर भी अपनी जादुई छड़ी हिलाकर इतनी जल्दी हमें यहां से वहां नहीं भेज सकता। बातों-बातों में हम जाने क्या-क्या बातें कर जाते हैं। बहुत ऊंची-ऊंची बातें करनेवालों को बुद्धिजीवी फ़र्ज़ी ठहराते हैं। निंदा रस की बातों का मज़ा ही दूसरा होता है। बातें नहीं करते तो घुन्ने कहलाते हैं, बातें बहुत करते हैं तो कहते हैं कि बात बनाते हैं। कुछ लोग बहुत अच्छा बोलते हैं लेकिन दिल के बहुत कड़वे होते हैं। कुछ बहुत कड़वी बातें बोलते हैं मगर दिल के बहुत अच्छे होते हैं। बातों से हम कितना बंधे हैं। अगर कोई अपना साथ छोड़ चला जाता है तो सबसे ज्यादा बातों की ही तो कमी खलती है, न मुलाक़ात होगी, न बात होगी। बातें ही तो हैं जिस पर ज़िंदगी चलती है।

4 comments:

Udan Tashtari said...

सही है-बातों की बात निराली.

mahashakti said...

बात की बात बात बहुत अच्‍छी बात आपने लिखी है ।

संदीप said...

बात निकलेगी, तो दूर तलक जाएगी....

हर्षवर्धन said...

बात, बतकही, बतंगड़ में जो मजा है वो और कहां।