03 January 2011











तुम उनकी साज़िशों को खत्म कर दोगे
तुम प्रवंचना की उनकी कुटिल
चालों का अंत कर दोगे
हत्याएं करने-करवाने की
ठंडी फांसियां देने-दिलवाने की
चुपचाप ज़हर घोलने-घुलवाने की
कारागार की नाटकीय कोठरियों में
मानवता को गलाने-गलवाने की
यानी, उनकी एक-एक साज़िश को
तुम खत्म कर दोगे
हमेशा-हमेशा के लिए
मैं तुम्हारा ही पता लगाने के लिए
घूमता फिर रहा हूं
सारा-सारा दिन, सारी-सारी रात
आगामी युगों के मुक्ति सैनिक
कहां हो तुम?
{विनायक सेन, फिर शंकर गुहा नियोगी के बारे में जानकारियां जुटाते-जुटाते बाबा नागार्जुन की कविता पढ़ने को मिल गई... }

30 November 2010


ड्राइविंग सीट पर बैठने के बाद, हैंड्ब्रेक नीचे, सर्दियों की शुरुआत हो चुकी है तो शीशा आधा खुला, रियर व्यू मिरर को सेट किया, फर्स्ट गेयर, एक्सलरेटर पर पैर दबाया, क्लच छोड़ा, पार्किंग से गाड़ी निकालने के लिए हैंडल बायीं ओर पूरा मोड़ दिया और क्लच छोड़ने के कुछ सेकेंड बाद हैंडल से हाथ हटाया, गाड़ी के पहिये सीधे,ज़ोर का रॉर्न ताकि सिक्योरिटी गार्ड गेट खोलने का अपना काम तय समय पर कर दें, गाड़ी रोकनी न पड़े।

पहला राइट और फिर लेफ्ट, सुबह तड़के का वक़्त है तो स्कूली बच्चों, धीमी रफ्तार में बढ़ रहे रिक्शे, सड़कें खाली समझ किसी भी मोड़ या कट प्वाइंट से बेधड़क चले आनेवाले वाहनों को बचाते-संभालते, चालीस, पचास, साठ, अचानक दस, बीस, तीस, स्पीडोमीटर पर रफ्तार की सुई टहल रही थी। साठ-सत्तर मीटर के बाद आ गया हाईवे, अब राइट होना है।

सुबह रेडलाइट क्रॉस करने में कोई दिक्कत नहीं, बस चारों तरफ आ रही गाड़ियों पर सेकेंड में फैसला कर लेनेवाली नज़र डाल लेनी होती है, फैसला हुआ, दूर से दौड़ती आ रही बस अभी दूर ही थी, रेडलाइट क्रॉस, राइट टर्न।

ड्राइविंग में बार-बार रियर मिरर देखना अच्छा नहीं माना जाता, लेकिन यहां तो बार-बार निगाह रियर मिरर पर ही जा रही थी, जाने कौन डिपर मार रहा था, हल्की केसरिया रोशनी रियर व्यू मिरर पर पसर रही थी, लगा कौन है, इतनी सुबह मुझसे भी ज्यादा तेज़ी से भागने की हड़बड़ी में, मेरे ऑफिस में तो वक़्त पर न पहुंचो ते लेट लग जाती है, तीन लेट पर एक दिन की छुट्टी कट और मैं दो बार लेट हो चुकी थी, इस महीने तीसरे लेट के मूड में नहीं थी, तो एक्सलरेटर पर पांवों के दबाव से स्पीडोमीटर की सुई को ऊपर की ओर भगा रही ती। फिर किसी ने डिपर मारा। अब मैंने ध्यान दे ही दिया और डिपर मारनेवाले को देख हैरत, मुस्कान, अपनी गलती पर ध्यान, हड़बड़ी की समाप्ति, कई भाव-विचार एक साथ आते-जाते गए।

ये तो धरती के सबसे करीब रहनेवाला तारा था। आग का गोला। जो हमारे दिन रात को तय करता था। जिसकी किसी सूरत में लेट मार्क तो नहीं होती होगी, होती भी कैसे, ये तो समय का पाबंद था, नहीं तो हमारा समय गड्डमडड हो जाता। सिर्फ हमारा क्यों, पेड़ों का, चिड़ियों का, कुत्तों का, सबका शेड्यूल बिगड़ जाता। इसलिए इस तारे को लेट होने की इजाज़त नहीं थी। महीने में एक दिन भी नहीं। हां बादल, धुंध इसे दिखने से रोक सकते हैं लेकिन ये आ तो अपने तय वक़्त पर जाता है, हां वक़्त मौसम के हिसाब से बदल लेता है, पर एक फिक्स शेड्यूल में तो ये आग का गोला रहता ही है।

तो मैं लेट हो रही थी और रियर मिरर में अचानक इसकी डिपर को देख जैसे बहुत सारी बातें एक साथ समझ आ गईं। एक्सलरेटर पर दबाव अब इतना नहीं था। स्पीडोमीटर की सुई भी इत्मीनान में आ गई थी। हाईवे से लेफ्ट टर्न कर मैं नीचे उतर गई थी। जहां स्कूल बसें ज्यादा मिलती हैं। अब ये तारा रियर व्यू मिरर की जगह थोड़ा लेफ्ट को खिसक कर अपनी केसरिया रोशनी फेंक रहा था। कह रहा था जैसे संभल, थोड़ा धीरे जल। मैंने कहा चल हट, गाड़ी लेफ्ट राइट होने पर मैं उसकी पकड़ से आजा़द हो जाती, लेकिन फिर एकाएक वो डिपर मार देता। कुछ और दूर तक हमारा ये खेल चला। वो मुझे समझाता रहा। हां मैं समझती भी रही।

हड़बड़ी खत्म हो चुकी थी। अब गाड़ी आराम से बढ़ रही थी, ऑफिस में प्रवेश के साथ इसे टाटा-बाय-बाय करने का वक़्त आ गया था। क्योंकि अभी तो ये रियर मिरर में नहीं आनेवाला। लेकिन इसकी डिपर ने आज की सुबह शानदार कर दी थी। लेकिन कल लेट नहीं होऊंगी, ऐसा मैं आज दावे से नहीं कह सकती।

सॉरी सूरज।

23 November 2010

गुड-गुड, ओके-ओके


मुस्कान ऐसी हो
मुस्कान ऐसी कि होठों को चीरकर कानों तक भाग जाए, दांत 32 की जगह(अगर पूरे 32 होते हों) 64 होने को बेक़रार हों।
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रीढ़ कैसी हो
रीढ़ जिसकी पांवों के साथ 90 डिग्री का कोण मौका भांपकर तत्काल बनाए। क्षण के सौवें हिस्से में प्रकाश की गति से तेज़ ये कोण बनता और बिगड़ता हो।
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दिमाग़ हो तो ऐसा
सत्तासीन और सत्तासीन के क़रीब रहनेवाले(चाहे चतुर्थश्रेणी में आनेवाले चपरासी हों)से पूरी संजीदगी के साथ वही बात करें कि दिन को रात कहें तो रात ही लगे, चाहे अपने घर की लाइटें बुझानी पड़े। मस्तिष्क जिसका कोई प्रतिक्रिया न देता हो, सिर्फ वही करता हो जो कहा जाता हो। ऐसा नेचुरल प्रॉसेस के तहत हो, अभिनय नहीं।
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उपस्थिति
तेज़ आवाज़, भौकाल करने की जबरदस्त क्षमता कि एक ही बार में उपस्थिति दर्ज हो जाए, बाद में चाहे ग़ुमशुदा-ग़ुमशुदा।
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नाराज़गी
इसमें भी कुछ बात होनी चाहिए कि लोग पूरी सहानुभूति के साथ बोलें अरे वो नाराज़ है, आपको मनाने को लोग आतुर हों, इस अभिनय में ब्रेक न लें, लगातार रोनी सूरत बनाए रखें।
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ज़ुबान
हां, जी, यस, ओके, ठीक, सही, वाह, कमाल, बढ़िया, बिलकुल जैसे शब्द बोलने की ज़ुबान को आदत हो, इसके विलोम आते ही न हों।
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कान
अबे, बदतमीज़, बेवकूफ, गधा, काट डालूंगा, मार डालूंगा, ऐसा कैसे, कैसे-वैसे-जैसे-जैसे, ये करो, वो करो, ये न करो, वो न करो, समझे, नहीं समझे, समझा दूंगा, ये करो, वो करो....जैसी बातें कान ठीक-ठीक सुनना जानते हों।

यदि ये योग्यताएं आप रखते हैं तो किसी भी नौकरी में तरक्की तय है। चाहे इंजीनियरिंग की पढ़ाई करके डॉक्टरी करने निकले हों या फिर डाटा एंट्री ऑपरेटर के जैसे पत्रकारिता करने निकले हों।

16 November 2010




रिहाई मुबारक
कुछ लोग पर्वत से होते हैं, अडिग, निर्भय। आंग सांग सू ची, मणिपुर की इरोम शर्मिला...इन नामों को सुनकर सहम भी जाती हूं,फक्र भी होता है, प्रेरणा भी मिलती है। ये जीतेजागते लोग दरअसल ज़िंदगी हैं। इनकी नज़रबंदी, इनकी भूख हड़ताल, ज़िंदगी की असली जद्दोजहद है, कहां हम थोड़ी-थोड़ी बातों के लिए घबराते हैं,अपनी छोटी-छोटी मुश्किलों के पहाड़ में दबे रह जाते हैं। ये हिम्मत देती हैं, हमें, हमारे हौसले को।

28 June 2010

तो क्या ख्याल है


एक ख्याल आया अभी-अभी। नौकरी की उकताहट, मन में क्रिएटिविटी के उडते बुलबलों के बीच।
ख्याल की शुरुआत यहां से हुई कि मैं जहां रहती हूं पास में ही एक शॉपिंग कॉम्पलेक्स सरीखा है। बीच में फव्वारों के लिए बनी लंबी हौदी सी। दोनों तरफ खाने-पीने के लिये लगी रेस्तरां वालों की मेज़ें, उनसे आगे दुकानों का लंबा घेरा। गिफ्ट्स, गेम्स की एक शॉप है। उसकी मालकिन एक हल्की मोटी सी(अपने आगे सब हलके मोटे ही लगते हैं), ख़ुशमिज़ाज औरत है। उसकी एक कर्मचारी लड़की भी है। तिब्बत की है शायद। अच्छी फिगरवाली,घुटने तक की जींस पहनती है, स्मार्ट सी। उसे देख सोचती हूं पैसों की कितनी जरूरत होगी जो वो यहां काम करती है। उसकी दुकान मुझे पसंद है। वहां से मैं विंड चाइम, वॉल क्लॉक, शीशे के अंदर डांस करनेवाले जोड़े, पत्तियों की दो लताएं और काठ के घर में चीं-चीं करनेवाली चिड़िया, जैसी कई चीजें ले चुकी हूं।

तो ख्याल ये आया कि अगर मुझे वहां एक दुकान खोलने का विकल्प मिल जाता तो मैं किस चीज की दुकान खोलती (हालांकि मैं अच्छी तरह से जानती हूं ये काम मेरे बस का नहीं)।
और फिर जैसे कुल्हड़ में चाय पीते हैं, कुल्हड़ में लिक्विड चॉकलेट सरीखा कुछ ज़ेहन में उभर आया। मैंने सोचा चॉकलेट और बुक कैफे। लेकिन चाय और गर्मागरम कॉफी को छोड़ने का सवाल ही नहीं उठता।
तो तय पाया गया... चाय,चॉकलेट,कॉफी और बुक कैफे। मन में ख़ुश्बू भी उठने लगी। चॉकलेट,चाय,काफी की सुगंध तो मुझे बहुत प्रिय है। नाक से ज़ोर की लंबी सांस खींचों और सुगंध को अंदर तक डुबो लो। आ..हा। सबकुछ कुल्हड़ में मिलेगा। कुल्हड़ भी थोड़े स्टाइलिश होंगे। वाह, मुंगेरीलाल के हसीन सपने।

16 June 2010



इससे अच्छी तो बेइज्जती ठहरी।
16 साल का लड़का अपनी बहन के प्रेमी का कत्ल कर देता है। हम इसे ऑनर किलिंग कहते हैं। पिता, बेटी और उसके प्रेमी की हत्या कर देता है, ऑनर किलिंग है। ऑनर किलिंग को समझने में बहुत दिक्कत आ रही है। इस टर्म का इस्तेमाल इतना बढ़ गया है। न्यूज चैनल्स और अखबार दोनों इसका इतना इस्तेमाल कर रहे हैं।

ऐसी कैसी इज्जत है जो बेटी के किसी से प्यार करने पर खतरे में आ जाती है। बड़ी कमज़ोर है ये इज्जत, लानत भेजो इस पर। बेटी अपनी मर्जी से शादी करना चाहती है और पिता भाई की इज्जत खतरे में आ जाती है। वाह। और फिर जिस इज्जत के नाम पर ऐसे कत्ल किये जा रहे हैं, उस इज्जत को कमाने के लिये इन पिता-भाइयों ने कौन से तीर मारे।
मतलब सोलह-सत्रह-अठारह साल के लड़के हत्या करते हैं और इसे ऑनर किलिंग का टर्म देकर ऐसा लगता है जैसे कि इन्हें महान बनाया जा रहा है। अरे उस लड़के-लड़की का प्यार समाज में कहां से अशांति पैदा कर रहा है। जिसे हम ऑनर किलिंग का नाम देकर कहीं किसी कोने में ऐसे कत्ल को सही भी ठहरा रहे हैं।

और फिर इतना ही ख्याल है ऑनर का तो खुद मर जाओ। न, ये नहीं करेंगे, अपनी ज़िंदगी बड़ी प्यारी है।
मैं अपनी तरफ से ऑनर किलिंग शब्द को पूरी तरह ख़ारिज करती हूं। ऑनर किलिंग कहकर हम ऐसी वारदातों को कहीं और बढ़ावा तो नहीं दे रहे?

24 May 2010

सब रिश्ते पीछे, टीवी से रिश्ता पहले

मेरी मां टीवी देखती थी दोपहर में, जब हम स्कूल में होते, पापा ऑफिस और वो अकेली, हालांकि शाम मोहल्ले की औरतों से गुलजार हो जाती।

मेरे सास-ससुर टीवी देखते हैं। एक ही सीरीयल बार-बार, वो एकता कपूर वाले। उनकी सुबह, दोपहर, शाम, रात सब टीवी के साथ होती है।

मेरे भतीजी-भतीजा पैदा होते ही टीवी के कीड़े हो गये हैं, वो टीवी के सामने से टलते नहीं, पड़ोस में खेलने जाने का दस्तूर भी खत्म हो गया है।

मेरे पतिदेव भी टीवी देखने के शौकीन हैं, पर फिल्में। उनके लिये फिल्में देखना किताब पढ़ने जैसा है। जब वो टीवी के सामने होते हैं तो घर में कर्फ्यू का सा माहौल हो जाता है(हालांकि मैं धारा 144 का खुलकर उल्लंघन करती हूं)।

मेरी 6 महीने की बच्ची टीवी के रंगों को देखकर ठहर जाती है। उसकी आंखें भी टीवी पर टंग जाती हैं।

ऐसा लगने लगा है टेलीविज़न दुनिया की सबसे कीमती ईजाद है।
अकेली औरत बोझिल दोपहर को काटने के लिये टीवी देखती है। बड़े बुजुर्गों का सहारा है टीवी, काटे नहीं कटते वक़्त को जो हौले से पार लगा देता है। मोहल्ले खत्म हो गये, गली-गली खेलतेबच्चों के झुंड खत्म हो गये। तो होमवर्क के बाद टीवी पर कार्टून देखते हैं बच्चे। कहीं घूमने जाने के बजाय भी लोग घर पर रहकर टीवी देखना पसंद करते हैं।

यही नहीं शादी-ब्याह और किसी के इंतकाल के मौके पर भी लोग टीवी न देख पायें तो अधूरा-अधूरा सा महसूस करते हैं। रिमोट को हाथ में थाम ही लेते हैं।

इसकी लाख बुराई की जाये, पर ये तो मानना ही पड़ेगा ये हमारी लाइफ लाइन बन गया है। टीवी की स्क्रीन में भागती तस्वीरों के बीच हमारी दुनिया सिमट गई है। सिर्फ मनोरंजन ही नहीं उससे भी एक कदम आगे टीवी की भूमिका हमारी ज़िंदगी में बन गई है।
यहां एक और बात लिखने का जी चाह रहा है, सुबह-सुबह ऑफिस के बाहर ठेले पर अपनी एक सहयोगी के साथ चाय की चुस्कियां लगा रही थी। ऑफिस कैंपस में आम का पेड़ है, उसे देखकर ख्याल आया, बचपन में हम भी तो आम के पेड़ पर चढ़े चुके हैं। उसका अपना ही मजा है। हमारे बच्चों को ये सुख नहीं मिलेगा। हां वो स्केटिंग कर रहे हैं,क्रिकेट-हॉकी खेल रहे हैं। लेकिन वो पेड़ों पर चढ़नेवाला जो अनुभव होता है, वो अतुलनीय है।
ख़ैर....
आखिर में मैं यही कहना चाहूंगी...दोस्त, टीवी का रिश्ता भी बड़ा गहरा होता है। टीवी को लेकर मां-बाप से लड़ाई हो जाती है। मियां-बीवी के बीच सांप्रदायिक सौहार्द बिगड़ने का सा माहौल हो जाता है।