हमारी आज़ादी की सभी उड़ानें रद्द हो जाती हैं, जब तय सीमा से ऊंचा उड़ने पर पता चलता है कि एक न दिखाई देनेवाली ज़ंजीर हमारे पैरों में पड़ी हुई है। भरपूर नीला आसमान जहां से दिखाई पड़ने लगता है, दूरियां जहां किसी स्केल पर नहीं नापी जा सकतीं, उस उड़ान का एहसास होने से पहले ही हमारे पंख फड़फड़ाने लग जाते हैं और अचानक पता चलता है कि एक बहुत मोटी ज़ंजीर में पैर जकड़े हुए हैं। इस जंज़ीर का पता उस बंधन के बाद सबसे ज्यादा शिद्दत से महसूस होता है जिसे हम शादी कहते हैं। अचानक पता चलता है अरे मैं तो बंध गई हूं, बंधन में नहीं, ज़ंजीर में। इस ज़ंजीर की ख़ास बात भी होती है। लड़की खुद को इससे छुड़ाने की कोशिश भी नहीं करती। ये ज़ंजीर आदत-मोहब्बत-मुसीबत सब बन जाती है। फिर ज़ंजीर तोड़कर खुला आसमान डराने लगता है, उड़ने की चाह भी दम तोड़ देती है।
हां शुरु-शुरू में वो फड़फड़ाती जरूर है। मदद के लिए कोई नहीं आता। जो आता है वो दुनियारी का रट्टू पाठ पढ़ाता है। ऐसा ही होता है, वैसा ही होता है, फिर फड़फड़ाहट भी कम होने लगती है। ज़िंदगी मशीन सरीखी होने लगती है। हर सुबह एक जैसी, हर दोपहर उनींदी, हर शाम उम्मीदें जगाती, हर रात उन उम्मीदों को दफ्न करती, वो मर चुकी होती है, ज़िंदा होने की सोई तमन्ना के साथ। हां वक़्त के साथ ये स्थिति बदली है। ज़ंजीर कुछ बड़ी हुई है, लेकिन टूटी नहीं। लड़की की ज़िंदगी एक जुआ होती है, दांव लग गया तो लग गया, नहीं तो गए काम से।
यहां गूंजते हैं स्त्रियों की मुक्ति के स्वर, बे-परदा, बे-शरम,जो बनाती है अपनी राह, कंकड़-पत्थर जोड़ जोड़,जो टूटती है तो फिर खुद को समेटती है, जो दिन में भी सपने देखती हैं और रातों को भी बेधड़क सड़कों पर निकल घूमना चाहती हैं, अपना अधिकार मांगती हैं। जो पुकारती है, सब लड़कियों को, कि दोस्तों जियो अपनी तरह, जियो ज़िंदगी की तरह
13 July 2008
05 July 2008
03 July 2008
दो कविताएं, डायरी से
लग जाने दो मुझे ठोकर
वो चोट मेरी अपनी होगी
उंगलियां पकड़-पकड़ चलने से
मेरा वज़ूद टूटता है
कदम गिर-गिरकर
फिर उठेंगे, फिर चलेंगे
और
मेरी वो राह अपनी होगी
मुझे ले लेने दो
मेरे हिस्से का दर्द
साथ निभाओ तो
साथी बनकर
जीवन मेरा
मैं जियूं जी भरकर
वो ज़िंदगी
मेरी अपनी होगी
--------
बहेलिया
रात की कराह पर बांवरा बहेलिया
ले चला सूर्य को हांकता बहेलिया
सरिता की धार पर प्यासा बहेलिया
ग़ुम गए किनारों को ढूंढ़ता बहेलिया
मंदिरों की बाड़ी पर घूमता बहेलिया
देख रहा भूख को नाचता बहेलिया
बंगलों की दहलीज़ पर फिरकता बहेलिया
रोटियों के दर्द को पुचकारता बहेलिया
धुंध के छलावों पर लौटता बहेलिया
ले चला नींद को दुलारता बहेलिया
वो चोट मेरी अपनी होगी
उंगलियां पकड़-पकड़ चलने से
मेरा वज़ूद टूटता है
कदम गिर-गिरकर
फिर उठेंगे, फिर चलेंगे
और
मेरी वो राह अपनी होगी
मुझे ले लेने दो
मेरे हिस्से का दर्द
साथ निभाओ तो
साथी बनकर
जीवन मेरा
मैं जियूं जी भरकर
वो ज़िंदगी
मेरी अपनी होगी
--------
बहेलिया
रात की कराह पर बांवरा बहेलिया
ले चला सूर्य को हांकता बहेलिया
सरिता की धार पर प्यासा बहेलिया
ग़ुम गए किनारों को ढूंढ़ता बहेलिया
मंदिरों की बाड़ी पर घूमता बहेलिया
देख रहा भूख को नाचता बहेलिया
बंगलों की दहलीज़ पर फिरकता बहेलिया
रोटियों के दर्द को पुचकारता बहेलिया
धुंध के छलावों पर लौटता बहेलिया
ले चला नींद को दुलारता बहेलिया
26 June 2008
एक बिहारी, एक राजस्थानी में कुछ और...
(मूल लेख ब्लॉग में दिख जाएगा)
कुछ और... इसलिए क्योंकि कुछ टिप्पणियों में बिहारवाद पर नाराजगी ज़ाहिर की गई थी। इसे मेरी सफाई और क़िस्सागोई की क्षमता की कमी भी मान सकते हैं। वो लेख मेरे एक राजस्थानी मित्र का अनुभव था। जिसे ब्लॉग में बताने का मक़सद बिहार और बिहारियों के साथ भेदभाव को बताना था। यूपी का होते हुए बिहार मेरे ज्यादा नज़दीक है। राजस्थानी से ज्यादा बिहारी मित्र हैं मेरे। जब किसी को बिहारी कहकर संबोधित किया जाता है तो वो मुझे ज्यादा अप्रिय लगता है। बिहार के आईएएस को दिल्ली का एक बस कंडक्टर भी बिहारी बोलकर ख़ारिज कर देता है। ऐसे मुद्दों पर कई बार मेरी बहस हो जाती है। पर मेरे लेखन से किसी को ठेस पहुंची हो तो सॉरी है भाई।
कुछ और... इसलिए क्योंकि कुछ टिप्पणियों में बिहारवाद पर नाराजगी ज़ाहिर की गई थी। इसे मेरी सफाई और क़िस्सागोई की क्षमता की कमी भी मान सकते हैं। वो लेख मेरे एक राजस्थानी मित्र का अनुभव था। जिसे ब्लॉग में बताने का मक़सद बिहार और बिहारियों के साथ भेदभाव को बताना था। यूपी का होते हुए बिहार मेरे ज्यादा नज़दीक है। राजस्थानी से ज्यादा बिहारी मित्र हैं मेरे। जब किसी को बिहारी कहकर संबोधित किया जाता है तो वो मुझे ज्यादा अप्रिय लगता है। बिहार के आईएएस को दिल्ली का एक बस कंडक्टर भी बिहारी बोलकर ख़ारिज कर देता है। ऐसे मुद्दों पर कई बार मेरी बहस हो जाती है। पर मेरे लेखन से किसी को ठेस पहुंची हो तो सॉरी है भाई।
आपके घर में कोई जेंट्स है?
सुबह क़रीब 9 बजे डोर बेल बजी। नींद में लड़खड़ाती हुई वो दरवाजे तक पहुंची। आंख मलते हुए दरवाजा खोला। बाहर 16-17 साल का सेल्समैन खड़ा था। टाई-शाई लगाए हुए। वो वाटर प्यूरीफायर बेच रहा था। दरवाजा खुलते ही उसने अपना परिचय देना शुरू किया। फलां-फलां कंपनी से आया हूं, फलां-फलां वाटर प्यूरीफायर लाया हूं। फिर उसने लड़की से बड़े सहजभाव से पूछा आपके घर में कोई जेंट्स है। उसके इस सवाल पर पहला खयाल तो आया कि इस नौजवान को किसी ने बुलाया होगा, वक़्त दिया होगा और उसने गलती से गलत दरवाजे पर दस्तक दे दी है। लड़की बोली - यहां कोई जेंट्स नहीं रहता। लड़की नौकरीपेशा थी, पहले अकेले फिर अपनी कुछ सहेलियों के साथ रहती थी। लड़के को बात हजम नहीं हुई। वो हंसकर बोला -ऐसा कोई घर नहीं हो सकता, जहां कोई जेंट्स न रहता हो। लड़की ने झल्लाकर पूछा तुम जेंट्स को ही क्यों पूछ रहे हो? इस सवाल के बाद उसकी झल्लाहट खत्म हो गई थी। सेल्समैन ने जवाब दिया- घर के फैसले तो जेंट्स ही लेते हैं न। वो वॉटर प्यूरीफायर बेचने आया था और उसके मुताबिक घर के अंदर-बाहर खरीदने की क्षमता-फैसला लेना तो जेंट्स का ही काम है।
उसने सेल्समैन से पूछा तुम्हारे घर में फैसले कौन लेता है- पापा या मम्मी। वो थोड़ा शरमा गया। बोला- वैसे तो घर में चलती मम्मी की ही है लेकिन आखिर में तो पापा ही फैसला करते हैं। फिर उसने इस छोटी-गंभीर-मजेदार वार्ता को खत्म कर दिया और मशीन के डेमो के लिए वक़्त मांगने लगा। लड़की ने भी उसे अपने ज़रा से खाली समय में से सबसे ज्यादा खाली रहनेवाला समय दे दिया और पूछा- इस वाटरप्यूरी फायर की कीमत कितनी है। वो बोला छत्तीस सौ रुपये। लड़की बोली- वैसे मैं ये खरीदूंगी नहीं। वो हंसा और बोला-आप कुछ अजीब हैं।
उसने सेल्समैन से पूछा तुम्हारे घर में फैसले कौन लेता है- पापा या मम्मी। वो थोड़ा शरमा गया। बोला- वैसे तो घर में चलती मम्मी की ही है लेकिन आखिर में तो पापा ही फैसला करते हैं। फिर उसने इस छोटी-गंभीर-मजेदार वार्ता को खत्म कर दिया और मशीन के डेमो के लिए वक़्त मांगने लगा। लड़की ने भी उसे अपने ज़रा से खाली समय में से सबसे ज्यादा खाली रहनेवाला समय दे दिया और पूछा- इस वाटरप्यूरी फायर की कीमत कितनी है। वो बोला छत्तीस सौ रुपये। लड़की बोली- वैसे मैं ये खरीदूंगी नहीं। वो हंसा और बोला-आप कुछ अजीब हैं।
25 June 2008
एक राजस्थानी, एक बिहारी
बंदा एक ही है। राजस्थानी है। लोग न जानें क्यों उसे बिहारी समझते हैं। शक्ल से क्योंकि रईसी नहीं झलकती। नाम भी ऐसा है कि कमेडियान भइया राजू श्रीवास्तव उसके नाम के सत्तू का प्रचार करते हैं और कई रिक्शों के पीछे उसके नाम के ब्रांड के सत्तू का एड चिपका मिल जाएगा। फिर भी मैं उसके नाम का ज़िक्र नहीं कर रही लेकिन उससे पूछे बिना उसके बारे में ज़िक्र के लिए, और उसके तल्ख-मजेदार किस्से के लिए क्षमाप्रार्थी हूं। किस्सा कुछ यूं है कि इस राजस्थानी ने किराए का कमरा तलाशते-तलाशते एक मकान का दरवाजा खटखटाया। मुंह में पान ठूंसा हुआ था। मकानमालिक ने दरवाजे से सर बाहर निकाला, शक्ल देख छूटते ही बोला -क्या बिहारी हो? मकान का किराया था 4000 रूपये। राजस्थानी ने फटाक जेब से राजस्थान से जुड़ा एक आई कार्ड निकाला। देखिए, बिहारी नहीं, राजस्थानी हूं। किराया 500 रूपया कम हो गया। किस्से के मायने आप अपने हिसाब से खुद निकाल लीजिए।
24 June 2008
महात्मा गांधी हाज़िर हों
गांधी जी यूं तो कभी भूले नहीं, न जाएंगे। मुन्नाभाई की गांधीगीरी ने उनके भुलाए जा चुके रास्ते की याद दिला दी। उस फिल्म के बाद गांधी जी एक नए स्टाइल में सामने आ गए, जिससे नई पीढ़ी भी खुद को जोड़ पाई। सुना है कि आइन्स्टाइन ने कहा था कि - हज़ारों साल बाद भी लोग गांधी जी को याद करेंगे कि इस हाड़-मांस के आदमी ने भारत को आज़ादी दिलाई थी। हाल ही में टॉम हैंक्स की एक फिल्म में एक सीन में एक भारतीय को गांधी कहकर संबोधित किया गया। उस सीन में जिसका मतलब भारतीय होना यानी गांधी होना था। गांधी जी भारतीयता की पहचान हैं। झारखंड के एक नक्सलवादी इलाके पर एक ख़बरिया चैनल की रिपोर्ट में बहुत सारे नक्सलवादियों और नक्सलवादी नेताओं से गांधी के बारे में पूछा गया, वो बापू को नहीं जानते थे हां गांधी के नाम पर इंदिरा गांधी को उन्होंने जरूर सुन रखा था। गांधी जी आज फिर इसलिए याद आए क्योंकि उन्हें अहमदाबाद में एसबीआई के प्री-इग्जामिनेशन ट्रेनिंग प्रोग्राम के लिए बुलाया गया है। उन्हें ट्रेनिंग कैंप में उपस्थित रहने को कहा गया है। ये ट्रेनिंग कैंप बैंक के क्लर्क्स के लिए आयोजित किया गया है। पता नहीं बापू इस परीक्षा में पास हो पाएंगे या नहीं।
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