10 May 2014

शब्दों की तलाश में


जब ज़िंदगी किसी शिल्प में न ढल सकीं
कविताएं कैसे ढलेंगी
पूछती हूं खुद से
अनमनी, अधूरी, बिखरी
शब्दों के पैमाने पर कैसे नापूं
पतझड़, अंधड़, उमड़ता समंदर
बेचैनियों को, उमड़ती लहरों को
किन लफ्जों में समेटूं
जो सुबहें सूरज उगने पर न हों
जो रातें टुकड़ों में आती हों
उजाले का सुबह से नाता न हो
रात सूरज को ढांक कर हो
एक जलती लौ में प्रवेश कर
चले जाएं किन्हीं रास्तों पर
किन्हीं बस्तियों में
जिनका पता...नहीं पता..
जहां सवाल नहीं जवाब हों
अब ऐसे अबूझ को कैसे लिखें
खड़कने लगे चुप खड़े दरवाजे
धूप-हवा-पानी सब
होने लगें एक दूसरे में मगन
उड़ने लगे धूल हर तरफ
दीखता जब कुछ नहीं
आए ऐसा अंधड़
कुदरत की इस बेचैनी
को किन शब्दों में ढालें
कोई इंद्रधनुष ले आएं
तड़पते मन को कस कर बांधें
बिखरे शब्दों, बिखरी कविताओं के लिए
कोई बिखरा शिल्प तलाशें


 --------------

उस छल का क्या करे
जिससे छली जाती है हर रोज
घर में, मन में
अपनी ही आंखों में
होती है तिरस्कृत
उतरती चली जाती है
अंतर्मन की सीढ़ियों से
दिल के कोनों में कहीं बसी
गहरी  उदास झील किनारे
चुप बैठती बड़ी देर वहां
मन का मौन टूटता नहीं
आंखों से अंदर ही अंदर
झर-झर बह गए आंसू
भरती जाती झील लबालब
तूफान उमड़ने को होता है
पर उमड़ता नहीं
खुद से हारी हार
बड़ी खतरनाक
दिल टूटता है
अब मगर रोता नहीं
लौट आएगी जल्दी ही
हां मालूम है
कोई नहीं कर रहा इंतज़ार










18 April 2014

ये चुनाव का मौसम है



कम से कम पिछले छह महीने से हर सुबह हम खीझ रहे हैं। आज मोदी ने ये कह दिया। केजरीवाल समझता क्या है खुद को। मोदी-केजरीवाल, मोदी-केजरीवाल। तेज बहसाबहसी। एक आदमी गुस्से से आग बबूला हो जाता है। ज्यादा ज्ञानी लोग ज्यादा तर्क देते हैं। किताबें कम पढ़नेवाले लोग अनुभव आधारित बातें कहते हैं। जुबानी जंग से हर रोज सुबह की शुरुआत होती है। आप चाहे न चाहे इस शगल में शामिल हो ही जाते हैं। घर से दफ्तर तय कर आएं कि आज कोई बहस नहीं करेंगे। मुंह बंद ही रखेंगे। लेकिन ऐसी बातें कही जा रही होती हैं कि आप खुद को रोक नहीं पाते और बीच बहस में कूद ही पड़ते हैं। इस समय दो ही धड़े हैं। मोदी धड़ा और केजरीवाल धड़ा। मोदी के खेमे में ज्यादा लोग हैं। केजरीवाल के खेमे में कम लेकिन बुद्धिजीवी लोग हैं। बहस में कोई पीछे नहीं। जैसे चूल्हे पर रखे उबलकर गिरने ही वाले दूध के भगोने पर आंच दौड़कर बंद या धीमा किया जा जाता है, वैसे ही बहस में शामिल होनेवालों के खौलते खून को किसी मजेदार बात से धीमा करना पड़ता है। इक्के-दुक्के कांग्रेसी इस समय चुप्पी साधे हैं। वो अपने मौन का मतलब बखूबी जानते हैं। अंत में सब झींककर कहते हैं भाड़ में जाए, जिसकी भी सरकार बने हमें कौन पूछता है। क्या कांग्रेस, क्या बीजेपी। हम तो वहीं के वहीं हैं। महीने के आखिर में खत्म हो चुकी तनख्वाह और आनेवाली तनख्वाह के बीच झूलते हुए। हमारा क्या। 

लेकिन अभी बहस का दूसरा दौर उठेगा और फिर ये सब फुंफकार पड़ेंगे। अरे मोदी-मोदी, अरे केजरीवाल-केजरीवाल। कांग्रेस-बीजेपी में फर्क ही क्या है। गुजरात का सच क्या है। केजरीवाल की सोच को कोई नहीं पकड़ सकता। हंसी-ठठ्ठे में बहसें कभी धीमे कभी तेज़ी से आगे बढ़ती रहती हैं। सब अफसोस जताते हैं कहां पेट्रोल,प्याज और महंगाई की बात करनी थी। एफडीआई की बात करनी थी। लेकिन चुनाव के ऐन पहले बात बस हिंदू-मुसलमान की हो रही है। ब्राह्मण,ठाकुर,दलित वोट की हो रही है। एनडीटीवी वाले रवीश किसी ऐसे गांव की रपट ले आए जहां बीएसपी के ही झंडे लगे हैं। फिर मोदी की लहर कैसे हुई। ये टीवी पर बनायी गई लहर है, बहस का नया एजेंडा। 

नेता बड़ी-बड़ी रैलियां कर रहे हैं, सभाएं कर रहे हैं। हजारों की संख्या में पब्लिक जुटा रहे हैं। आज नेता जी का मन कुछ चुलबुला हो रहा है तो रैलियों में शेर और लकड़बग्घे की कहानी सुना रहे हैं। अरे क्या शेर-लकड़बग्घा सुनाने के लिए इतनी भीड़ जमायी। इतना पैसा बहाया। कोई टॉफी खिला रहा है कोई गुब्बारे की हवा निकाल रहा है। कुछ द्वितीय श्रेणी वाले नेता कुत्ते-बिल्ली पर भी उतर आए हैं। उनका अपना अलग राग-अलाप है। 

इस चुनाव में तो ट्विटर ने भी खूब खेल कर दिया। कोई मर गया ट्विटर पर लिख दिया रिप(रेस्ट इन पीस)। हुआ यूं कि एक बार किसी गलत खबर पर रिप कर दिया। फिर तो एक के बाद एक कई रिप हो गए। जीते जी एक इंसान को इतने रिप मिल गए, बाकी तो...। दिग्विजय सिंह तो ट्विटर के मामले में मास्टर हैं। अटलबिहारी वाजपेयी सशरीर तो नहीं लेकिन प्रसंगवश इस चुनाव में शामिल ही रहे। बीजेपी जहां कमजोर पड़ी अटल जी की याद हो आई। कांग्रेस भी उन्हें नहीं भूली। राजनाथ सिंह ने तो अटलबिहारी वाजपेयी के अंगवस्त्र ले लिये। जैसे महाभारत में कर्ण को कवच-कुंडल मिले। 

शुक्र है कि इसी चुनाव में हमारे एनडी तिवारी बाप बन गए। उन्हें पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई। बाकी तो एक से बढ़कर एक पलटूबाज सामने आए। सब एक दूसरे धड़े के नेता खींच रहे थे। और सिर्फ नेता ही नहीं गुंडेटाइप वालों की चांदी भी तो इसी समय में होती है। क्या साधु क्या शैतान। इस समय तो सब चुनाव के लड़ाके हैं। जिसको जिधर मौका मिला भग लिया। कांग्रेस के एक उम्मीदवार को तो बीजेपी ने ऐन चुनाव से ठीक पहले लपक लिया। सबसे बड़ा पलटू कौन।

हंसी-चिरौरी के बीच ये चुनाव बहुत रुलानेवाला भी रह। क्या मुज़फ़्फ़रनगर को इस चुनाव के लिए ही जलाया गया। हम 16वीं लोकसभा का चुनाव लड़ रहे थे लेकिन घूम-फिर कर वहीं आ गए जहां से चले थे। हिंदू-हिंदू, मुसलमान-मुसलमान।


11 April 2014

ये ज़िंदगी उसी की है..

इस ख़ूबसूरत गाने को कई-कई बार सुना, जितना सुनो और सुनने को दिल चाहता और आज की हक़ीकत की कसौटी पर ये गीत तो रिसते ज़ख़्मों पर हाथ रखने जैसा है। फिल्म अनारकली का ये गाना। जब अनारकली को मोहब्बत की सज़ा दी जा रही थी। उसे ज़िंदा दीवार में चुनवाया जा रहा था।


ये ज़िंदगी उसी की है जो किसी का है प्यार ही में खो गया...ये ज़िंदगी उसी की है

डर लगता है लोगों को न। किसी का होना और प्यार में खोना। मैं रोज़ सुबह खबरों की दुनिया में जागती हूं। दफ्तर में कुर्सी संभालते ही जिन ख़बरों से दो चार होना होता है उसमें दो एक बलात्कार की खबरें जरूर होती हैं। तीन-चार साल की बच्चियों तक से बलात्कार। ऐसा लगता है कई बार कि शरीर में रग-रग से तेज़ाब बह रहा हो..। आतंक की तरह छा गया है बलात्कार। समझ हासिल कर रही चौदह-पंद्रह-सोलह साल की बच्चियां इस शब्द से गुत्थमगुत्था होने लगीं हैं और आपस में गुपुचुप इस पर बातें करती हैं। औरतों से अपराध की ख़बरों ने लड़कियों के रूह को छलनी कर दिया है। प्यार की लहर उठने की उम्र में अगर बलात्कार-लड़कियां उठाने, मारने, तेज़ाब झोंकने जैसी घटनाओं की दहशत उठ रही हो तो ये वक्त किसी सूरत में बदलना चाहिए। ये किस तरह का समाज बना रहे हैं हम। ये कैसा माहौल बना रहे हैं हम। क्या एक सभ्य समाज में प्यार से ज्यादा नफ़रत की जगह होनी चाहिए।

जो दिल यहां न मिल सके, मिलेंगे उस जहान में, खिलेंगे हसरतों के फूल, जा के आसमान में
ये ज़िंदगी चली गई जो प्यार में तो क्या हुआ...

जब ये तय है कि प्यार करनेवालों पर कितने पहरे बिठा लो, कितनी पंचायतें कर लो। खाप, और खाप के बाप भी हों..। नहीं बदल सकते। किसी के दिल में पनप रहे अदने से प्यार को। तो वो प्यार अदना नहीं उसके आगे अदने से आप हो। कितने लड़के-लड़कियां सोलह-सत्रह-अठरह की उम्र में मार दिए जाते हैं। लैला-मजनूं, सिरी-फरहाद तो दो चार कहानियां हैं। कितनी लैला, कितनी सिरी कत्ल कर दी गईं, कत्ल की जा रही हैं। कितने मजनूं, कितने फरहाद मार-काट दिए गए। हुआ क्या। मुज़फ़्फ़रनगर को देखो। हैवानियत की आग में जल गया। प्यार में डूबा एक जोड़ा ही तो था। जिससे किस्सा शुरू हुआ। उसे रोकने, मारने, खत्म करने की, नफरत की चिंगारी ने, मुज़फ़्फ़रनगर में कितने घर जला दिए। प्यार पर सियासत खेल गई। मुज़फ़्फ़रनगर के लोगों के हाथ क्या आया।
ग़म, गुस्सा,आंसू, जले घर, बुझे चूल्हे, मरे हुए छोटे बच्चे, लुटी-पिटी औरतें। क्या यही हासिल चाहिए था। क्या इतने बर्बर हैं हम। कि एक चिंगारी उठे और हमारे दिलों के अंदर दबी बर्बरता, हमारे अंदर पल रहा जानवर बाहर निकलकर नंगा नाच करे। हैवानियत का खेल खेले।

सुनाएगी ये दास्तां शमा मेरे मजार की, फिजा में भी खिली रही ये कली अनार की
इसे मजार मत कहो ये महल है प्यार का

मुज़फ़्फ़रनगर दंगों में एक छोटी सी बच्ची लापता हुई थी। कोई 6 साल की। हिंदू की बच्ची थी। पार्वती सरीखा कुछ नाम था। एक मुसलमान को मिली। वो बच्ची को घर ले गया। उसकी पत्नी ने बच्ची को आसरा दिया। बीस दिनों तक वो हिंदू बच्ची मुसलमान परिवार के घर महफूज़ रही। एक मुंह से दूसरे मुंह खबर आगे बढ़ती रही। बच्ची के माता-पिता आ पहुंचे अपनी पार्वती को साथ ले जाने।  सबने मिलकर तस्वीर खिंचाई। तस्वीर टीवी-अखबारों में आई। सबने दिल खोलकर कहा इंसानियत इसी को कहते हैं। जिस समय मुज़फ़्फ़रनगर नफ़रत की आग में धधक रहा था ये प्यार और इंसानियत की शमा रौशन हो रही थी। इसे मजार मत कहो ये महल है प्यार का।


 ये ज़िंदगी की शाम आ, तुझे गले लगाऊं मैं, तुझी में डूब जाऊं मैं, जहां को भूल जाऊं मैं
बस एक नज़र मेरे सनम....अलविदा अलविदा अलविदा अलविदा अलविदा अलविदा अलविदा अलविदा

और अगर तुर्रा हार मनवाने का है। सिर झुकाने का है। खत्म करने, तहस-नहस करने पर ही अमादा हों सभी।
नहीं ठहरेगी लड़कियों से हिंसा की ये वारदातें। उन्हें दबाने-झुकाने-नीचा दिखाने की कसरतें। तो तस्वीर ऐसी बनती है कि क्या सब लड़कियां खड़ी हो जाएं किसी गहरी खाई किनारे या खुद ही चुनने लगें खुद को अपनी हसरतों की दीवारों में...ये गाते हुए कि ऐ ज़िंदगी की शाम आ तुझे गले लगाऊं मैं, तुझी में डूब जाऊ मैं, जहां को भूल जाऊं मैं....कह जाएंगी अगर सब लड़कियां दुनिया को अलविदा....क्या दुनिया चलेगी। क्या माओं की कोख में अंकुर बनने से मना कर देंगी लड़कियां, जन्म लेने से मना कर देंगी लड़कियां। फिर क्या करोगे।

सच तो ये है कि लड़कियां गाना चाहती हैं ज़िंदगी का सबसे अच्छा राग...वो है...

ये ज़िंदगी उसी की है जो किसी का हो गया, प्यार ही में खो गया


सच यही है कि लड़कियां प्यार ही तो करना चाहती हैं, प्यार गाना चाहती हैं, वो मजार को भी प्यार का महल बनाती हैं, वो शमां हैं, जो प्यार की दास्तां सुनाती हैं...। मत रौंदो। पछताओगे।

07 April 2014

मेरी लाल साइकिल और आज़ादी की उड़ान

रोड डायरी


मेरी साइकिल। उसका नाम मैंने लाल परी रखा था। आज़ादी का शायद पहला एहसास इस लाल परी के साथ ही हुआ था और खुद के बड़े होने का भी। आठवीं में थी मैं जब मेरे पास मेरी अपनी साइकिल आयी। लाल रंग की। पसंद था उसका ये रंग मुझे। मेरी एक फ्रेंड के पास खाकी रंग की साइकिल थी और दूसरी के पास नीले रंग की पुरानी साइकिल। मेरी नई चमचमाती साइकिल मुझे उन दोनों की साइकिल से ज्यादा पसंद थी। उनकी साइकिल देख मैं सोचती थी काश मेरे पास भी एक होती।

उस साइकिल को खरीदने में मैंने भी सौ रुपये का योगदान दिया था अपनी पॉकेटमनी से पैसे बचाकर और रिश्तेदारों से विदाई के वक़्त मिले पैसे सहेजकर। मम्मी स्कूल जाते वक़्त रोज़ एक रुपये देती थी। उन दिनों ये पॉकेटमनी कम बिलकुल नहीं थी। उस एक रुपये में हम आलू टिक्की खा सकते थे और बर्फ वाली औरेंज आइसक्रीम भी। शायद पचास पैसे में आलू टिक्की मिलती थी। आइसक्रीम भी इतने की ही। महंगाई के दौर में उन सस्ती आइसक्रीमों-आलू टिक्कियों की कीमत भी ठीक से याद नहीं रही। लिखते हुए लग रहा है जैसे मैं 1935 में पैदा हुई हूं, लेकिन ये बात 1989-90 के दौरान की है। उस साइकिल के साथ चंद पर अनमोल यादें जुड़ी हुई हैं और एक दुर्घटना भी।


किसी और की साइकिल से सीखने के दौरान ही मैंने सैर कर रही एक मोटी महिला को पीछे से ठोक दिया था। बचाते-बचाते भी मेरी साइकिल की हैंडल उसकी कमर पर जा लगी। वो साड़ी पहने थी और पीछे से उसकी थुलथुली पीठ दिख रही थी। बस मेरी हैंडल वहीं जा टकरायी। उस छोटी दुर्घटना के साथ उस महिला की थुलथुली पीठ भी मेरी यादों में बस गई। अह। मैं पूरी तरह नहीं गिरी, लड़खड़ाते हुए खुद को और अपनी साइकिल को संभाल लिया था।

अपने भाई की साइकिल पर भी मैंने कैंची चलाना सीखने की कोशिश की लेकिन वो एक असफल प्रयास था और मुझे किसी को कैंची चलाते देख मज़ा भी नहीं आता था। जब साइकिल है, उस पर सीट है, तो बैठने के बजाय टेढ़े होकर पैडल मारने का क्या मतलब भला।

खैर मेरी साइकिल में दिलचस्पी की बात मेरे प्यारे पिताजी को पता चल गई थी और उन्होंने मेरा दिल नहीं तोड़ा। आठवीं क्लास में रहते हुए मेरे पास मेरी दो निजी संपत्ति थी। एक तो घड़ी और दूसरी मेरी नई साइकिल। स्कूल से निकलते हुए बच्चों की कतार के बाद साइकिलवालों की जो कतार लगती थी उसमें खड़ी होने पर मुझे गर्व का एहसास होता। फिर स्कूल की कुछ ही लड़कियां साइकिल से आतीं तो छोटी कतार में शामिल होकर मेरा गर्व भी महान हो जाता था। वाह।

स्कूल से लौटते समय हम आपस में होड़ लगाते। कई बार पीछे से आ रहे किसी पेट्रोलवाले वाहन को रास्ता भी नहीं देते। हमारी साइकिलें हमसे ज्यादा इठलाती हुई सड़क पर फिरतीं और ये एहसास सबसे ज्यादा सुखद था। शायद इसी को मैं कहना चाहती हूं ये खुली हवा को महसूस करने और जीने का एहसास था। उसकी महक अब भी ज़ेहन में ताज़ा  हो उठती है क्योंकि शायद खुली हवा को महसूस कर पाने का, वही पहला एहसास था।

साइकिल के नौसिखियेपन के दिन की एक और मज़ेदार घटना याद है। मज़ेदार अब, तब नहीं। मैं एक छोटे से चौराहे से निकल रही थी कि ये स्कूटर वाला पीछे से आया, मेरी साइकिल का स्टैंड उसके स्कूटर में फंस गया, करीब साठ-सत्तर डिग्री के कोण पर और मेरी साइकिल उसके स्कूटर के साथ घिसट पड़ी, बस कुछ ही कदम मान लो, पर मैं बुरी तरह डर गई थी। सचमुच।

पर ये तो कुछ भी नहीं था। आगे जो होनेवाला था वो इससे भी डरावना था।

अब मुझे साइकिल चलानी अच्छी तरह से आ गई थी इसलिये मैं थोड़ी स्मार्टनेस भी दिखाने लगी थी। स्कूल से लौटकर मोहल्ले में दाखिल होते समय ढलान थी। मेरे आगे एक ट्रैक्टर जा रहा था, ईंट से लदा हुआ। उसकी धीमी रफ्तार ने मुझे ओवरटेक करने पर मजबूर कर दिया। ट्रैक्टर को पीछे छोड़ निकलते समय सिर्फ इतना पता चला कि एक लड़का बहुत तेज़ रफ्तार में साइकिल चलाता हुआ आया, शायद मेरी साइकिल से टकराया और ढलान की वजह से मैं आगे की ओर गिरी। खुद को ट्रैक्टर के यमराज इंजन के नीचे पाया। ये सब ठीक-ठीक कैसे हुआ पता नहीं चल सका। सड़क के एक ओर ऊंची दीवार थी, ट्रैक्टरवाले ने मुझे बचाने के लिये सूझबूझ दिखाते हुए स्टेयरिंग दीवार की ओर मोड़ दी थी। होश संभलने और दिमाग़ के पटरी पर लौटने पर देखा वहां दीवार का एक हिस्सा ढह गया था। वो लड़का अपनी साइकिल समेत भाग गया था। ट्रैक्टर का इंजन ख़ासा ऊंचा होता है, मेरी जैसी मरियल छोकरी दोनों के गैप के बीच आसानी से समा गयी थी। सामाजिक प्राणी होने का परिचय देते हुए कुछ लोग मुझे ट्रैक्टर के इंजन के नीचे से घसीट कर बाहर निकाल रहे थे। मेरी साइकिल कई जगह से टेढ़ी-मेढ़ी हो चुकी थी। बैग से मेरा स्टील का खूबसूरत डबल डेकर टिफिन बाहर निकल आया था और बुरी तरह पिचक गया था। मौका-ए-वारदात के दूसरी तरफ डॉक्टरों की एक कॉलोनी थी। कुछ लोग आवाज़ देकर अपनी बॉलकनी पर टंगे एक डॉक्टर को नीचे बुला रहे थे। इंसानियत का पूरा परिचय देते हुए उस डॉक्टर ने नीचे आने से मना कर दिया। इतने ख़ौफ़, दर्द, दहशत, आंसू के बाद भी मैं ये समझ पा रही थी कि वो एक्सीडेंट-वेक्सीडेंट के झमेले में नहीं पड़ना चाहा था। मुझ पर से मिट्टी-सिट्टी झाड़कर, ज़ख्म पर डिटॉल की रुई लगा दी गई। लोगों ने मेरा पता पूछा, मैंने घर का रास्ता बता दिया और रिक्शे पर लादकर मुझे घर पहुंचाया गया, मेरे साथ मेरी साइकिल को भी। घर पहुंचते ही मेरे इमोशन फूट पड़े और मैंने रोना चालू किया। उससे पहले मैं सिर्फ कराह रही थी। मैं अस्पताल ले जायी गई। यहां की एक अच्छी अनुभूति ये थी कि मेरे भाई ने मुझे अपने हाथों में उठाया और वॉर्ड के अंदर ले गया। हालांकि तब मैं बहुत दुबली थी, फिर भी मुझे लग रहा था कि उसने मुझे कैसे उठाया होगा।

इसके बाद लाल परी के साथ स्कूल जाना नसीब नहीं हुआ। मैंने अपनी साइकिल पर पैडल तो मारे लेकिन उल्लेखनीय कुछ भी नहीं।

इस पूरी घटना का सबसे खराब पहलू ये था कि इतनी बड़ी और भीषण दुर्घटना से गुजरने के बाद भी मुझे कुछ नहीं हुआ। न पैर में कोई फ्रैक्चर आया, न हाथों में लंबी पट्टी बंधी, न सर पर बैंडेज सजा। सिर्फ सड़क पर गिरने की वजह से खरोंचे ही हासिल हुईं। सोचिये कि लोगबाग मेरे एक्सीडेंट की ख़बर सुन मुझसे मिलने आते और मुझे चलता-फिरता देख कितने मायूस होते। बेचारे अपनी सहानुभूति जताने के लिये बटोरे गये शब्दों का भी सही इस्तेमाल नहीं कर पाते।

उनसे ज्यादा मायूस तो मैं थी। एक्सीडेंट भी हुआ, ठीक से घायल भी न हुई, देखने आनेवालों को भी निराश किया।  और तो और शर्म का एक कारण ये भी था कि एक्सीडेंट भी हुआ तो ट्रैक्टर से, कोई वड्डी गाड़ी होती, कार होती, ट्रक होता, मगर ट्रैक्टर.....। हाय-हाय।

हां लेकिन एक बात तो शानदार हुई थी। मैं अपने मोहल्ले में मशहूर हो गई थी। वो लड़की जिसे ट्रैक्टर के नीचे आने के बाद भी कुछ न हुआ, बस चंद खरोंचे आयीं। हा-हा-हा।

06 March 2014

अपनी दुनिया की 'हीरो'




मेरी बेटी को डोरेमॉन बहुत पसंद है। वो छोटा भीम देखती है। कृष्णा देखती है। ऑगी देखती है। टॉम एंड जेरी देखती है। उसकी कल्पना के संसार में डोरेमॉन, छोटा भीम, कान्हा, ऑगी जैसे कैरेक्टर हैं। एक ताकतवर हीरो के रूप में उसके सामने छोटा भीम है। एक स्मार्ट कैरेक्टर डोरेमॉन का है। कान्हा की बदमाशियां हैं, कान्हा बुरे लोगों को मारता है।
पिछले दिनों अपनी चार साल की बेटी की बातों से मैंने जाना कि वो खुद को कमज़ोर मानने लगी है। वो ये जानने लगी है कि लड़कियां शारीरिक तौर पर कुछ कमज़ोर होती हैं। गौर करनेवाली बात है कि वो कोमलता की बात नहीं कर रही थी, कमज़ोरी की बात कर रही थी। मैं परेशान हुई और लगातार इस बारे में सोच रही थी। उसे समझाने की कोशिश कर रही थी कि असल ताकत तो दरअसल दिमाग में होती है। चार साल की बच्ची का आत्मविश्वास कैसे बढ़ाया जाए। ये आसान बात तो नहीं।
मैंने ग़ौर किया कि मेरी बेटी की कार्टून सीरियल की दुनिया में कोई लड़की कैरेक्टर नहीं। डॉरेमॉन में शुजुका है लेकिन उसका किरदार साइड कैरेक्टर जैसा ही है। छोटा भीम में छुटकी का किरदार भी साइड लाइन वाला ही है।
फिर मैंने ऐसे कार्टून तलाशने शुरू किए जिसमें मज़बूत लड़की किरदार हो। ऐसे कार्टून सीरियल मिले तो लेकिन वो कामयाब सीरियल नहीं हैं। पावरपफ गर्ल्स समेत कुछ और ऐसे कार्टून के बारे में मैंने जाना। फिर मैंने ये भी सोचा कि लड़की कैरेक्टर वाले कार्टून खूब क्यों नहीं देखे गए। पॉप्युलर क्यों नहीं हुए। वो ऐसे बने नहीं। बने तो फिर उन्हें देखनेवाला दर्शकवर्ग (चाहे वो बालदर्शक ही क्यों न हों) ये बात स्वीकार नहीं कर सका कि लड़कियां भी चमत्कृत ढंग से कुछ काम कर सकती हैं। बच्चों की दुनिया में एक तरफ स्पाइडरमैन, सुपरमैन, बैटमैन हैं। जो बुरे लोगों और बुराई से लड़ते हैं। लोगों की मदद करते हैं। लेकिन इसके दूसरे छोर पर कोई स्ट्रॉन्ग वुमन किरदार नहीं है। फिल्म और सीरियल बनानेवाले लोगों ने ऐसे स्त्री किरदार को गढ़ने में कोई ख़ास दिलचस्पी नहीं दिखायी। उसे कामयाब करने के लिए कोई फॉर्मूला नहीं सोचा। जबकि हर कार्टून सीरियल में हीरो की एक ख़ास स्त्री दोस्त है, जो उसे समझती है, उसकी दोस्त होती है, उसके साथ मिलकर दुश्मनों से मुक़ाबला करती है लेकिन वो उस सीरियल की हीरो नहीं होती।

झांसी की रानी लक्ष्मीबाई के किरदार पर टेलिविज़न में काम तो हुआ। मगर ऐसा प्रभावी नहीं कि लोग उस सीरियल को बार-बार याद करें और देखना चाहें। कल्पनाशक्ति से नए और प्रभावी फीमेल कैरेक्टर्स उस तरह गढ़े नहीं गए। सोप ओपेरा में तो औरतों की कमज़ोर, झगड़ालू या फिर सती सावित्रीवाली छवि दर्शायी जाती है। जो और भी खराब और खतरनाक है। बच्चियों की दुनिया का क्या। बार्बी, स्नोव्हाइट परियों की सी कहानियां हैं। सिन्ड्रेला एक अच्छा राजकुमार चाहती है। ये सीरियल बच्चियों को मज़बूती तो नहीं देते हां उनके कोमल सपनों के संसार को विस्तार देते हैं।
हमारे निर्माता-निर्देशकों,फिल्म-टेलिविज़न से जुड़े लोग क्या छोटी बच्चियों के लिए वो कोई ऐसा मजबूत किरदार नहीं गढ़ सकते, जो लड़की हो, अपने दिमाग़, अपने हौसले से मुश्किलों को आसान करती हो। बड़ी से बड़ी चुनौतियों का सामना करती हो।  
जबकि असल दुनिया में तो ऐसे बहुत से किरदार हैं। इंदिरा गांधी, सोनिया गांधी, ममता बनर्जी, मायावती, जयललिता ये देश और राज्य को लीड करनेवाली महिलाएं हैं। सिनेमा तो समाज का आइना होता है। सिनेमा ऐसा कोई किरदार नहीं गढ़ पाया जो बच्चियों को उनके टेलिविज़न की दुनिया में एक महिला लीडर दे। लड़कियों के सामने कोई तो मज़बूत कैरेक्टर हो जिसकी तरह वो बनना चाहें।



जबकि इस समय में बच्चियां अपने ईर्दगिर्द अपेक्षाकृत मजबूत महिलाओं को देख रही हैं। जो स्कूल-कॉलेज-दफ्तर जा रही हैं। हालांकि घर में ज्यादातर वो पुरुष सदस्य का प्रभुत्व देखती हैं। लेकिन हमारी दुनिया के समय से इनकी दुनिया के समय में अपेक्षाकृत मजबूत महिलाएं दिख रही हैं। जो अपने फैसले खुद ले रही हैं। जो अपनी इच्छाओं को बात-बात पर मारती नहीं। बची हुई आखिरी रोटी नहीं खातीं। लड़कियों की दुनिया में अब स्कूल, स्कूल के बाद कॉलेज, कॉलेज के बाद ऑफिस की तस्वीर साफ हुई है। यानी एक कामकाजी,मज़बूत महिला की।



अपनी बेटी को बढ़ता देख मैं समझने की कोशिश कर रही हूं कि कैसे लड़कियों की दुनिया बुनी जाती है। उनके दिमाग़ में चित्र गढ़े जाते हैं। जिसमें धीरे-धीरे बच्चियां स्वीकार कर लेती हैं कि वो कुछ कमतर हैं, वो अपनी दुनिया की हीरो नहीं, साइडलाइन कैरेक्टर हैं, हीरो की दोस्त हैं। जो इसे नहीं स्वीकार करतीं रिबैलियस कहलाती हैं। मैं चाहती हूं लड़कियों की दुनिया में ज्यादा से ज्यादा रिबैलियस हों। सीधा होना अच्छा तो है मगर सफल नहीं।


 (चित्र गूगल से साभार)

24 February 2014

किताबों की बातें


इस बार पुस्तक मेले का इंतज़ार ऐसे कर रही थी जैसे कॉलेज के दिनों में लड़के-लड़कियां वेलेनटाइन डे का इंतज़ार करते हैं। मैंने तय कर लिया था इस बार किताबें जरूर खरीदूंगी। दरअसल किताबें खरीदे हुए भी ज़माना बीत गया था। पत्र-पत्रिकाओं के साहित्यिक कोनों में ही जिज्ञासा शांत कर ली थी। एक पूरी किताब पढ़े हुए दो-चार साल गुजर गए। दरअसल हर रोज खबरों की दुनिया में कांटछांट करते रहने की वजह से भी शायद ऐसा रहा हो। दरअसल ये....दरअसल वो....हैं तो ये सब बहानेबाज़ियां हीं। इसलिए इस बार मैंने पहले ही महीने के आखिर में खत्म होती तनख्वाह में से बजट भी आवंटित कर लिया था।
सचमुच किताबें खरीदने में हम कितनी गरीबी दिखाते हैं। किताबें हमें महंगी लगती हैं जबकि उन्हीं पैसों को चाट-बर्गर खरीदने में ख़ुशी-ख़ुशी उड़ा देते हैं। ये भी हिंदी जगत की ग़रीबी ही है।

पुस्तक मेला देखने के लिए हमने शनिवार-रविवार का दिन नहीं चुना। साप्ताहंत में कुछ ज्यादा ही भीड़ हो जाती है। यानी मुश्किल हो जाती है। हम गुरूवार को यहां पहुंचे।
पहले हॉल नंबर 14। यहां गैर हिंदी भाषी राज्यों के ज्यादातर स्टॉल्स थे। एक चक्कर पूरा कर हॉल नंबर 18 में गए। यहां किताबों की पूरी दुनिया बसी थी। इतनी किताबों में से अपने लिए चंद किताबें छांट पाना सचमुच बहुत मुश्किल काम है। ऐसा नहीं कि आप कुछ भी ले आओ फिर उसे पढ़ न पाओ। किताबों के पन्ने पलट-पलट कर कुछ शब्द पढ़ती, क्या ये मेरी रूचि पर खरी उतरती हैं। किताबें खरीदने से पहले बहुत समझ न रखनेवाले लोग भी कितने जजमेंटल हो जाते हैं। मैं तो बहुत थोड़ा जानती हूं। शुरू में तो मुझे कुछ समझ नहीं आया। कौन सी किताब लूं। कुछ बहुत अच्छी लग रही थीं, महंगी भी, खरीद भी सकती थी, मगर वो मुझे कितनी समझ-पसंद आएगी,पता नहीं। कई किताबों के पन्ने उलटे। कई स्टॉल्स के चक्कर लगाए। इच्छा तो चुल्लू में समंदर भर लेने की थी। बहुत अच्छा लग रहा था। चारों ओर किताबों की ख़ुशबू थी। नई किताब की अपनी ही अलग ख़ुश्बू होती है। पुरानी किताबों की अपनी महक। किताबों के पन्ने पलटने की सरसरी सी धुन थी। पेज नंबर 79 पर एक वाक्य पढ़ा, 96 पर दूसरा....क्या इससे किसी किताब के बारे में कोई राय तय की जा सकती थी। बिलकुल नहीं।
अलग-अलग स्टॉल्स, मेज़ों पर, ताखों पर, आलमारियों में....किताबें बुला रही थीं। ये लिखना भी अच्छा लग रहा है कि किताबें गा रही थीं, गुनगुना रही थीं। कई स्टॉल्स पर बाहर खड़े लोग भी, आइये, यहां किताबें आपको अच्छी लगेंगी, एक बार आकर देख लीजिए...।
 ये किताबों का मेला है। चारों ओर किताबें ही किताबें हैं। ले लो, चुन लो, पढ़ लो। कौन सी किताब आपके पास आएगी।
पुरानी बात कई-कई बार कही गई है कि किताबें अपना पाठक चुन ही लेती हैं। एक किस्से का भी जिक्र याद आ रहा है। कोई बेहद महत्वपूर्ण किताब, जिसकी कुछ ही प्रतियां छपीं थीं, एक शख्स अनजाने में उसे कबाड़ीवाले को बेच देता है। कबाड़ में से झांकती उस किताब पर किसी ज्ञानी की नजर पड़ गई, वो उस किताब को किसी मोती की तरह समंदर से चुन कर लाया जैसे। माफ कीजिएगा कि मैं उस किताब का नाम नहीं बता पा रही, बस किस्सा याद रह गया है मुझे। और ऐसे तय हुआ कि एक अच्छी किताब अपने लिए अच्छा पाठक ढूंढ़ ही लेती है। मुझे ऐसा लगता है कि शायद मेरे साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ हो। रूसी साहित्य से पहले मैंने कुछ ही किताबें पढ़ीं थीं। हालांकि यूपी बोर्ड में हिंदी के स्लैबस में बहुत सारा बेहतरीन साहित्य हमें पढ़ाया गया। बहुत सारी कहानियां हमने पढ़ीं। परीक्षा की किताबों में उनके उत्तर लिखे। जिनके बारे में बहुत बाद में और जानने को मिला। किताबों की दुनिया में प्रवेश जिस शख्स के ज़रिये हुआ उसे मैं नहीं जानती थी। दोस्तों की मंडली में किताबें एक से दूसरे में सर्कुलेट होतीं। मेरा नंबर तीसरा होता। पुनरुत्थान, पूर्वबेला, मां, हिरोशिमा के फूल-वियतनाम को प्यार, बौड़म समेत कई अदभुत किताबें पढ़ने को मिलीं। रूसी साहित्य का अकूत भंडार खुला। जो शख्स वो किताबें मुहैया कराता था उससे एक बार ही मिलने का मौका मिला जब परीक्षा के चक्कर में एक किताब मैं तय वक़्त पर लौटा नहीं सकी थी। तब से किताबों का चस्का लगा।

पुस्तक मेले में पहले भी जा चुकी हूं। चूंकि इस बार कोई चार-पांच साल बाद गई थी, जैसे एक लंबी नींद टूटने के बाद गई थी। इसलिए बहुत अच्छा लगा। इसके लिए शुक्रिया मित्र राजेश डोबरियाल का। राजकमल प्रकाशन से जब उन्होंने पेपरबैक संस्करण से किताबें चुननी शुरू कीं तो मुझे भी हौसला मिला। जनचेतना, गार्गी प्रकाशन से कुछ किताबें चुनीं। बहुत सारी पढ़ी हुई किताबें भी दिखीं। उन्हें देखकर अच्छा लगा। गार्गी प्रकाशन में तो मुझे बहुत अच्छा लगा। टॉफी से सस्ती किताबें। दो रुपये-तीन रुपये की किताबें। भले ही वो तीन-चार-पांच पन्ने की हों पर वो एक पूरी बात थीं। दस रुपये बीस रुपये की किताबें। महंगीवाली भी थीं। लेकिन अगर किसी चीज-किसी बात को लोकप्रिय बनाना हो, ज्यादा लोगों तक पहुंचाना हो, तो ये भी एक अच्छा आइडिया है। वैसे भी हमारे देश में फालतू बातों पर बहुत पैसे फूंक दिए जाते हैं। असल बात पर सरकार की जेब खाली रहती है। व्यक्ति के तौर पर हमारा भी यही हाल है। यहां गार्गी प्रकाशन से ही खरीदी गई सुल्ताना का सपनाका जिक्र जरूर करूंगी। रुकय्या शखावत हुसैन की एक कहानी है ये जिसका अनुवाद आशु वर्मा ने किया है। बीसवीं सदी की शुरुआत की कहानी है ये। औरतों के हक़ के पक्ष में इतनी खूबसरत कहानी आप सब जरूर पढ़िये।

पुस्तक मेले में बड़े प्रकाशकों की स्थिति अलग होती है, छोटे-नए प्रकाशकों की स्थिति अलग। होनी ही है। साहित्य जगत के माहिर लोग छोटे प्रकाशकों का मज़ाक भी खूब उड़ाते हैं। वहां एक कोने में एक पुराना साथी भी मिला। नौकरी छोड़ जो किताबों की दुनिया में चला गया है। एक प्रकाशन शुरू किया। अपनी भी दो किताबें दिखायीं। मीडिया शोध पर थीं। खबरिया चैनलों का मोह छोड़ पाना आसान नहीं। मगर उसे शाबाशी देती हूं उसने कर दिखाया। नौकरी छोड़ने की हिम्मत कुछ ही कर पाते हैं। यहां बहुत सारे वो लोग भी याद आ रहे हैं जो नए प्रकाशक या नए लेखक का स्वागत नहीं करते। खिल्ली उड़ाने, मुंह बिचकाने से नहीं चूकते।


पुस्तक मेला इसलिए भी ख़ास है क्योंकि पुस्तकें आसानी से मिलती नहीं। मैं जहां रहती हूं चारों तरफ बाज़ार ही बाज़ार है। मॉल ही मॉल। ब्रांड ही ब्रांड है। सस्ता, महंगा, और महंगा....हर तरह का बाज़ार। लेकिन किताब की एक भी अच्छी दुकान नहीं। मेरी वायलिन का तार एक बार टूट गया तो वाद्ययंत्रों की एक भी दुकान नहीं मिली। नोएडा के एक बड़े बाजार में एक बेहद छोटी सी दुकान ढूंढ़ी जिसका दुकानदार वहां था नहीं, खबर दी जाने पर बहुत देर बाद लौटा, इससे पता चलता है कि उसकी दुकान कितनी चलती होगी।  जो बाज़ार बड़ा होता गया वो सिर्फ कपड़े, इलेक्ट्रॉनिक उपकरण, गैजेट्स, गाड़ियां, रेस्तरां, मैकडॉनल्ड, पिज्जा हट जैसी चीजें ही शामिल हैं। छोटे-मोटे किताबों के स्टॉल तो मिलते हैं। उनमें ज्यादातर पत्रिकाएं होती हैं, कुछ अंग्रेजी उपन्यास। किताबघर तो बमुश्किल मिलते हैं। अच्छी लाइब्रेरी भी आसानी से उपलब्ध नहीं। ऐसा क्यों नहीं होता कि जहां बड़े-बड़े बाज़ार हो वहां एक अच्छी लाइब्रेरी भी हो। एक अच्छी किताबों की दुकान। सरकार सब्सिडी देकर इसे बढ़ावा भी दे सकती है। जैसे मेरा ख्याली पुलाव है एक ऐसी जगह बनाने का, जिसमें किताबें हों, चाय-कॉफी सर्व की जाए, अच्छा म्यूज़िक, अच्छा साहित्य, साफसुथरी जगह। पुराने कॉफीहाउस भी याद आ रहे हैं।  उन्हें बेहतर क्यों नहीं बनाया जा रहा।

अब ये तो प्रकाशक ही बेहतर बताएंगे मगर पुस्तक मेले में लोगों की अच्छी मौजूदगी होती है, किताबें भी खूब खरीदी जाती हैं, लोगों पर ये इल्जाम भी पूरा सही नहीं कि वो किताबों पर खर्च नहीं करते। पुस्तक मेले में शनिवार-रविवार को उमड़ती भीड़ क्या ये नहीं बताती कि हमें किताबों से प्यार है। सचमुच। हम किताबें पढ़ना चाहते हैं। किताबें हमारी दोस्त हैं। किताबें देखते-पढ़ते-समझते-ढूंढ़ते-ढूंढ़ते हम दोनों के पांव बुरी तरह थक गए। हॉल से बाहर निकल हमने कॉफी पी। पुस्तक मेले से मैं एक पोस्टर लेकर आई। अपने कमरे के दरवाजे पर इसे चस्पा कर दिया है। इसमें नाज़िम हिकमत की कविता दर्ज है....
पेड़ों पर गाते जा रहे हैं परिंदे
उनके पंखों में उड़ने की प्यास है..



15 January 2014

बीड़ी जलइले



शादीवाले घरों में अक्सर कमरे का बंटवारा कर दिया जाता है। पुरुषों के कमरे अलग। औरतों के कमरे अलग। वो औरतों का कमरा था। बिहार के लोग थे ज्यादातर। शादी उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर में थी। कमरे की दीवारों से लगे जमीन पर बिछे गद्दे। सब पर चादर-तकिए वगैरा लगे थे। उन पर टेक लगाए ज्यादातर बुढ़ियाएं। सब की सब बीड़ी सुलगा रही थी। कमरे में तंबाकू का धुआं, बीड़ी की गंध भरी हुई थी। माचिस के लिए एक आवाज़ उठती, उसी में दूसरा सुर लगता, फिर तीसरा, साथ में हंसी-ठठ्ठा। हर वक्त माचिस की खोज मची रहती। माचिसवा कहां गइल, माचिसवा ले आव रे...कहां मर गइल संजइया, मचिसवा काहे ना किन लइते, जा तनिक भाग के जा दुकनइया तइ त....। बुढ़ियाएं तुनकतीं और रसोई में खाना पका रही उनकी बहुएं उनसे ज्यादा। चूल्हा जलाने को माचिस नहीं बचता। लाइटर शायद वहां नहीं रहा होगा। बहुत ढूंढ़ढांढ़ कर कोई एक तीलीवाली माचिस की डिबिया मिलती तो सब उसी में बीड़ी सुलगाने को तैयार। लगता था पास की परचून की दुकान से सारी माचिस खरीद ली गई फिर भी कम पड़ गई होगी। हर वक्त कोई माचिस खरीदने दुकान की ओर गया होता। हर वक्त माचिस की खोज मची रहती।

यहां ये तो नहीं समझा जाएगा कि उन्हें बुढ़ियाएं कह सम्मान नहीं दिया जा रहा। दरअसल ससम्मान ये बिलकुल सटीक शब्द है कमरे के उस दृश्य के साथ उन सब के लिए। ज्यादातर की एकदम दुबली-पतली काया। सूती साड़ियों में लिपटी हुई। सब की लंबाई भी बहुत कम लग रही थी। चेहरा झुर्रियों से लिपटा हुआ, आंखें अंदर धंसी हुईं। सब की सब सत्तर पार की तो तय थी हीं, सौ की उम्र के नजदीक लग रही थीं।
फकाफक बीड़ी पीतीं जैसे हमारे यहां मेहमानों को चाय पूछी जाती है, वहां बीड़ी पूछी जा रही थी। जली-अधजली बीड़ियां जहां-तहां पड़ी थीं। सब बुढ़ियाएं लगातार बतियाए जा रही थीं। उनकी बातों का ज्यादातर हिस्सा समझ से बाहर था। लेकिन जो कुछ भी बोल रही थीं अच्छा लग रहा था। 


ये सबकुछ याद आया क्योंकि साल 2014 की रिपोर्ट बता रही है कि धूम्रपान के मामले में अमेरिका के बाद भारतीय महिलाएं दुनिया में दूसरे नंबर पर आ गई हैं। जबकि भारत में धूम्रपान करनेवाले पुरुषों की संख्या में उल्लेखनीय गिरावट दर्ज की गई। एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत में 1980 से 2012 के बीच सिगरेट पीनेवाले पुरुषों की संख्या 33.8 फीसद से घटकर 23 फीसद रह गई है।

सिगरेट, बीड़ी, धूम्रपान, आधुनिकता-स्वतंत्रता साबित करने के हथियार माने जाते रहे। स्त्रियों के लिए स्वायत्तता हासिल करने का ज़रिया भी। हमारे यहां अब भी स्त्रियों को बात-बात पर खुद को साबित करना होता है। मजबूत स्थिति में रह रही स्त्रियों की स्थिति भी इससे अलग नहीं। अपनी आज़ादी अब भी साबित करनी होती है। शायद इसलिए हमारे देश में सिगरेट पीनेवाली महिलाओं की संख्या में इजाफा दर्ज किया जा रहा हो। इस बात पर लगातार सोचते हुए मैंने यही पाया।वैसे मिज़ाज के लिहाज से भी कुछ इसका इस्तेमाल करती हैं जैसे कि सामान्यतया पुरुष।

नब्बे के दशक के शुरुआती दौर में, शादीवाले उस घर में, वरवधू को आशीर्वाद देने जुटीं वो बुढियाएं बरबस ही याद हो आईं। बीड़ी की गंध जिनकी सांसों में बंसी थी और तंबाकू जिनके कलेजे को सुखा रहा होगा। उनमें से ज्यादातर अब हमारे बीच न हों शायद। चूने से पुते सफेद दीवारों पर टेक लगाए औंधी बैठी हुई सब बुढ़ियाएं एक साथ किसी बात पर खिलखिला उठीं। जोरदार ठहाका लगाया, उनके ठहाकों में उनकी सांस खिंचती चली गई। कुछ ठहाके खांसी में तब्दील हो गए। उनके सामने साल 2014 ये रिपोर्ट नहीं लिखी गई थी, अगर रखी भी गई होती तो दृश्य कुछ ऐसा ही होता।

वो फैशनपरस्ती, या अपनी आधुनिकता साबित करने के लिए पक्के तौर पर बीड़ी नहीं पीतीं थीं। 
हां ये सब लिखते-लिखते बीड़ी बनानेवाले मजदूरों का दर्द भी साल रहा है। शायद इसीलिए गीतकार गुलजार की लिखी पंक्तियां भी खूब भाती हैं...बीड़ी जलइले जिगर से पिया। बीड़ी-सिगरेट जिगर से जलते हैं, इनसे जिगर जलता है।