14 June 2014

उत्तराखंड आपदा से हमने क्या सीखा




उत्तराखंड आपदा को एक साल होने को आए। कुदरत का ऐसा खौफनाक खेल इससे पहले शायद ही किसी ने देखा हो। देश के अलग-अलग हिस्सों से आए लोग। केदरानाथ को पूजने के लिए। बाबा केदार के दर्शन के लिए कठिन-दुर्गम रास्ते कय कर पहुंचे श्रद्धालु। किसी को पता न था कि पहाड़ों के उपर कुदरत कौन सा चक्रव्यूह रच रही है। कौन सा बादल फट पड़ेगा और अपने साथ तबाही का सैलाब ले आएगा। पहाड़ों के बीच बड़ी खामोशी से कौन सी झील बुनती चली गई और विस्फोट की तरह उन हजारों श्रद्धालुओं पर टूट पड़ेगी। जो अभी बाबा केदार की पूजा के लिए आरती का थाल सजा रहे थे। जो केदार मंदिर के बाहर नंदी को गेंदा फूलों से सजा रहे थे। बारिशें तो कई दिनों से हो रही थीं। लेकिन उन बारिशों में एक खतरनाक धुन छिपी थी। ये शायद ही कोई भांप सका था। पूरी केदारघाटी अपने श्रद्धालुओं की श्रद्धा से ओतप्रोत पसरी हुई थी। सब जन अपने अपने कामों में जुटे थे। फूलवाले, होटलवाले, चायवाले, घोड़ेवाले। किसी को मालूम नहीं चला कि मंदाकिनी बस हरहरा के गिरने वाली है। किसी सैलाब की तरह अपने साथ सबकुछ बहा ले जाने पर अमादा। विनाश की लीला अपने साथ लेकर उतरेगी मंदाकिनी और चारों तरफ हाहाकार मच जाएगा।
हाहाकार मच चुका था। पहाड़ों से मलबा उतर रहा था। मंदाकिनी उतर रही थी। बादल फट रहा था। झील टूट रही थी। सबकुछ एक साथ। किसी के पास भागने का मौका न था। कुदरत के आगे समूची मानवता बेबस थी। मंदाकिनी के शोर में लोगों की चीखें दबी जा रही थीं। छोटे बच्चों के हाथ उनके मां-बाप से छूट गए थे। कुदरत के करीब रहनेवाले स्थानीय लोग, दूसरे पहाड़ों पर चढ़ इस विनाशलीला से बचने की कोशिश कर रहे थे। कुछ कामयाब भी हुए। लेकिन पहाड़ों को न जानने समझनेवाले लोगों के पास इतना मौका न था। कौन किधर जा रहा था,कौन  कहां गिर रहा था, कौन कहां बह रहा था। कुछ होश नहीं था। मंदिर के आगे शव बिछ गए। गेंदा फूल से सजे नंदी शवों से घिर गए। जान छिपाने के लिए लोग मंदिर के अंदर जा छिपे लोग शवों में तब्दील हो गए। मंदाकिनी की तेज़ प्रलयकारी धारा में लोग बहते चले गए। एक औरत ने अपने पूरे परिवार को बहते देखा। एक बाप ने अपने इकलौते बेटे को बहते देखा। एक मां ने अपनी तीन बेटियों को बहते देखा। कल्पना से इतर कुदरत अपने आप में घटित हो रही थी। और उसके साथ जो हो रहा था उसके बारे में अब बातें ही की जा सकती हैं। रामबाड़ा डूब गया था। घोड़ा पड़ाव डूब गया था। केदारघाटी से शुरू हुई कुदरत की विनाशलीला का दायरा यहीं तक नहीं सीमित था। पूरा उत्तराखंड कांप गया था। बदरीनाथ की सड़कें उधड़ चुकी थीं। ऋषिकेश में गंगा की लहरें तूफान मचा रही थीं। मंदाकिनी, अलकनंदा, भागीरथी के रास्ते में जो-जो आया सब ध्वस्त हुआ। बताया गया कि उस रोज गुस्सैल हुई नदियां अपने पुराने रास्तों पर लौट आईं थीं। जहां वो कभी पहले बहा करती थीं। नदियों के रास्ते बदलने का इल्म किसी को न था।  उन रास्तों पर अब नई इमारतें उगा दी गई थीं। नए होटल बना दिए गए थे। लोगों ने नदियों के बिस्तर पर अपना घर बना लिया था। इसलिए ये तबाही और उग्र हो गई। और भयावह। पांच हज़ार से ज्यादा लोग उत्तराखंड में आई तबाही का शिकार हुए। उत्तराखंड के सैंकड़ों गांव इस तबाही में उजड़ गए। यात्रियों की मौतों के बीच उनके दुख पर ठीक से बात भी नहीं की जा सकी। उनके जख्म अब भी रिस रहे हैं। उस तबाही की दास्तान सुनाने के लिए कुदरत ने कुछ लोगों को बख्श दिया। जो बता सकें कि हमने प्रलय को देखा था।


फिर पड़ताल की बारी आई। उत्तराखंड में ऐसा क्यों हुआ। विकास की लालसा में पहाड़ों में धड़ाधड़ हुए विस्फोटों में सबकुछ इतना कच्चा हो चुका था कि एक चूक पर बचने की गुंजाइश बेहद कम थी। जानने की कोशिश हुई कि छोटी सी केदारघाटी में हजारों की संख्या में श्रद्धालु क्यों जमा हुए। इतने सुदूर पहाड़ियों में पर्यटन की कितनी गुंजाइश रखी जानी चाहिए। देश के किस-किस कोने से कौन-कौन से यात्री आए। उनका पता-ठिकाना क्यों नहीं रखा गया। क्यों नहीं पर्यटकों का रजिस्ट्रेशन हुआ। कैसे नदियों के किनारे गैरकानूनी तरीके से होटल-गेस्टहाउस बनते चले गए। संतुलित पर्यटन की बात हुई। फिर बात हुई नदियों के किनारों को संरक्षित करने की। इको-सेंसेटिव ज़ोन बनाने की। नदियों के रहने के लिए कुछ जगह छोड़ दी जाए। लेकिन इस सब पर बात और कार्रवाई ढीले-ढाले ढर्रे पर ही हुई।

इको-सेंसेटिव ज़ोन को लेकर तमाम तरह के विरोध और भ्रांतियां देखने को मिलीं। स्थानीय लोग खतरा महसूस करने लगे। उत्तराखंड में चल रही छोटी-बड़ी बिजली योजनाओं की पड़ताल शुरू हुई। पर्यटकों का रजिस्ट्रेशन कराया गया।

इस पूरे एक साल में उत्तराखंड में आई आपदा पर ऐसा कुछ नहीं देखने को मिला जो सबक के तौर पर याद रखा जाए। आपदा पर राजनीति ही देखने को मिली। उत्तराखंड आपदा में उजड़े गांवों को अबतक नहीं पूछा गया। इसी वजह से कई गांवों ने यहां लोकसभा चुनावों में बहिष्कार भी किया। उत्तराखंड सरकार ने केदारघाटी में पूजा दोबारा शुरू करने की जल्दबाज़ी दिखायी। जबकि पहली चिंता वहां के रास्तों को दुरुस्त करने की होनी चाहिए थी। ताकि दोबारा वहां कोई हादसा न हो। और अगर हो तो उससे निपटा जा सके। लेकिन वाहवाही बटोरने के लिए सरकार की चिंता केदारनाथ में दोबारा दर्शन कराने की ही रही। खतरनाक हद तक की स्थितियों में दोबारा पूजा चालू भी कर दी गई। यात्रा मार्ग दोबारा चालू कर दिए गए। लेकिन वहां अब भी स्थितियां यात्रा करने योग्य नहीं हैं। वहां अब भी जगह-जगह दबे शवों को देखा जा सकता है। उन शवों को अबतक हटाया तक नहीं गया। प्रलय और मौत के निशान वहां जगह-जगह दिखायी दे रहे हैं और पूजा चालू है।
क्या होता अगर उत्तराखंड में केदारयात्रा एक साल के लिए  स्थगित कर दी जाती। और स्थानीय स्तर पर दुरुस्तगी के काम पहले किये जाते। उजड़े संपर्क मार्गों से कटे गांवों में रह रहे लोगों को पहले ठीक से बसाने का काम किया जाता।
इस बीच केदारघाटी में पूरे साल बर्फबारी होती रही। फरवरी, मार्च, अप्रैल, मई तक बर्फ़बारी से यहां पांच-पांच फीट तक बर्फ़ जमी रही और है। कुदरत जैसे केदारघाटी के जख़्मों पर बर्फ़ की रुई रख रही हो।
उत्तराखंड आपदा  से कुदरत से छेड़छाड़ किस हद तक खतरनाक हो सकता है। हमने जाना कि कुछ जगह नैसर्गिक तौर पर मानवीय क्रियाकलापों से रिक्त ही रखनी चाहिए। कुछ जगहों को उनके प्रकृतितम रूप में रहने देना चाहिए।


23 May 2014

ये तस्वीर कब बदलेगी


चौड़ी सड़क पर आकर खत्म होती गली के मुहाने पर चाय की गुमटी थी। वो बच्चा यहां उदास सा बैठा था। खिन्न था। बारह-तेरह साल की उम्र में ही उसके कंधों पर नई ज़िम्मेदारी आ गई थी। दादा के साथ काम में हाथ बंटाने की। चाय देना, गिलास साफ करना, दादा की अनुपस्थिति में चाय बनाना। अम्मा का इंतकाल तीन दिन पहले हुआ। अम्मा ही दादा के साथ चाय की उस गुमटी में हाथ बंटाती थी। अंतिम दिन तक वो अपनी चाय की गुमटी पर डटी रही। तबियत ढीली चल रही थी। मई की इस बरसाती रात में अचानक और बिगड़ गई। बिना देरी किए उन्होंने दुनिया से कूच कर दिया। अम्मा चली गई तो फर्क बस इतना पड़ा कि चाय की दुकान पर दादा का हाथ बंटाने के लिए बड़े पोते को नियुक्त कर दिया गया। तीनों बच्चों में सबसे बड़ा होने के नाते ये जिम्मेदारी उसे ही मिलनी तय थी। ज़िंदगी के कैनवस पर ये उसका प्रमोशन था या डिमोशन। गली के छोर पर चाय की दुकान के बगल में दोनों छोर पर उसके दो छोटे भाई बहन क्रिकेट खेल रहे थे। छोटी बहन गेंद फेंकती, उससे बड़ा भाई बल्ले से गेंद को हवा में उछालता। उन्हें क्रिकेट खेलता देख बच्चे के चेहरे पर मुस्कान आ जाती। और फिर उतनी ही तेज़ी से लौट भी जाती।  सड़क पर ढुलकती गेंद में जैसे उसकी हसरतें भी ढुलकती जा रही हों। वो ख़ुश नहीं था। परिवार में मिली इस नई भूमिका को स्वीकार नहीं करना चाहता था। लेकिन यहां न कि गुंजाइश नहीं थी।

उसकी उदासी चाय की भाप में मिलकर मई की इस सुबह को और गरमा रही थी। तभी ठंडी हवा के झोंके की तरह वो तीन लड़कियां वहां से गुजरीं। वो भी बारह-तेरह की उम्र की ही थीं। सफेद रंग के सलवार-कुर्ते की यूनिफॉर्म पहने स्कूल जा रही थीं। बीच में चल रही लड़की आत्मविश्वास से लबरेज थी। गली जिस सड़क पर आकर खत्म होती है। वहीं बाईं छोर पर उसके पिता जूस का ठेला लगाते हैं। वो अक्सर ही पिता की मदद करती। सुबह ठेले को तैयार करती। उसके पहियों के नीचे ईंट टिकाती। बोरियों में बंद मौसमियों को निकालकर ठेले पर सजाती। जूस निकालने की मशीन को साफ करती। पिता की मदद के लिए एक-एक मौसमी छील-छील कर रखती जाती। माहिर की तरह वो मौसमी के सख्त छिलके उतार कर रखती। ये सब करते हुए उसके चेहरे पर आत्मविश्वास झलकता। वो बेहद मज़बूत लड़की थी। पिता की मदद कर रही थी। ये सब करते हुए वो उन तमाम बातों को भी ख़ारिज कर रही थी कि बेटा ही बाप का हाथ बंटाता है, बेटी जिम्मेदारी होती है। बेटी अपने पिता का हाथ बंटा रही थी। छोटी सी उम्र में घर की जिम्मेदारी संभाल रही थी। जूस के ठेले पर ज्यादातर अजनबी पुरुष ही आकर रुकते। वो उन सब के बीच पूरी तन्मयता से अपने काम को अंजाम देती। चेहरे पर कोई शिकन नहीं। गली से गुजरते हुए तेज़ चाल, चेहरे पर आत्मविश्वास, जिसमें खुशी की एक लकीर भी खिंची थी, अपने पीछे वो सुखद एहसास छोड़ गई। 

इसी सड़क पर जूस के ठेले से पहले ही बस स्टैंड है। जिसके बगल में कूड़े का ढेर पड़ा रहता है। यहां यात्री इंतज़ार नहीं करते। बस थके-मांदे लोग बैठकर सुस्ताते हैं। बारह-तेरह की उम्र के ही दो बच्चे झूमते हुए बस स्टैंड पर आ बैठे। उनकी चाल से पता चल रहा था वो नशे के झोंके में हैं। बेहद खराब हालत में। कपड़े चीथड़ों जैसे। आंखें नशे में बुझी हुई। जीवन का न्यूनतम सौंदर्य़ भी नहीं झलक रहा था उनमें। उनमें से एक ने अपनी जेब से एक पन्नी निकाली। उसमें ब्रेड पकौड़े के दो टुकड़े थे। दूसरे बच्चे ने अपनी जेब से लाल रंग का एक चमकता हुआ पाउच निकाला। इस पाउच को देखकर समझा जा सकता था कि ये बिलकुल नया है। इसमें वाइटनर था। ब्रेड पकौड़े के उपर उन्होंने वाइटनर लगाया, फोल्ड किया और खा लिया। उन दोनों की ओर किसी की नज़र नहीं थी, न उनकी नज़र किसी की ओर। जैसे वो इस दुनिया में होके भी नहीं हैं। या वो हैं ही क्यों। वो देखना भी नहीं चाहते थे इस समाज को। न समाज देख रहा था इनकी ओर। खुद में खोने के लिए उन्हें नशा सिखा दिया गया था।

21वीं सदी के भारत के एक महानगर की सड़क का ये बेहद आम दृश्य। हर कोई अपनी अलग कहानी में लिपटा हुआ। अपनी दिक्कतों से जूझता हुआ। सड़क बढ़ती हुई। सड़क के साथ लोग बढ़ते हुए। उनकी कहानियां बढ़ती हुईं। एक दूसरे से होड़ लेती हुईं। एक दूसरे को छूती हुईं। कभी मुस्कुराती हुईं। कभी दनदनाती हुईं। लेकिन बच्चे। बच्चों की कहानियां एक सी ही होनी चाहिए। सिर्फ मुस्कुराती हुईं। ये तस्वीर कब बदलेगी।








10 May 2014

शब्दों की तलाश में


जब ज़िंदगी किसी शिल्प में न ढल सकीं
कविताएं कैसे ढलेंगी
पूछती हूं खुद से
अनमनी, अधूरी, बिखरी
शब्दों के पैमाने पर कैसे नापूं
पतझड़, अंधड़, उमड़ता समंदर
बेचैनियों को, उमड़ती लहरों को
किन लफ्जों में समेटूं
जो सुबहें सूरज उगने पर न हों
जो रातें टुकड़ों में आती हों
उजाले का सुबह से नाता न हो
रात सूरज को ढांक कर हो
एक जलती लौ में प्रवेश कर
चले जाएं किन्हीं रास्तों पर
किन्हीं बस्तियों में
जिनका पता...नहीं पता..
जहां सवाल नहीं जवाब हों
अब ऐसे अबूझ को कैसे लिखें
खड़कने लगे चुप खड़े दरवाजे
धूप-हवा-पानी सब
होने लगें एक दूसरे में मगन
उड़ने लगे धूल हर तरफ
दीखता जब कुछ नहीं
आए ऐसा अंधड़
कुदरत की इस बेचैनी
को किन शब्दों में ढालें
कोई इंद्रधनुष ले आएं
तड़पते मन को कस कर बांधें
बिखरे शब्दों, बिखरी कविताओं के लिए
कोई बिखरा शिल्प तलाशें


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उस छल का क्या करे
जिससे छली जाती है हर रोज
घर में, मन में
अपनी ही आंखों में
होती है तिरस्कृत
उतरती चली जाती है
अंतर्मन की सीढ़ियों से
दिल के कोनों में कहीं बसी
गहरी  उदास झील किनारे
चुप बैठती बड़ी देर वहां
मन का मौन टूटता नहीं
आंखों से अंदर ही अंदर
झर-झर बह गए आंसू
भरती जाती झील लबालब
तूफान उमड़ने को होता है
पर उमड़ता नहीं
खुद से हारी हार
बड़ी खतरनाक
दिल टूटता है
अब मगर रोता नहीं
लौट आएगी जल्दी ही
हां मालूम है
कोई नहीं कर रहा इंतज़ार










18 April 2014

ये चुनाव का मौसम है



कम से कम पिछले छह महीने से हर सुबह हम खीझ रहे हैं। आज मोदी ने ये कह दिया। केजरीवाल समझता क्या है खुद को। मोदी-केजरीवाल, मोदी-केजरीवाल। तेज बहसाबहसी। एक आदमी गुस्से से आग बबूला हो जाता है। ज्यादा ज्ञानी लोग ज्यादा तर्क देते हैं। किताबें कम पढ़नेवाले लोग अनुभव आधारित बातें कहते हैं। जुबानी जंग से हर रोज सुबह की शुरुआत होती है। आप चाहे न चाहे इस शगल में शामिल हो ही जाते हैं। घर से दफ्तर तय कर आएं कि आज कोई बहस नहीं करेंगे। मुंह बंद ही रखेंगे। लेकिन ऐसी बातें कही जा रही होती हैं कि आप खुद को रोक नहीं पाते और बीच बहस में कूद ही पड़ते हैं। इस समय दो ही धड़े हैं। मोदी धड़ा और केजरीवाल धड़ा। मोदी के खेमे में ज्यादा लोग हैं। केजरीवाल के खेमे में कम लेकिन बुद्धिजीवी लोग हैं। बहस में कोई पीछे नहीं। जैसे चूल्हे पर रखे उबलकर गिरने ही वाले दूध के भगोने पर आंच दौड़कर बंद या धीमा किया जा जाता है, वैसे ही बहस में शामिल होनेवालों के खौलते खून को किसी मजेदार बात से धीमा करना पड़ता है। इक्के-दुक्के कांग्रेसी इस समय चुप्पी साधे हैं। वो अपने मौन का मतलब बखूबी जानते हैं। अंत में सब झींककर कहते हैं भाड़ में जाए, जिसकी भी सरकार बने हमें कौन पूछता है। क्या कांग्रेस, क्या बीजेपी। हम तो वहीं के वहीं हैं। महीने के आखिर में खत्म हो चुकी तनख्वाह और आनेवाली तनख्वाह के बीच झूलते हुए। हमारा क्या। 

लेकिन अभी बहस का दूसरा दौर उठेगा और फिर ये सब फुंफकार पड़ेंगे। अरे मोदी-मोदी, अरे केजरीवाल-केजरीवाल। कांग्रेस-बीजेपी में फर्क ही क्या है। गुजरात का सच क्या है। केजरीवाल की सोच को कोई नहीं पकड़ सकता। हंसी-ठठ्ठे में बहसें कभी धीमे कभी तेज़ी से आगे बढ़ती रहती हैं। सब अफसोस जताते हैं कहां पेट्रोल,प्याज और महंगाई की बात करनी थी। एफडीआई की बात करनी थी। लेकिन चुनाव के ऐन पहले बात बस हिंदू-मुसलमान की हो रही है। ब्राह्मण,ठाकुर,दलित वोट की हो रही है। एनडीटीवी वाले रवीश किसी ऐसे गांव की रपट ले आए जहां बीएसपी के ही झंडे लगे हैं। फिर मोदी की लहर कैसे हुई। ये टीवी पर बनायी गई लहर है, बहस का नया एजेंडा। 

नेता बड़ी-बड़ी रैलियां कर रहे हैं, सभाएं कर रहे हैं। हजारों की संख्या में पब्लिक जुटा रहे हैं। आज नेता जी का मन कुछ चुलबुला हो रहा है तो रैलियों में शेर और लकड़बग्घे की कहानी सुना रहे हैं। अरे क्या शेर-लकड़बग्घा सुनाने के लिए इतनी भीड़ जमायी। इतना पैसा बहाया। कोई टॉफी खिला रहा है कोई गुब्बारे की हवा निकाल रहा है। कुछ द्वितीय श्रेणी वाले नेता कुत्ते-बिल्ली पर भी उतर आए हैं। उनका अपना अलग राग-अलाप है। 

इस चुनाव में तो ट्विटर ने भी खूब खेल कर दिया। कोई मर गया ट्विटर पर लिख दिया रिप(रेस्ट इन पीस)। हुआ यूं कि एक बार किसी गलत खबर पर रिप कर दिया। फिर तो एक के बाद एक कई रिप हो गए। जीते जी एक इंसान को इतने रिप मिल गए, बाकी तो...। दिग्विजय सिंह तो ट्विटर के मामले में मास्टर हैं। अटलबिहारी वाजपेयी सशरीर तो नहीं लेकिन प्रसंगवश इस चुनाव में शामिल ही रहे। बीजेपी जहां कमजोर पड़ी अटल जी की याद हो आई। कांग्रेस भी उन्हें नहीं भूली। राजनाथ सिंह ने तो अटलबिहारी वाजपेयी के अंगवस्त्र ले लिये। जैसे महाभारत में कर्ण को कवच-कुंडल मिले। 

शुक्र है कि इसी चुनाव में हमारे एनडी तिवारी बाप बन गए। उन्हें पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई। बाकी तो एक से बढ़कर एक पलटूबाज सामने आए। सब एक दूसरे धड़े के नेता खींच रहे थे। और सिर्फ नेता ही नहीं गुंडेटाइप वालों की चांदी भी तो इसी समय में होती है। क्या साधु क्या शैतान। इस समय तो सब चुनाव के लड़ाके हैं। जिसको जिधर मौका मिला भग लिया। कांग्रेस के एक उम्मीदवार को तो बीजेपी ने ऐन चुनाव से ठीक पहले लपक लिया। सबसे बड़ा पलटू कौन।

हंसी-चिरौरी के बीच ये चुनाव बहुत रुलानेवाला भी रह। क्या मुज़फ़्फ़रनगर को इस चुनाव के लिए ही जलाया गया। हम 16वीं लोकसभा का चुनाव लड़ रहे थे लेकिन घूम-फिर कर वहीं आ गए जहां से चले थे। हिंदू-हिंदू, मुसलमान-मुसलमान।


11 April 2014

ये ज़िंदगी उसी की है..

इस ख़ूबसूरत गाने को कई-कई बार सुना, जितना सुनो और सुनने को दिल चाहता और आज की हक़ीकत की कसौटी पर ये गीत तो रिसते ज़ख़्मों पर हाथ रखने जैसा है। फिल्म अनारकली का ये गाना। जब अनारकली को मोहब्बत की सज़ा दी जा रही थी। उसे ज़िंदा दीवार में चुनवाया जा रहा था।


ये ज़िंदगी उसी की है जो किसी का है प्यार ही में खो गया...ये ज़िंदगी उसी की है

डर लगता है लोगों को न। किसी का होना और प्यार में खोना। मैं रोज़ सुबह खबरों की दुनिया में जागती हूं। दफ्तर में कुर्सी संभालते ही जिन ख़बरों से दो चार होना होता है उसमें दो एक बलात्कार की खबरें जरूर होती हैं। तीन-चार साल की बच्चियों तक से बलात्कार। ऐसा लगता है कई बार कि शरीर में रग-रग से तेज़ाब बह रहा हो..। आतंक की तरह छा गया है बलात्कार। समझ हासिल कर रही चौदह-पंद्रह-सोलह साल की बच्चियां इस शब्द से गुत्थमगुत्था होने लगीं हैं और आपस में गुपुचुप इस पर बातें करती हैं। औरतों से अपराध की ख़बरों ने लड़कियों के रूह को छलनी कर दिया है। प्यार की लहर उठने की उम्र में अगर बलात्कार-लड़कियां उठाने, मारने, तेज़ाब झोंकने जैसी घटनाओं की दहशत उठ रही हो तो ये वक्त किसी सूरत में बदलना चाहिए। ये किस तरह का समाज बना रहे हैं हम। ये कैसा माहौल बना रहे हैं हम। क्या एक सभ्य समाज में प्यार से ज्यादा नफ़रत की जगह होनी चाहिए।

जो दिल यहां न मिल सके, मिलेंगे उस जहान में, खिलेंगे हसरतों के फूल, जा के आसमान में
ये ज़िंदगी चली गई जो प्यार में तो क्या हुआ...

जब ये तय है कि प्यार करनेवालों पर कितने पहरे बिठा लो, कितनी पंचायतें कर लो। खाप, और खाप के बाप भी हों..। नहीं बदल सकते। किसी के दिल में पनप रहे अदने से प्यार को। तो वो प्यार अदना नहीं उसके आगे अदने से आप हो। कितने लड़के-लड़कियां सोलह-सत्रह-अठरह की उम्र में मार दिए जाते हैं। लैला-मजनूं, सिरी-फरहाद तो दो चार कहानियां हैं। कितनी लैला, कितनी सिरी कत्ल कर दी गईं, कत्ल की जा रही हैं। कितने मजनूं, कितने फरहाद मार-काट दिए गए। हुआ क्या। मुज़फ़्फ़रनगर को देखो। हैवानियत की आग में जल गया। प्यार में डूबा एक जोड़ा ही तो था। जिससे किस्सा शुरू हुआ। उसे रोकने, मारने, खत्म करने की, नफरत की चिंगारी ने, मुज़फ़्फ़रनगर में कितने घर जला दिए। प्यार पर सियासत खेल गई। मुज़फ़्फ़रनगर के लोगों के हाथ क्या आया।
ग़म, गुस्सा,आंसू, जले घर, बुझे चूल्हे, मरे हुए छोटे बच्चे, लुटी-पिटी औरतें। क्या यही हासिल चाहिए था। क्या इतने बर्बर हैं हम। कि एक चिंगारी उठे और हमारे दिलों के अंदर दबी बर्बरता, हमारे अंदर पल रहा जानवर बाहर निकलकर नंगा नाच करे। हैवानियत का खेल खेले।

सुनाएगी ये दास्तां शमा मेरे मजार की, फिजा में भी खिली रही ये कली अनार की
इसे मजार मत कहो ये महल है प्यार का

मुज़फ़्फ़रनगर दंगों में एक छोटी सी बच्ची लापता हुई थी। कोई 6 साल की। हिंदू की बच्ची थी। पार्वती सरीखा कुछ नाम था। एक मुसलमान को मिली। वो बच्ची को घर ले गया। उसकी पत्नी ने बच्ची को आसरा दिया। बीस दिनों तक वो हिंदू बच्ची मुसलमान परिवार के घर महफूज़ रही। एक मुंह से दूसरे मुंह खबर आगे बढ़ती रही। बच्ची के माता-पिता आ पहुंचे अपनी पार्वती को साथ ले जाने।  सबने मिलकर तस्वीर खिंचाई। तस्वीर टीवी-अखबारों में आई। सबने दिल खोलकर कहा इंसानियत इसी को कहते हैं। जिस समय मुज़फ़्फ़रनगर नफ़रत की आग में धधक रहा था ये प्यार और इंसानियत की शमा रौशन हो रही थी। इसे मजार मत कहो ये महल है प्यार का।


 ये ज़िंदगी की शाम आ, तुझे गले लगाऊं मैं, तुझी में डूब जाऊं मैं, जहां को भूल जाऊं मैं
बस एक नज़र मेरे सनम....अलविदा अलविदा अलविदा अलविदा अलविदा अलविदा अलविदा अलविदा

और अगर तुर्रा हार मनवाने का है। सिर झुकाने का है। खत्म करने, तहस-नहस करने पर ही अमादा हों सभी।
नहीं ठहरेगी लड़कियों से हिंसा की ये वारदातें। उन्हें दबाने-झुकाने-नीचा दिखाने की कसरतें। तो तस्वीर ऐसी बनती है कि क्या सब लड़कियां खड़ी हो जाएं किसी गहरी खाई किनारे या खुद ही चुनने लगें खुद को अपनी हसरतों की दीवारों में...ये गाते हुए कि ऐ ज़िंदगी की शाम आ तुझे गले लगाऊं मैं, तुझी में डूब जाऊ मैं, जहां को भूल जाऊं मैं....कह जाएंगी अगर सब लड़कियां दुनिया को अलविदा....क्या दुनिया चलेगी। क्या माओं की कोख में अंकुर बनने से मना कर देंगी लड़कियां, जन्म लेने से मना कर देंगी लड़कियां। फिर क्या करोगे।

सच तो ये है कि लड़कियां गाना चाहती हैं ज़िंदगी का सबसे अच्छा राग...वो है...

ये ज़िंदगी उसी की है जो किसी का हो गया, प्यार ही में खो गया


सच यही है कि लड़कियां प्यार ही तो करना चाहती हैं, प्यार गाना चाहती हैं, वो मजार को भी प्यार का महल बनाती हैं, वो शमां हैं, जो प्यार की दास्तां सुनाती हैं...। मत रौंदो। पछताओगे।

07 April 2014

मेरी लाल साइकिल और आज़ादी की उड़ान

रोड डायरी


मेरी साइकिल। उसका नाम मैंने लाल परी रखा था। आज़ादी का शायद पहला एहसास इस लाल परी के साथ ही हुआ था और खुद के बड़े होने का भी। आठवीं में थी मैं जब मेरे पास मेरी अपनी साइकिल आयी। लाल रंग की। पसंद था उसका ये रंग मुझे। मेरी एक फ्रेंड के पास खाकी रंग की साइकिल थी और दूसरी के पास नीले रंग की पुरानी साइकिल। मेरी नई चमचमाती साइकिल मुझे उन दोनों की साइकिल से ज्यादा पसंद थी। उनकी साइकिल देख मैं सोचती थी काश मेरे पास भी एक होती।

उस साइकिल को खरीदने में मैंने भी सौ रुपये का योगदान दिया था अपनी पॉकेटमनी से पैसे बचाकर और रिश्तेदारों से विदाई के वक़्त मिले पैसे सहेजकर। मम्मी स्कूल जाते वक़्त रोज़ एक रुपये देती थी। उन दिनों ये पॉकेटमनी कम बिलकुल नहीं थी। उस एक रुपये में हम आलू टिक्की खा सकते थे और बर्फ वाली औरेंज आइसक्रीम भी। शायद पचास पैसे में आलू टिक्की मिलती थी। आइसक्रीम भी इतने की ही। महंगाई के दौर में उन सस्ती आइसक्रीमों-आलू टिक्कियों की कीमत भी ठीक से याद नहीं रही। लिखते हुए लग रहा है जैसे मैं 1935 में पैदा हुई हूं, लेकिन ये बात 1989-90 के दौरान की है। उस साइकिल के साथ चंद पर अनमोल यादें जुड़ी हुई हैं और एक दुर्घटना भी।


किसी और की साइकिल से सीखने के दौरान ही मैंने सैर कर रही एक मोटी महिला को पीछे से ठोक दिया था। बचाते-बचाते भी मेरी साइकिल की हैंडल उसकी कमर पर जा लगी। वो साड़ी पहने थी और पीछे से उसकी थुलथुली पीठ दिख रही थी। बस मेरी हैंडल वहीं जा टकरायी। उस छोटी दुर्घटना के साथ उस महिला की थुलथुली पीठ भी मेरी यादों में बस गई। अह। मैं पूरी तरह नहीं गिरी, लड़खड़ाते हुए खुद को और अपनी साइकिल को संभाल लिया था।

अपने भाई की साइकिल पर भी मैंने कैंची चलाना सीखने की कोशिश की लेकिन वो एक असफल प्रयास था और मुझे किसी को कैंची चलाते देख मज़ा भी नहीं आता था। जब साइकिल है, उस पर सीट है, तो बैठने के बजाय टेढ़े होकर पैडल मारने का क्या मतलब भला।

खैर मेरी साइकिल में दिलचस्पी की बात मेरे प्यारे पिताजी को पता चल गई थी और उन्होंने मेरा दिल नहीं तोड़ा। आठवीं क्लास में रहते हुए मेरे पास मेरी दो निजी संपत्ति थी। एक तो घड़ी और दूसरी मेरी नई साइकिल। स्कूल से निकलते हुए बच्चों की कतार के बाद साइकिलवालों की जो कतार लगती थी उसमें खड़ी होने पर मुझे गर्व का एहसास होता। फिर स्कूल की कुछ ही लड़कियां साइकिल से आतीं तो छोटी कतार में शामिल होकर मेरा गर्व भी महान हो जाता था। वाह।

स्कूल से लौटते समय हम आपस में होड़ लगाते। कई बार पीछे से आ रहे किसी पेट्रोलवाले वाहन को रास्ता भी नहीं देते। हमारी साइकिलें हमसे ज्यादा इठलाती हुई सड़क पर फिरतीं और ये एहसास सबसे ज्यादा सुखद था। शायद इसी को मैं कहना चाहती हूं ये खुली हवा को महसूस करने और जीने का एहसास था। उसकी महक अब भी ज़ेहन में ताज़ा  हो उठती है क्योंकि शायद खुली हवा को महसूस कर पाने का, वही पहला एहसास था।

साइकिल के नौसिखियेपन के दिन की एक और मज़ेदार घटना याद है। मज़ेदार अब, तब नहीं। मैं एक छोटे से चौराहे से निकल रही थी कि ये स्कूटर वाला पीछे से आया, मेरी साइकिल का स्टैंड उसके स्कूटर में फंस गया, करीब साठ-सत्तर डिग्री के कोण पर और मेरी साइकिल उसके स्कूटर के साथ घिसट पड़ी, बस कुछ ही कदम मान लो, पर मैं बुरी तरह डर गई थी। सचमुच।

पर ये तो कुछ भी नहीं था। आगे जो होनेवाला था वो इससे भी डरावना था।

अब मुझे साइकिल चलानी अच्छी तरह से आ गई थी इसलिये मैं थोड़ी स्मार्टनेस भी दिखाने लगी थी। स्कूल से लौटकर मोहल्ले में दाखिल होते समय ढलान थी। मेरे आगे एक ट्रैक्टर जा रहा था, ईंट से लदा हुआ। उसकी धीमी रफ्तार ने मुझे ओवरटेक करने पर मजबूर कर दिया। ट्रैक्टर को पीछे छोड़ निकलते समय सिर्फ इतना पता चला कि एक लड़का बहुत तेज़ रफ्तार में साइकिल चलाता हुआ आया, शायद मेरी साइकिल से टकराया और ढलान की वजह से मैं आगे की ओर गिरी। खुद को ट्रैक्टर के यमराज इंजन के नीचे पाया। ये सब ठीक-ठीक कैसे हुआ पता नहीं चल सका। सड़क के एक ओर ऊंची दीवार थी, ट्रैक्टरवाले ने मुझे बचाने के लिये सूझबूझ दिखाते हुए स्टेयरिंग दीवार की ओर मोड़ दी थी। होश संभलने और दिमाग़ के पटरी पर लौटने पर देखा वहां दीवार का एक हिस्सा ढह गया था। वो लड़का अपनी साइकिल समेत भाग गया था। ट्रैक्टर का इंजन ख़ासा ऊंचा होता है, मेरी जैसी मरियल छोकरी दोनों के गैप के बीच आसानी से समा गयी थी। सामाजिक प्राणी होने का परिचय देते हुए कुछ लोग मुझे ट्रैक्टर के इंजन के नीचे से घसीट कर बाहर निकाल रहे थे। मेरी साइकिल कई जगह से टेढ़ी-मेढ़ी हो चुकी थी। बैग से मेरा स्टील का खूबसूरत डबल डेकर टिफिन बाहर निकल आया था और बुरी तरह पिचक गया था। मौका-ए-वारदात के दूसरी तरफ डॉक्टरों की एक कॉलोनी थी। कुछ लोग आवाज़ देकर अपनी बॉलकनी पर टंगे एक डॉक्टर को नीचे बुला रहे थे। इंसानियत का पूरा परिचय देते हुए उस डॉक्टर ने नीचे आने से मना कर दिया। इतने ख़ौफ़, दर्द, दहशत, आंसू के बाद भी मैं ये समझ पा रही थी कि वो एक्सीडेंट-वेक्सीडेंट के झमेले में नहीं पड़ना चाहा था। मुझ पर से मिट्टी-सिट्टी झाड़कर, ज़ख्म पर डिटॉल की रुई लगा दी गई। लोगों ने मेरा पता पूछा, मैंने घर का रास्ता बता दिया और रिक्शे पर लादकर मुझे घर पहुंचाया गया, मेरे साथ मेरी साइकिल को भी। घर पहुंचते ही मेरे इमोशन फूट पड़े और मैंने रोना चालू किया। उससे पहले मैं सिर्फ कराह रही थी। मैं अस्पताल ले जायी गई। यहां की एक अच्छी अनुभूति ये थी कि मेरे भाई ने मुझे अपने हाथों में उठाया और वॉर्ड के अंदर ले गया। हालांकि तब मैं बहुत दुबली थी, फिर भी मुझे लग रहा था कि उसने मुझे कैसे उठाया होगा।

इसके बाद लाल परी के साथ स्कूल जाना नसीब नहीं हुआ। मैंने अपनी साइकिल पर पैडल तो मारे लेकिन उल्लेखनीय कुछ भी नहीं।

इस पूरी घटना का सबसे खराब पहलू ये था कि इतनी बड़ी और भीषण दुर्घटना से गुजरने के बाद भी मुझे कुछ नहीं हुआ। न पैर में कोई फ्रैक्चर आया, न हाथों में लंबी पट्टी बंधी, न सर पर बैंडेज सजा। सिर्फ सड़क पर गिरने की वजह से खरोंचे ही हासिल हुईं। सोचिये कि लोगबाग मेरे एक्सीडेंट की ख़बर सुन मुझसे मिलने आते और मुझे चलता-फिरता देख कितने मायूस होते। बेचारे अपनी सहानुभूति जताने के लिये बटोरे गये शब्दों का भी सही इस्तेमाल नहीं कर पाते।

उनसे ज्यादा मायूस तो मैं थी। एक्सीडेंट भी हुआ, ठीक से घायल भी न हुई, देखने आनेवालों को भी निराश किया।  और तो और शर्म का एक कारण ये भी था कि एक्सीडेंट भी हुआ तो ट्रैक्टर से, कोई वड्डी गाड़ी होती, कार होती, ट्रक होता, मगर ट्रैक्टर.....। हाय-हाय।

हां लेकिन एक बात तो शानदार हुई थी। मैं अपने मोहल्ले में मशहूर हो गई थी। वो लड़की जिसे ट्रैक्टर के नीचे आने के बाद भी कुछ न हुआ, बस चंद खरोंचे आयीं। हा-हा-हा।

06 March 2014

अपनी दुनिया की 'हीरो'




मेरी बेटी को डोरेमॉन बहुत पसंद है। वो छोटा भीम देखती है। कृष्णा देखती है। ऑगी देखती है। टॉम एंड जेरी देखती है। उसकी कल्पना के संसार में डोरेमॉन, छोटा भीम, कान्हा, ऑगी जैसे कैरेक्टर हैं। एक ताकतवर हीरो के रूप में उसके सामने छोटा भीम है। एक स्मार्ट कैरेक्टर डोरेमॉन का है। कान्हा की बदमाशियां हैं, कान्हा बुरे लोगों को मारता है।
पिछले दिनों अपनी चार साल की बेटी की बातों से मैंने जाना कि वो खुद को कमज़ोर मानने लगी है। वो ये जानने लगी है कि लड़कियां शारीरिक तौर पर कुछ कमज़ोर होती हैं। गौर करनेवाली बात है कि वो कोमलता की बात नहीं कर रही थी, कमज़ोरी की बात कर रही थी। मैं परेशान हुई और लगातार इस बारे में सोच रही थी। उसे समझाने की कोशिश कर रही थी कि असल ताकत तो दरअसल दिमाग में होती है। चार साल की बच्ची का आत्मविश्वास कैसे बढ़ाया जाए। ये आसान बात तो नहीं।
मैंने ग़ौर किया कि मेरी बेटी की कार्टून सीरियल की दुनिया में कोई लड़की कैरेक्टर नहीं। डॉरेमॉन में शुजुका है लेकिन उसका किरदार साइड कैरेक्टर जैसा ही है। छोटा भीम में छुटकी का किरदार भी साइड लाइन वाला ही है।
फिर मैंने ऐसे कार्टून तलाशने शुरू किए जिसमें मज़बूत लड़की किरदार हो। ऐसे कार्टून सीरियल मिले तो लेकिन वो कामयाब सीरियल नहीं हैं। पावरपफ गर्ल्स समेत कुछ और ऐसे कार्टून के बारे में मैंने जाना। फिर मैंने ये भी सोचा कि लड़की कैरेक्टर वाले कार्टून खूब क्यों नहीं देखे गए। पॉप्युलर क्यों नहीं हुए। वो ऐसे बने नहीं। बने तो फिर उन्हें देखनेवाला दर्शकवर्ग (चाहे वो बालदर्शक ही क्यों न हों) ये बात स्वीकार नहीं कर सका कि लड़कियां भी चमत्कृत ढंग से कुछ काम कर सकती हैं। बच्चों की दुनिया में एक तरफ स्पाइडरमैन, सुपरमैन, बैटमैन हैं। जो बुरे लोगों और बुराई से लड़ते हैं। लोगों की मदद करते हैं। लेकिन इसके दूसरे छोर पर कोई स्ट्रॉन्ग वुमन किरदार नहीं है। फिल्म और सीरियल बनानेवाले लोगों ने ऐसे स्त्री किरदार को गढ़ने में कोई ख़ास दिलचस्पी नहीं दिखायी। उसे कामयाब करने के लिए कोई फॉर्मूला नहीं सोचा। जबकि हर कार्टून सीरियल में हीरो की एक ख़ास स्त्री दोस्त है, जो उसे समझती है, उसकी दोस्त होती है, उसके साथ मिलकर दुश्मनों से मुक़ाबला करती है लेकिन वो उस सीरियल की हीरो नहीं होती।

झांसी की रानी लक्ष्मीबाई के किरदार पर टेलिविज़न में काम तो हुआ। मगर ऐसा प्रभावी नहीं कि लोग उस सीरियल को बार-बार याद करें और देखना चाहें। कल्पनाशक्ति से नए और प्रभावी फीमेल कैरेक्टर्स उस तरह गढ़े नहीं गए। सोप ओपेरा में तो औरतों की कमज़ोर, झगड़ालू या फिर सती सावित्रीवाली छवि दर्शायी जाती है। जो और भी खराब और खतरनाक है। बच्चियों की दुनिया का क्या। बार्बी, स्नोव्हाइट परियों की सी कहानियां हैं। सिन्ड्रेला एक अच्छा राजकुमार चाहती है। ये सीरियल बच्चियों को मज़बूती तो नहीं देते हां उनके कोमल सपनों के संसार को विस्तार देते हैं।
हमारे निर्माता-निर्देशकों,फिल्म-टेलिविज़न से जुड़े लोग क्या छोटी बच्चियों के लिए वो कोई ऐसा मजबूत किरदार नहीं गढ़ सकते, जो लड़की हो, अपने दिमाग़, अपने हौसले से मुश्किलों को आसान करती हो। बड़ी से बड़ी चुनौतियों का सामना करती हो।  
जबकि असल दुनिया में तो ऐसे बहुत से किरदार हैं। इंदिरा गांधी, सोनिया गांधी, ममता बनर्जी, मायावती, जयललिता ये देश और राज्य को लीड करनेवाली महिलाएं हैं। सिनेमा तो समाज का आइना होता है। सिनेमा ऐसा कोई किरदार नहीं गढ़ पाया जो बच्चियों को उनके टेलिविज़न की दुनिया में एक महिला लीडर दे। लड़कियों के सामने कोई तो मज़बूत कैरेक्टर हो जिसकी तरह वो बनना चाहें।



जबकि इस समय में बच्चियां अपने ईर्दगिर्द अपेक्षाकृत मजबूत महिलाओं को देख रही हैं। जो स्कूल-कॉलेज-दफ्तर जा रही हैं। हालांकि घर में ज्यादातर वो पुरुष सदस्य का प्रभुत्व देखती हैं। लेकिन हमारी दुनिया के समय से इनकी दुनिया के समय में अपेक्षाकृत मजबूत महिलाएं दिख रही हैं। जो अपने फैसले खुद ले रही हैं। जो अपनी इच्छाओं को बात-बात पर मारती नहीं। बची हुई आखिरी रोटी नहीं खातीं। लड़कियों की दुनिया में अब स्कूल, स्कूल के बाद कॉलेज, कॉलेज के बाद ऑफिस की तस्वीर साफ हुई है। यानी एक कामकाजी,मज़बूत महिला की।



अपनी बेटी को बढ़ता देख मैं समझने की कोशिश कर रही हूं कि कैसे लड़कियों की दुनिया बुनी जाती है। उनके दिमाग़ में चित्र गढ़े जाते हैं। जिसमें धीरे-धीरे बच्चियां स्वीकार कर लेती हैं कि वो कुछ कमतर हैं, वो अपनी दुनिया की हीरो नहीं, साइडलाइन कैरेक्टर हैं, हीरो की दोस्त हैं। जो इसे नहीं स्वीकार करतीं रिबैलियस कहलाती हैं। मैं चाहती हूं लड़कियों की दुनिया में ज्यादा से ज्यादा रिबैलियस हों। सीधा होना अच्छा तो है मगर सफल नहीं।


 (चित्र गूगल से साभार)