29 May 2016

मेट्रो में आज़ादी का सफ़र



महिलाओं के खिलाफ हिंसा से जुड़ी तमाम खबरों, आंकड़ों, हकीकत के बीच औरतों की आजादी से जुड़ी यह एक सुंदर तस्वीर है। दिल्ली की मेट्रो में सफर करती महिलाओं की तस्वीर। मेट्रो स्टेशन पर तेज कदम के साथ वे दाखिल होती हैं। उनकी चाल में उनका आत्मविश्वास झलकता है। उनकी आंखों में सफलता की चमक है। उन तमाम लड़कियों के चेहरे पढ़िए, कुछ एक को छोड़ दें तो ज्यादातर मजबूत-आत्मनिर्भर लगती हैं। अपने बैग कंधे पर डाले वे आगे बढ़ती हैं। पहले बाजारों में लड़कियां-महिलाएं डरी-सहमी या चौकस सी ज्यादा दिखाई देती थीं। जैसे कभी भी कोई हादसा उनकी तरफ लपकता हुआ आ सकता है। उस सूरत में वह कुछ नहीं कर पाएंगी। उनकी मदद कोई नहीं करने आएगा। 

आजादी और बराबरी का संघर्ष पीढ़ियों से जारी है। एक बार फिर यह उल्लेख करते हुए कि महिला हिंसा और बलात्कार के बढ़ते मामलों के बावजूद, लड़कियों की स्थिति बेहतर हुई है। मेट्रो के लेडीज कोच में यह तस्वीर ज्यादा साफ दिखाई देती है। यहां हर वर्ग, जाति, उम्र की लड़कियां-महिलाएं आती हैं। स्कूल-कॉलेज जा रही लड़कियों से लेकर रिटायरमेंट की उम्र को पहुंच रही महिलाओं तक। शॉपिंग करने, फैशनेबल कपड़े, बिंदास छवि से लेकर सीधी सादी घरेलू महिला तक।

मेट्रो के इस सफर के दौरान मेरी सीट के बगल में, कॉलेज जा रही दो लड़कियां खड़ी थीं। पहनावे, बोली से जाहिर था कि वे निम्न मध्य वर्ग का प्रतिनिधित्व करती हैं। एक ने कहा, मुझे कपड़ों पर किसी भी किस्म की पाबंदी बर्दाश्त नहीं है, अगर कोई मुझे मेरी पसंद का कुछ पहनने से रोकता है तो मुझे बहुत गुस्सा आता है, वे कौन होते हैं ये बताने वाले कि हमें क्या पहनना है। हमारी जिंदगी है, हम चुनेंगे क्या पहनें-क्या नहीं। इस लड़की ने लेगिंग और टॉप पहना हुआ था। इसकी दूसरी साथी ने जवाब दिया- मेरे घर में तो अब कोई रोक टोक नहीं होती। मैं तो जींस ही पहनती हूं। पहले बुआ लोगों को जींस पहनने से मना करते थे। पर अब मेरे परिवार के लोग बदल गए हैं। महिलाओं के पहनावे को लेकर अब भी खूब सवाल जवाब होते हैं। कभी कॉलेज में जींस पर पाबंदी लगायी जाती है तो कभी पंचायतें ऐसा करती हैं। यहां तक कि नेतागण भी बलात्कार और छेड़छाड़ जैसी घटनाओं पर बड़ी आसानी से पहनावे को जिम्मेदार ठहरा देते हैं। यही लोग इस सवाल का जवाब नहीं दे पाते कि तीन साल की बच्ची से बलात्कार क्यों होता है, क्या पहनावे के कारण।

मेट्रो में सवार होते ही ज्यादातर यात्री अपने चार-छह इंच के मोबाइल के मार्फत आभासी दुनिया में डुबकी लगा लेते हैं। एक लड़की बोलती है-यार फेसबुक पर जब भी मैं पॉलीटिक्स पर कुछ लिखती हूं, कोई कमेंट नहीं करता, दो चार लाइक ही आते हैं। लेकिन प्यार मोहब्बत पर एक दो लाइन लिख दो, फिर देखो, लाइक्स-कमेंट्स की बरसात हो जाती है। दूसरी बोलती है, हां यार हमारे देश में आशिकी खूब चलती है। अब आप खुद ही इस बात के मायने निकालिए। मेट्रो में सफर कर रहे लोगों की मानसिकता क्या बदल जाती है। यहां छेड़छाड़ या पहनावे को लेकर किसी तरह के फिकरे सुनने को नहीं मिलेंगे। हां सब अपने गंतव्य पर पहुंचने की जल्दी में होते हैं। लेकिन मेट्रो में सुरक्षा और तमाम वजहों से छेड़छाड़ जैसी घटनाएं बहुत कम होती हैं। यहां जींस-स्कर्ट, मिडी, मिनी, सब तरह की पोशाक में लड़कियां सफर करती हैं और बड़ी बिंदास होकर रहती हैं। मेट्रो चल पड़ती है और वह अपने बैग में से कोई किताब निकालती है, कोई अंग्रेजी बेस्ट सेलर है। पूरे सफर के दौरान यहां तक कि ट्रेन से निकलने और प्लेटफॉर्म पर चलने के दौरान भी किताब में उसकी निगाहें धंसी हुई है और वो बेधड़क चली जा रही है। कोई डर नहीं। कोई रोक टोक नहीं। यहां वो जैसे चाहे वैसे रह रही है। लेकिन मेट्रो और इसका सफर तो कुछ ही देर के लिए है। इसके प्लेटफॉर्म से बाहर की दुनिया कहीं ज्यादा बड़ी है, यहां से बाहर का सफर ज्यादा लंबा है।

अब इन दो लड़कियों को देखिए। अभी-अभी कॉलेज में दाखिला लिया होगा। एक आम से परिवार की सामान्य सी लड़कियां लग रही हैं। मोबाइल में चल रहे गाने को इयर फोन से सुनते हुए, उस पर थिरक रही हैं, मेट्रो में, वे अपनी धुन में मस्त हैं। कोई परवाह नहीं बगल खड़ा व्यक्ति क्या सोचेगा। क्योंकि दरअसल बगल में खड़े व्यक्ति को इससे ज्यादा फर्क पड़ना ही नहीं है। सबकी अपनी दुनिया है। वे मेट्रो में थिरक रही हैं। सुंदर दृश्य है यह। आजादी का नृत्य। हालांकि कुछ धुर विरोधाभासी दृश्य भी दिखाई देते हैं। जैसे मेरे सामने सीट पर बैठी यह महिला। दफ्तर जा रही होगी। बाल गीले और खुले हुए हैं। जींस-शर्ट पहने हुए। अंतर्राष्ट्रीय कंपनी गूची का बैग लिए हुए। हाथ में बड़ा सा मोबाइल, जाहिर है इसकी कीमत ज्यादा होगी। मेट्रो में सीट मिलते ही उसने अपनी आंखें बंद कर ली और होठ कुछ फुसफुसाने लगे। किसी मंत्र का पाठ, या हनुमान चालीसा, कुछ ऐसा ही। मैं यहां आधुनिकता और आस्था को दो विपरीत छोर पर खड़ा करने का प्रयत्न नहीं कर रही। बस यह तस्वीर जरा हटकर है। उसके ठीक बगल में बैठी एक लड़की ने बैग में से एक रजिस्टर निकाल लिया है। रजिस्टर में झांकर मैंने पता कर लिया कि यह गणित की छात्रा है। मेट्रो में सफर करती हुई ऐसी तमाम लड़कियां मिल जाएंगी जो अपने नोट्स पढ़ रही होंगी। कुछ चालीसा पढ़ती हुई भी दिख जाती हैं।

जैसे सुबह आसमान परिंदों की चहचहाहट से भर जाता है। वैसे ही सुबह के समय की मेट्रो अपने यात्रियों के उत्साह से भरी होती है। लड़कियां कॉलेज जा रही होती हैं, दफ्तर जा रही होती हैं। वे अपनी दोस्तों का स्वागत करती हैं। वे पाबंदियों से मुक्त नजर आती हैं। इयरफोन कान में ठूंसे, किसी की निगाहें उपन्यास में उलझी, कोई अपनी नोटबुक के पन्ने पलटती है, कोई फोन पर अपने दफ्तर के साथी को आगे के लिए दिशा निर्देश देती है। शाम को घर लौटने के सफर में उनके चेहरों पर कुछ थकान होती है। सुबह से अलग, शाम की मेट्रो में थोड़ा आलस उमड़ता है, थोड़ी थकान फैली होती है, उनकी चहचहाहट कुछ कम होती है, घर में उनके हिस्से का कार्य अभी बाकी होगा, ऐसा माना जा सकता है।

मेट्रो के इस सफ़र की खूबसूरती को समझने के लिए हमें दिल्ली की सड़कों पर उतरना होगा। क्या दिल्ली की सड़कें भी अपने यात्रियों को ऐसी सहूलियतों से बख्शती हैं। क्या यहां पर आप इसी तरह अपनी दुनिया में लीन सफर कर सकते हैं। नहीं। यहां आपके लिबास पर फब्तियां कसनेवाले मिल जाएंगे। बस स्टैंड पर आपके बगल में खड़े लोग आपको घूरते मिल जाएंगे। पैदल चलते हुए कोई जानबूझकर टक्कर मारता निकल जाएगा। सड़क किनारे खड़ी कार डराती है, दरवाजा खोलकर कोई अंदर खींच लेगा।

यह डर दिल्ली में महिलाओं के खिलाफ बढ़ते अपराध के आंकड़ों की वजह से है। 2013 की तुलना में 2014 में महिलाओं से अपराध के मामले 18.3 प्रतिशत तक बढ़ गए, जिसमें बलात्कार के मामले 31.6 प्रतिशत बढ़े। दिल्ली पुलिस रिकॉर्ड में 2014 में बलात्कार के कुल 2,069 मामले दर्ज किए गए जबकि 2013 में 1,571 मामले दर्ज किए गए थे। दिल्ली पुलिस के ही वर्ष 2014 के आंकड़े बताते हैं कि यहां हर रोज महिलाओं के खिलाफ हिंसा के करीब 40 केस दर्ज किए जाते हैं, इनमें बलात्कार और छेड़खानी की घटनाएं ज्यादा होती हैं।

बलात्कार सामाजिक समस्या है। इसका हल भी समाज में बदलाव के जरिये ही निकल सकता है। मेट्रो के अंदर प्रवेश करते ही ज्यादातर लोगों का बरताव बदल जाता है। मेट्रो के बाहर वही लोग भरोसे लायक नहीं रह जाते। मेट्रो के अंदर की लकदक, सुरक्षा, शालीनता, यहां से बाहर निकलते ही बिखर जाती है। मेट्रो अपने आखिरी पड़ाव पर पहुंच गई है। 

यह सफर यहीं पूरा हुआ। लोगों का रेला बाहर की ओर उमड़ता है। मेट्रो के अंदर बिंदास सफर कर रही लड़कियां वापस उन्हीं रास्तों पर पहुंच गई हैं, जो उनके लिए अबतक सुरक्षित नहीं बन पाए हैं। तमाम दुर्घटनाओं-आशंकाओं, विपरीत हालातों को परे ढकेलते हुए वो तेज चाल से आगे बढ़ रही हैं। यह सफर आजादी का है।


(streekaal.com पर पहले प्रकाशित)

31 January 2016

हॉस्टल लाइफ, ज़िंदगी जीने दो

(चित्र गूगल से साभार)

हॉस्टल। एक सख्त वॉर्डन। छोटे छोटे कमरे। कमरों में एक-दो तख्त सरीखे बिस्तर। एक छोटी सी आलमारी। किताबों का कोना। घर से लाए आचार का डिब्बा। नमकीन, मठरी, जिन्हें खाते ही मां की याद आ जाए। खट्टी मीठी यादें। गंदा कॉमन टायलेट। तमाम शिकायतें। और ढेर सारे दोस्त। ढेर सारी शरारतें। कैंटीन से चोरी। मेस के खाने की बुराई। देर रात की मस्तियां। चुपके से मैगी वाली पार्टी।  लड़कियों का हॉस्टल है तो रात आठ बजे के बाद नो एंट्री का डर। हॉस्टल के बाहर खड़े लड़के दोस्त लोग। इंतजार। बदनामियां। खिलखिलाहटें। रात हॉस्टल की खिड़की से उतरता चांद। एफएम रेनबो पर बजते पुराने गाने। सपने। ख्वाहिशें। कठिनाईयां। मुश्किलें। सफ़र। मंज़िलें।

हॉस्टल की ज़िंदगी की बात ही अलग है। मेरा अपना विचार है कि लड़कियों को कम से कम दो-तीन साल हॉस्टल में जरूर रहना चाहिए। यहां ज़िंदगी के वे सबक सीखने को मिलते हैं, जो घर की महफूज चारदीवारियों में नहीं मिलते। एक इंसान को अपनी अच्छाइयों, कमियों को देखने-समझने की जो सीख हॉस्टल में मिलती है, और कहीं नहीं मिल सकती। जीने के लिए जरूरी खुला आकाश यहीं मिलता है। बेरोकटोक ज़िंदगी। जहां आपको अपने नियम खुद बनाने होते हैं। आकाश में उड़ती चिड़िया को पता होता है कि उसे कितनी ऊंचाई तक जाना चाहिए, कहां परों को थाम लेना चाहिए। लड़कियां जानती हैं अंधेरे और उजाले का रहस्य।

हॉस्टल में हम उन छोटी छोटी चीजों की कद्र करना सीख जाते हैं, जिनकी परवाह कभी नहीं की होती। मां की डांट भी यहां से प्यारी लगती है। बगावतों का जोश भी संयम बरतना सीख जाता है। घर में रोज रोज यही सब्जी वाली शिकायत का स्वाद, हॉस्टल के मेस की थाली में परोसे भोजन से समझ आ जाता है। पैसों को उड़ाने की कीमत यहां पता चल जाती है।

लड़कियों को क्यों हॉस्टल में जरूर रहना चाहिए। दरअसल मुझे लगता है कि यहां वे अपना वजूद तलाश-तराश सकती हैं। जैसे जंगली पेड़, झाड़ियां, नदियां अपने रास्ते खुद बनाते हैं। लड़कियों को अपने सपने चुनने, रास्ते बनाने, आत्म निर्भर बनने का सलीका यहां खुद ब खुद सीखने को मिल जाता है। सही गलत की पहचान, फैसले करने की क्षमता, अपने फैसलों का नतीजा भुगतने की हिम्मत, हॉस्टल में रह कर जिंदगी के कारोबार के जरूरी दावपेंच समझ आने लगते हैं। चिड़िया के पंख मजबूत होने लगते हैं। उसे उड़ने का सलीका आने लगता है। और यही तो असल सीख है।

दिक्कत भी है। ये कि हमारे यहां लड़कियों के हॉस्टल को जेल सरीखा बना दिया जाता है। ब्वाएज हॉस्टल में फिर भी आजादी है। गर्ल्स हॉस्टल पाबंदियों से इतने बिंधे हुए होते हैं कि जेल सरीखे हो जाते हैं। आने जाने के सख्त नियम, कोई मिलने आए तो उसे शक की निगाह से देखना। गेट बंद होने के समय के बाद लड़की पहुंची तो उसके कैरेक्टर पर अपना सर्टिफिकेट नवाज देना। दिल्ली यूनिवर्सिटी की छात्राओं ने गर्ल्स हॉस्टल को जेल बनाने की इसी बेफजूल सख्ती के खिलाफ पिंजड़ा तोड़ अभियान चलाया था। जिसे लड़के लड़कियों दोनों का भरपूर समर्थन मिला। आंदोलन हॉस्टल को पिंजड़ा बनाने के खिलाफ था।

हॉस्टल की धमाचौकड़ी, वहां गुजारे गए कुछ साल, जीवन भर की धरोहर बन जाते हैं। जिसे बाद में बार-बार मिस किया जाता है। वे भी क्या दिन थे। कई लड़कियों ने अपनी हॉस्टल लाइफ के अनुभव शेयर किए।

असिस्टेंट प्रोफेसर साक्षी हॉस्टल में गुजारे अपने तीन सालों को अपनी जिंदगी का सबसे बेहतरीन वक्त बताती हैं। मम्मी-पापा की याद तो आती थी, लेकिन फिर फ्रैंड्स ही एक दूसरे को इमोशनल सपोर्ट देते थे। हम बडी शरारतें करते थे। रात में वॉडर्न से छिप छिप कर मैगी की पार्टी करते थे। किसी के कमरे का दरवाजा बाहर से लॉक कर दिया और फिर हंसी के दौर शुरू हो जाते थे। हमने अपनी हॉस्टल लाइफ को खूब एन्ज्वाय किया और बहुत कुछ सीखा। रात में आठ बजे हॉस्टल पहुंच जाना सबसे बड़ी चुनौती होती थी, चाहें आप किसी वाजिब वजह से बाहर ही क्यों न हों लेकिन आठ बजे नहीं पहुंचे तो घर फोन पहुंच जाता था, ये बड़ी सिरदर्दी थी।


झारखंड की अन्वेषा ग़ाज़ियाबाद के हॉस्टल में रहकर पढ़ाई कर रही हैं। वे कहती हैं कि पहली बार मम्मी को छोड़कर आने में बहुत डर लगा, मैं बहुत रोई। लेकिन फिर धीरे धीरे इस लाइफ को जीने लगी। मजा आने लगा। दोस्तों के साथ हम बहुत सारी चीजें सीखते हैं। हम फैसला करना सीखते हैं। अन्वेषा बताती हैं कि उनके हॉस्टल की बहुत सारी लड़कियां सिगरेट पीती हैं, बियर पीती हैं। लेकिन फर्क नहीं पड़ता। यह उनकी ज़िंदगी है, वे जैसे चाहें जिएं। ये हमें तय करना होता है कि हम क्या करना चाहते हैं। मैं तो यहां खूब घूमती हूं। शायद ही ऐसा कोई दिन हो जब मैं हॉस्टल के बाहर नहीं निकलती। हॉस्टल से जाने के बाद मैं इस ज़िंदगी को मिस करूंगी।

हॉस्टल में रह चुकीं तमाम लड़कियों से मेरी जो बातें हुईं, उससे मैं तो यही चाहती हूं कि हर लड़की को कम से कम दो साल हॉस्टल में जरूर रहना चाहिए। जहां उन्हें ज़िंदगी का स्वाद मिल सके, भले ही घर के खाने का स्वाद कुछ दिनों के लिए क्यों न छूट जाए। ज्यादातर की शिकायत हॉस्टल के खाने से ही थी। दोस्तों के साथ घूमना फिरना, मस्ती करना और पढ़ाई भी, इन चीजों को वे आज मिस करती हैं। हॉस्टल के नाम से ही उनके चेहरे पर एक मुस्कान तैर जाती है। हॉस्टल लाइफ। वे भी क्या दिन थे।




13 November 2015

खिड़कियां

खिड़की
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दरवाजों की मौजूदगी में भी खिड़कियों की अहमियत कम नहीं होती। खिड़कियां एक रहस्य की माफिक लगती हैं। अंधेरे में उजाले का रहस्य। बंद कमरे की घुटन में खुली हवा का रहस्य। घेरेबंदी के बीच आज़ादी का रहस्य। दीवारों के बीच उम्मीदों का रहस्य। सीक्रेट दरवाजा होती हैं खिड़कियां। और दरवाजे तो आपका फैसला हैं। आप अंदर रहें या बाहर। बंद दरवाजों के बीच भी खुली खिड़की में आसमान का नीला रहस्य छिपा है। जैसे आपकी सोच को उड़ने की आजादी मिलती हो। विचारों को कभी थोड़ी धूप मिल जाती है, कभी ताजी हवा। हां आंधी-तूफान में खिड़की भी फैसला बन जाती है। रात में खिड़की से झांकता चंद्रमा हमारे सपनों का रहस्य लिए होता है। जैसे वो भी आसमान की खिड़की से झांककर धरती को देखता हो। जो पाया सो पाया। जो रह गया बाकी, जो नहीं हुआ हासिल, उस दुनिया में खुलती है उम्मीद भरी खिड़कियां। सपनों का पीछा करती हुई। ख्वाहिशों का सीक्रेट जानती हैं खिड़कियां। हर कमरे में जरूर होनी चाहिए  कम से कम एक खिड़की।

22 June 2015

कमाल की कंगना




वाह कंगना। फिल्म तनु वेड्स मनु पार्ट टु कई मामलों में कमाल है। हर किरदार ने अपना काम बखूबी किया है। बाकी अभिनेत्रियों से अलग हटकर कंगना रनोट ने इस फिल्म से एक नया मील का पत्थर जड़ दिया है। ये फिल्म पूरी तरह कंगना की है। बॉलीवुड हिरोइन्स की अदाएं, नाज़-नखरे तकरीबन तयशुदा बॉ़डी लैंग्वेज, फेशियल एक्सप्रेशन्स, आई एक्सप्रेशन्स होते हैं। इसलिए अभिनेत्रियों का फिल्मी सफ़र काफी छोटा भी होता है। कंगना इससे कहीं आगे जाती हैं। उनकी मुस्कान बॉलीवुडिया मुस्कान से अलग खिंचती है। अपने किरदार में समाते हुए वो वैसे ही हंसती है जैसे मोहल्ले की कोई छोकरी हंसती होगी। नाचने के दृश्यों में वो सबसे ज्यादा खुलकर सामने आती हैं। आम शादी-बारातों में जिस तरह अल्हड़ लड़के नाचते हैं, कंगना भी उसी जोश को दर्शाती है, इस कड़ी में मुझे वो लड़के और लड़कियों को बराबरी पर लाती भी नज़र आती हैं। मुझे महसूस होता है कि आमतौर पर शादी-बारात में लड़कियां नाचती तो हैं लेकिन वहां भी वो तयशुदा लटके-झटकों में ही नाचती हैं। खुलकर नहीं। तनु के किरदार में नाचती हुई कंगना उस दायरे को तोड़ती है और एक आम बाराती की तरह खूब जम के नाचती है। फिल्म का वो दृश्य भी खूब है जब सड़क पर जा रही बारात को देख वो बाइक से उतरती है, पूरे जोश में नाचती है और फिर आगे बढ़ जाती है। उस वक़्त उनके चेहरे पर एक्सप्रेशन तेज़ी से बदलते हैं। तेज़ी से बढ़ते कदम के साथ बारात की मस्ती की जगह चेहरे पर बेवफ़ाई का दर्द ढलता चला जाता है, कुछ क्षणों में आंखों की मस्ती की जगह चिंगारी भरती चली जाती है, गले से उतरकर चुन्नी कदमों में गिर जाती है। कंगना की तुलना कुछ-कुछ मशहूर पॉप स्टार शकीरा से करने का जी भी चाहता है। वही बेलौस अंदाज़, बिंदासपन।

हालांकि बॉलीवुड मेल डॉमिनेटेड है जहां अभिनेताओं की तुलना में अभिनेत्रियों को पैसे भी कम मिलते हैं और उनके किरदारों में वेराइटी भी कम होती है। बावजूद इसके कई अभिनेत्रियों ने अपनी अलग पहचान बनायी है। मधुबाला, मीना कुमारी से लेकर माधुरी दीक्षित, तब्बू, विद्याबालन तक ने अदाकारी के नए जौहर दिखाए हैं। ये अभिनेत्रियां अपने दम पर फिल्म को ले जाती हैं। बॉलीवुड में लव स्टोरीज़ से हटकर प्रयोगात्मक फिल्में भी बन रही हैं लेकिन माधुरी दीक्षित, तब्बू, विद्या बालन जैसी अदाकाराओं को अब भी लीक से हटकर स्क्रिप्ट पर काम करने के मौके बहुत नहीं मिलते।

कंगना ने क्वीन फिल्म में भी अपनी जबरदस्त एक्टिंग से आलोचकों की तारीफें बटोरी। तनु वेड्स मनु 2 ने तो उन्हें बेमिसाल बना दिया। अपने वक़्त की तमाम बॉलीवुड एक्ट्रेसेस से कहीं आगे पहुंचा दिया।
फिल्म के डबल रोल में कंगना अपने किरदार में इतना रमी हुई थीं कि दोनों बिलकुल जुदा कंगना लग रही थीं। ऐसा लगता ही नहीं कि दोनों लड़कियां एक ही हैं। हरियाणवी बोली तो क्या खूब पकड़ी। हरियाणवी एक्सेंट में उनके डायलॉग खूब जंचे। जब वो अपना परिचय देती है कि मैं स्टेट लेवल की चैंपियन हूं, शर्मा जी की अंगूठी वापस करती है या फिर फिल्म के अंत में शादी के आखिरी फेरे पर ठहरकर एक बार फिर शर्मा जी से पूछती है कि वो ये शादी सचमुच करना चाहते हैं या नहीं। तनु के किरदार में जहां उनकी आंखें चहकती-भागती फिरती हैं वहीं दत्तो के किरदार में वो ठहरी हुई, गहरी सी लगती हैं। हरियाणवी लड़की का किरदार छोटे शहरों की लड़कियों का उत्साह बढ़ानेवाला भी है।

फिल्म की कहानी तो मामूली ही थी लेकिन बुनावट इतनी बारीक और सुंदर कि शुरू से आखिर तक रवानगी बनी रही। फिल्म का वो सीन भी जबरदस्त था जब बेवफाई की चोट खाकर टिमटिमाती रात में वो झज्जर की  सड़कों पर आवारगी करती हैं, भटकती फिरती हैं।।  बैक ग्राउंड में गाना बज रहा है...जा-जा-जा रे बेवफा। बूढ़े हकीम को वो हाथ की लकीरें दिखाती हैं और ताबीज़ दिये जाने से पहले ही उठकर चल देती हैं।

बॉलीवुड में बाहर से आकर अपनी जगह बनाना आसान नहीं। करियर की शुरुआत से लीक से हटकर फिल्मों का चयन और हर फिल्म में पिछली फिल्म से बेहतर अदाकारी के साथ कंगना ने अपने लिए अलग राह बनायी है।  जो उन्हें उनके वक़्त की तमाम अभिनेत्रियों से अलग खड़ा करती है। फिल्म के तमाम किरदारों के साथ-साथ निर्देशक आनंद एल राय भी बधाई के पात्र हैं।

(चित्र गूगल से साभार)

14 April 2015

डर है कि मानता नहीं





ये कुछ ऐसा है कि हम चांद पर पहुंच जाएं तो वहां भी नींबू-मिर्ची लटका आएं। अंतरिक्ष में उड़ान भरते हमारे मंगलयान-6 पर भी एक नींबू-मिर्ची लटक रहा हो। ऑडी जैसी गाड़ियों पर तो नीबू-मिर्ची लटकाते ही हैं। घर-दफ्तर-दुकान पर तो नींबू-मिर्ची यूं ही लटकते मिलते हैं। टैक्नॉलजी से कितने लैस हों, बड़ा वाला स्मार्टिया फोन लेकर घूमते हों लेकिन नींबू-मिर्ची वाले डर-वहम-मानसिकता से पीछा नहीं छुड़ा पाए। इस मॉल में हम पहुंचे तो बुजुर्ग सी औरत पीली बंधेजवाली साड़ी में लिपटी बड़ी अच्छी लगी। लगा कि सीधे राजस्थान से यहां लैंड किया हो। फिर देखा तो उसके हाथ में नींबू-मिर्ची से भरा एक थैला था। हर शोरूम के दरवाजे पर नींबू-मिर्ची लटका रही थी और सबका हालचाल ले रही थी। बाटा हो या एडिडास, मॉल के प्रांगण में रंगबिरंगी रबरबैंड, क्लचर, चिमटियां,हैंडबैग बेचता छोटा सा दुकानवाला हो या रिबॉक जैसी बड़ी कंपनियां, बिना नींबू-मिर्ची के किसी की दुकान नहीं चल रही थी। उसकी ख़ुशमिज़ाजी देख मुझे उससे बात करने में कोई झिझक महसूस नहीं हुई। मैंने उससे छोटी सी बातचीत की। अम्मा कहां से आई हो, कितने में नींबू-मिर्ची बेचती हो। तो उन्होंने बताया कि चाहे बड़ा झक-झक करता शोरूम हो या, अदना सा कुल्फी वाला। बीस रुपये महीना हर कोई देता है। इस पूरे मॉल से उसे महीने का हज़ार रूपया तक मिल जाता है। मैंने फौरन नींबू का भाव जोड़ने की कोशिश की। बस हजार रुपये महीना। अम्मा बड़ी हाजिरजवाब थी। फट मुझे पहचान भी लिया। देखी है मैंने तुम्हे कहीं। वैशाली सेक्टर तीन में देखी होगी। हां-हां जरूर देखी होगी। फिर वो नींबू-मिर्ची की अपनी थैली लेकर उपरवाले माले की ओर बढ़ गई।

17 March 2015

हिंदी लेखक, लेखक बाद में है

हिंदी के लेखक सिर्फ लेखक होकर क्यों नहीं जी सकते जबकि अंग्रेजी के लेखक सिर्फ अपनी कलम से ही आजीविका चला सकते हैं। क्या तर्क ये कि हिंदी का बाज़ार ग़रीब है । हिंदी पट्टी के लोग आर्थिक तौर पर संपन्न नहीं। हिंदी का लेखक, लेखक बाद में होता है, पहले वो अध्यापक होता है  या कहीं क्लर्क होता है या  फिर कोई और नौकरी। सिर्फ लेखन उसका पेशा हो ये संभव नहीं बन पाता। जबकि अंग्रेजी में सिर्फ लेखन से ही लेखक आराम से जी सकता है, परिवार पोस सकता है, शहर दर शहर भ्रमण कर सकता है।


अपने ही देश में हिंदी कैसे मात खा रही है इसका नमूना अखबारों, टीवी चैनलों या दूरदर्शन में निकलनेवाली नौकरियों से लगाया जा सकता है। अपने अंग्रेजी चैनल के लिए जिस पैकेज पर लोगों को नौकरी पर रखता है, हिंदी चैनल में पैसा आधे से भी कम हो जाता है। देश में सबसे ज्यादा अखबार हिंदी भाषा में निकलते हैं तब ये कि हिंदी के लेखकों को, अंग्रेजी के लेखकों की तुलना में एक लेख पर अपेक्षाकृत कम पैसे मिलते हैं।


हिंदुस्तान टाइम्स(17 मार्च 2015) में एक रोचक लेख छपा। भारतीय मूल के कुछ अंग्रेजी अरबपति लेखक( बैंड ऑफ बिलियनर्स)।  अंग्रेजी के (विवादित) लेखक सलमान रश्दी की संपत्ति 15 मिलियन डॉलर।  वीएस नायपॉल 7 मिलियन डॉलर। विक्रम सेठ 5 मिलियन डॉलर। किरन देसाई 3 मिलियन डॉलर। अंग्रेजी के पॉप्युलर लेखक चेतन भगत की संपत्ति 1.3 मिलियन डॉलर।  


मुझे यहां ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित मराठी लेखक भालचंद्र नेमाडे की बातें भी याद आ रही हैं। नेमाडे ने कहा कि सलमान रश्दी और वीएस नायपॉल की कृतियों में साहित्यिक मर्म और मूल्यों का अभाव है।
(इस विवादित कार्टून को अंग्रेजी-हिंदी संदर्भ में भी रख सकते हैं,
चित्र गूगल से साभार)
नेमाडे ने सलमान रश्दी की कृतियों पर कहा था कि इन सब में उन्होंने पूरब और एशिया के लोगों की निंदा की और नाकारत्मक पक्ष पेश किया, पश्चिम को ख़ुश करने का प्रयास किया।  नायपॉल को लेकर नेमाडे ने कहा कि भारत को समझने के लिए उन्हें तीन बार फेलोशिप पर भारत आना पड़ा। अगर किसी लेखक को किसी विषय पर समझ बनाने के लिए इतनी बार फेलोशिप लेनी पड़े तो वो लेखक कैसा।
सलमान रश्दी और वीएस नायपॉल सबसे अमीर (अंग्रेजी) लेखकों में से हैं।


हिंदी के उन अग्रणी लेखकों की याद आ रही है जिनकी रचनाएं स्कूली किताबों में पढ़कर हम बड़े हुए। अपने जीवन के अंत समय में जिन्होंने बेहद मुश्किल से गुजारे। इलाज के लिए पैसे तक न मिल पाए। निराला का जीवन घोर गरीबी, त्रासदी, संघर्ष से घिरा रहा। आर्थिक तंगी से जूझते रहे अमरकांत का इंटरव्यू पढ़ा था कि लेखक न तो शहीद होता है न मोहताज।


आज के इस समय में कई लेखक-पत्रकारों की हालत देख रही हूं। समय से पहले नौकरियों से बाहर कर दिये गये लोग जो काबिल हैं और तिल-तिल कर मर रहे हैं। कई साल पत्रकारिता में गर्क करने के बाद दूसरे कामधंधे के बारे में सोच रहे हैं। क्योंकि कम पैसे पर काम करने के लिए नौजवान तैयार हैं।  एक वरिष्ठ की जगह  मालिक दो कनिष्ठों को रखने की रणनीति पर काम कर रहा है। तो दस पंद्रह साल की नौकरी के बाद  कईयों को बाहर का रास्ता दिखा दिया जा रहा है। 35 की उम्र में रिटायर कर दिया जा रहा है। हिंदी लेखकों के साथ तो स्थिति इतनी बुरी है कि काम कराये जाने के बाद उनका पैसा कब आएगा, आएगा या नहीं इसकी कोई गारंटी नहीं।  अंग्रेजी लेखक रॉयल्टी का सुख उठाते होंगे हिंदी लेखक इसकी उम्मीद बेहद कम ही करते हैं।


हां कमाई करनेवाले हिंदी लेखक भी हैं। साल के बारह महीने जिनके कार्यक्रम  तय होते हैं। देश के सबसे अमीर कवि भी हैं जिन्हें कवि सम्मेलन में जाने के लिए लाखों के चेक मिलते हैं। मगर ऐसे लेखक और कवि चुनिंदा हैं और इतर वजहों से भी जाने जाते हैं।


और आखिर में ये देश हिंदी सिने प्रेमियों का है। जहां हिंदी सिनेमा की धूम रहती है। हिंदी फिल्में रिलीज होने के कुछ ही दिनों में सौ करोड़ की कमाई कर लेती हैं।  हिंदी अभिनेता-अभिनेत्रियों को एक फिल्म में अभिनय करने के करोड़ों रुपये मिलते हैं। लेकिन इन फिल्मों-प्रोडक्शन हाउस-सीरीयलों में काम करने के लिए अंग्रेजी आनी आवश्यक है। हिंदी फिल्मों की स्क्रिप्ट हिंदी नहीं अंग्रेजी में लिखी जाती है। हिंदी कहानी को सबमिट करने के लिए अंग्रेजी में अनुवाद करना पड़ता है। पुरस्कार के लिए जमा की जानी वाली रचनाएं यदि अंग्रेजी से इतर भाषा की हैं तो उनका अंग्रेजी में अनुवाद कराना पड़ता है। अब बताइये कि हिंदी फीचर का अगर कोई अंग्रेजी में अनुवाद करेगा तो शब्दों और भाषा का रस कहां रह जाएगा। और जाहिर है कि हिंदी में लिखनेवाला लेखक स्वयं तो अंग्रेजी अनुवाद कर नहीं पाएगा। हिंदी पट्टी में ही हिंदी अछूत है, उपेक्षित है और हिंदी भाषी  बेबस-मजबूर।

09 March 2015

India's Daughter, शुक्रिया leslee udwin












शुरू-शुरू में तो मुझे भी बेहद अजीब लगा कि एक रेपिस्ट बताएगा लड़कियों को कैसा रहना चाहिए, किस समय घर से  बाहर निकलनेावली लड़कियां गंदी लड़कियां हैं, रेपिस्ट समझाएगा कि महज 20 फीसद लड़कियां ही अच्छी लड़कियां हैं।   
लेकिन शुक्रिया लेजली उडविन का। India’s Daughter के नाम से उन्होंने एक बेहतरीन डॉक्युमेंट्री बनायी। वो जो हम न बना सके। डॉक्युमेंट्री देखने के बाद मेरा विचार बदला।
इस पर प्रतिबंध लगाया जाना मुझे ठीक नहीं लगता। तब भी जब मुझे ये लग रहा था कि एक रेपिस्ट के विचारों को लोग जानें। दरअसल मेरा डर ये था कि लोग, अधिकांशत: युवा, नकारात्मक बातों को जल्दी स्वीकार करते हैं। अपराध की दुनिया, अपराधी की सोच जाने-अनजाने हमारे अवचेतन पर नकारात्मक प्रभाव छोड़ते हैं। जैसे भद्दे गाने, एक्शन फिल्में जल्दी पॉप्युलर होती हैं, अच्छी चीजों को जगह बनाने में वक़्त लगता है।

डॉक्युमेंट्री देखते हुए एक बार भी  बीच में रुकने की इच्छा नहीं हुई। निर्भया के मां-बाप की बातें, अपराधी मुकेश की बातें एक दूसरे को काउंटर कर रही थीं। जब मुकेश कहता है कि लड़कियों को रात में अकेले  बाहर नहीं निकलना चाहिए तब निर्भया की मां बताती है कि उसकी बेटी रात 8 बजे से सुबह 4 बजे तक इंटरनेशनल कॉल सेंटर में काम करती थी, ताकि अपनी पढ़ाई का खर्च उठा सके और फिर सुबह कॉलेज जाती थी। मुकेश कहता है कि लड़कियों का काम है घर की साफ-सफाई, खाना बनाना...। निर्भया की मां बताती है कि उसकी बेटी ने पढ़ने के लिए कितनी मेहनत की, पिता से कहा कि जो पैसे उन्होंने उसके दहेज के लिए रखे हैं उसे पढ़ाई पर खर्च कर दीजिए। आंखों में गर्व और आंसू लिए मां  बताती है कि कैसे एक छोटे से शहर में रहनेवाली लड़की ने अपनी अंग्रेजी इतनी अच्छी कर ली कि उसे अमेरिकन इंटरनेशनल कॉल सेंटर में नौकरी मिल गई।

पूरी डॉक्युमेंट्री में अपराधियों के चेहरे पर अपने किये पर पछतावे के कोई लक्षण नहीं दिखे। मुकेश बताता है कि आगे कोई रेप करेगा तो लड़की को जिंदा नहीं छोड़ेगा ताकि वो उसे पहचान न सके। कानून का ये खौफ़ हैे अपराधियों पर। तो यहां शर्म हमारी कानून व्यवस्था को लागू करनेवालों को आनी चाहिए। मुकेश तकरीबन वही बातें कर रहा था जो सचमुच हमारे ईर्दगिर्द रहनेवाले ज्यादातर लोग करते हैं। उसकी बातें शरीफ लोगों को बातों जैसी ही थीं।  हम एक रेपिस्ट की कुंठित मानसिकता ही नहीं समझ रहे थे, उसे  सुनते हुए अपने चारों तरफ के तमाम लोग  ख्याल आ रहे थे जो यही बातें बोलते हैं। यही बात गीतकार-सांसद जावेद अख्तर ने कही-”डॉक्युमेंट्री को सामने आने दीजिए, एक रेपिस्ट वही तो बोल रहा है जो आम शरीफ लोग बोलते हैं, जो बातें वो संसद के गलियारे में अक्सर ही सुनते हैं।”
लेकिन सबसे ज्यादा घिन तो अपराधियों का केस लड़नेवाले दोनों वकीलों की बातों को सुनकर आ रही थी।  जो एक लड़की को कभी नाजुक फूल बना रहे थे, तो कभी उस पर पेट्रोल डालकर जलाने की बात कह रहे थे। उनकी सोच तो अपराधियों से भी ज्यादा  खौफनाक और लीचड़ थी। उनके मुंह से लिजलिजी बातें निकल रही थीं, जो एक रेपिस्ट की बातों से भी ज्यादा खतरनाक थीं। छी...।

लेजली की डॉक्युमेंट्री देखते हुए एक और बात समझ आ रही थी। लेजली उन झुग्गियों में गईं जहां मुकेश और उसके साथी रहते थे। उनके परिवारों के हालात, उन झुग्गियों के हालात देख यही लग रहा था कि ये जगहें तो अपराधी बनाती हैं। जहां जीने के लिए इतने बदतर हालात हों,वहां गुदड़ी का लाल तो कोई एक आध बनेगा ज्यादातर तो  नकारात्मक ऊर्जा से ही प्रभावित होंगे। रात को जगमगाती ऊंची-ऊंची इमारतों के साये में बसी, हर तरह के अंधेरे में डूबी झुग्गियां कैसे इंसान बनाएंगी। जहां एक मां कहती है कि मुझे तो पता ही नहीं था कि मेरा बेेटा जिंदा भी है, वो तो पुलिस जब उसे ढूंढ़ते हुए आई तो पता लगा कि मेरा बेटा जिंदा है,मैं तो उसे मरा हुआ मान चुकी थी।

डॉक्युमेंट्री में निर्भया आंदोलन के दृश्य दोबारा देख एक बार फिर रगों में जमा ख़ून खौलने लगा कि क्या हम सचमुच भूल चुके थे उस आंदोलन को। हमारी मांग सिर्फ निर्भया फंड तो नहीं थी। लगा कि दोषियों को फांसी देने में इतना वक़्त निकल जाता है कि फांसी की सज़ा का जो असर जनमानस पर होना चाहिए था वो अब नहीं होगा। फिर ऐसी फांसी का मतलब भी नहीं रह जाता है। और हां मैं भी ऐसे अपराधियों पर फांसी के पक्ष में हूं जो ऐसे जघन्य अपराध करते हैं। लेकिन दीमापुर की घटना के पक्ष में बिलकुल नहीं जहां रेपिस्ट को जेल से निकालकर भीड़ जानवर बन गई।
आखिर में शुक्रिया Leslee Udwin, you have done a great job. और ज्योति अपने नाम की तरह ही तुमने दुनिया को नई ज्योति दी।