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29 May 2016

मेट्रो में आज़ादी का सफ़र



महिलाओं के खिलाफ हिंसा से जुड़ी तमाम खबरों, आंकड़ों, हकीकत के बीच औरतों की आजादी से जुड़ी यह एक सुंदर तस्वीर है। दिल्ली की मेट्रो में सफर करती महिलाओं की तस्वीर। मेट्रो स्टेशन पर तेज कदम के साथ वे दाखिल होती हैं। उनकी चाल में उनका आत्मविश्वास झलकता है। उनकी आंखों में सफलता की चमक है। उन तमाम लड़कियों के चेहरे पढ़िए, कुछ एक को छोड़ दें तो ज्यादातर मजबूत-आत्मनिर्भर लगती हैं। अपने बैग कंधे पर डाले वे आगे बढ़ती हैं। पहले बाजारों में लड़कियां-महिलाएं डरी-सहमी या चौकस सी ज्यादा दिखाई देती थीं। जैसे कभी भी कोई हादसा उनकी तरफ लपकता हुआ आ सकता है। उस सूरत में वह कुछ नहीं कर पाएंगी। उनकी मदद कोई नहीं करने आएगा। 

आजादी और बराबरी का संघर्ष पीढ़ियों से जारी है। एक बार फिर यह उल्लेख करते हुए कि महिला हिंसा और बलात्कार के बढ़ते मामलों के बावजूद, लड़कियों की स्थिति बेहतर हुई है। मेट्रो के लेडीज कोच में यह तस्वीर ज्यादा साफ दिखाई देती है। यहां हर वर्ग, जाति, उम्र की लड़कियां-महिलाएं आती हैं। स्कूल-कॉलेज जा रही लड़कियों से लेकर रिटायरमेंट की उम्र को पहुंच रही महिलाओं तक। शॉपिंग करने, फैशनेबल कपड़े, बिंदास छवि से लेकर सीधी सादी घरेलू महिला तक।

मेट्रो के इस सफर के दौरान मेरी सीट के बगल में, कॉलेज जा रही दो लड़कियां खड़ी थीं। पहनावे, बोली से जाहिर था कि वे निम्न मध्य वर्ग का प्रतिनिधित्व करती हैं। एक ने कहा, मुझे कपड़ों पर किसी भी किस्म की पाबंदी बर्दाश्त नहीं है, अगर कोई मुझे मेरी पसंद का कुछ पहनने से रोकता है तो मुझे बहुत गुस्सा आता है, वे कौन होते हैं ये बताने वाले कि हमें क्या पहनना है। हमारी जिंदगी है, हम चुनेंगे क्या पहनें-क्या नहीं। इस लड़की ने लेगिंग और टॉप पहना हुआ था। इसकी दूसरी साथी ने जवाब दिया- मेरे घर में तो अब कोई रोक टोक नहीं होती। मैं तो जींस ही पहनती हूं। पहले बुआ लोगों को जींस पहनने से मना करते थे। पर अब मेरे परिवार के लोग बदल गए हैं। महिलाओं के पहनावे को लेकर अब भी खूब सवाल जवाब होते हैं। कभी कॉलेज में जींस पर पाबंदी लगायी जाती है तो कभी पंचायतें ऐसा करती हैं। यहां तक कि नेतागण भी बलात्कार और छेड़छाड़ जैसी घटनाओं पर बड़ी आसानी से पहनावे को जिम्मेदार ठहरा देते हैं। यही लोग इस सवाल का जवाब नहीं दे पाते कि तीन साल की बच्ची से बलात्कार क्यों होता है, क्या पहनावे के कारण।

मेट्रो में सवार होते ही ज्यादातर यात्री अपने चार-छह इंच के मोबाइल के मार्फत आभासी दुनिया में डुबकी लगा लेते हैं। एक लड़की बोलती है-यार फेसबुक पर जब भी मैं पॉलीटिक्स पर कुछ लिखती हूं, कोई कमेंट नहीं करता, दो चार लाइक ही आते हैं। लेकिन प्यार मोहब्बत पर एक दो लाइन लिख दो, फिर देखो, लाइक्स-कमेंट्स की बरसात हो जाती है। दूसरी बोलती है, हां यार हमारे देश में आशिकी खूब चलती है। अब आप खुद ही इस बात के मायने निकालिए। मेट्रो में सफर कर रहे लोगों की मानसिकता क्या बदल जाती है। यहां छेड़छाड़ या पहनावे को लेकर किसी तरह के फिकरे सुनने को नहीं मिलेंगे। हां सब अपने गंतव्य पर पहुंचने की जल्दी में होते हैं। लेकिन मेट्रो में सुरक्षा और तमाम वजहों से छेड़छाड़ जैसी घटनाएं बहुत कम होती हैं। यहां जींस-स्कर्ट, मिडी, मिनी, सब तरह की पोशाक में लड़कियां सफर करती हैं और बड़ी बिंदास होकर रहती हैं। मेट्रो चल पड़ती है और वह अपने बैग में से कोई किताब निकालती है, कोई अंग्रेजी बेस्ट सेलर है। पूरे सफर के दौरान यहां तक कि ट्रेन से निकलने और प्लेटफॉर्म पर चलने के दौरान भी किताब में उसकी निगाहें धंसी हुई है और वो बेधड़क चली जा रही है। कोई डर नहीं। कोई रोक टोक नहीं। यहां वो जैसे चाहे वैसे रह रही है। लेकिन मेट्रो और इसका सफर तो कुछ ही देर के लिए है। इसके प्लेटफॉर्म से बाहर की दुनिया कहीं ज्यादा बड़ी है, यहां से बाहर का सफर ज्यादा लंबा है।

अब इन दो लड़कियों को देखिए। अभी-अभी कॉलेज में दाखिला लिया होगा। एक आम से परिवार की सामान्य सी लड़कियां लग रही हैं। मोबाइल में चल रहे गाने को इयर फोन से सुनते हुए, उस पर थिरक रही हैं, मेट्रो में, वे अपनी धुन में मस्त हैं। कोई परवाह नहीं बगल खड़ा व्यक्ति क्या सोचेगा। क्योंकि दरअसल बगल में खड़े व्यक्ति को इससे ज्यादा फर्क पड़ना ही नहीं है। सबकी अपनी दुनिया है। वे मेट्रो में थिरक रही हैं। सुंदर दृश्य है यह। आजादी का नृत्य। हालांकि कुछ धुर विरोधाभासी दृश्य भी दिखाई देते हैं। जैसे मेरे सामने सीट पर बैठी यह महिला। दफ्तर जा रही होगी। बाल गीले और खुले हुए हैं। जींस-शर्ट पहने हुए। अंतर्राष्ट्रीय कंपनी गूची का बैग लिए हुए। हाथ में बड़ा सा मोबाइल, जाहिर है इसकी कीमत ज्यादा होगी। मेट्रो में सीट मिलते ही उसने अपनी आंखें बंद कर ली और होठ कुछ फुसफुसाने लगे। किसी मंत्र का पाठ, या हनुमान चालीसा, कुछ ऐसा ही। मैं यहां आधुनिकता और आस्था को दो विपरीत छोर पर खड़ा करने का प्रयत्न नहीं कर रही। बस यह तस्वीर जरा हटकर है। उसके ठीक बगल में बैठी एक लड़की ने बैग में से एक रजिस्टर निकाल लिया है। रजिस्टर में झांकर मैंने पता कर लिया कि यह गणित की छात्रा है। मेट्रो में सफर करती हुई ऐसी तमाम लड़कियां मिल जाएंगी जो अपने नोट्स पढ़ रही होंगी। कुछ चालीसा पढ़ती हुई भी दिख जाती हैं।

जैसे सुबह आसमान परिंदों की चहचहाहट से भर जाता है। वैसे ही सुबह के समय की मेट्रो अपने यात्रियों के उत्साह से भरी होती है। लड़कियां कॉलेज जा रही होती हैं, दफ्तर जा रही होती हैं। वे अपनी दोस्तों का स्वागत करती हैं। वे पाबंदियों से मुक्त नजर आती हैं। इयरफोन कान में ठूंसे, किसी की निगाहें उपन्यास में उलझी, कोई अपनी नोटबुक के पन्ने पलटती है, कोई फोन पर अपने दफ्तर के साथी को आगे के लिए दिशा निर्देश देती है। शाम को घर लौटने के सफर में उनके चेहरों पर कुछ थकान होती है। सुबह से अलग, शाम की मेट्रो में थोड़ा आलस उमड़ता है, थोड़ी थकान फैली होती है, उनकी चहचहाहट कुछ कम होती है, घर में उनके हिस्से का कार्य अभी बाकी होगा, ऐसा माना जा सकता है।

मेट्रो के इस सफ़र की खूबसूरती को समझने के लिए हमें दिल्ली की सड़कों पर उतरना होगा। क्या दिल्ली की सड़कें भी अपने यात्रियों को ऐसी सहूलियतों से बख्शती हैं। क्या यहां पर आप इसी तरह अपनी दुनिया में लीन सफर कर सकते हैं। नहीं। यहां आपके लिबास पर फब्तियां कसनेवाले मिल जाएंगे। बस स्टैंड पर आपके बगल में खड़े लोग आपको घूरते मिल जाएंगे। पैदल चलते हुए कोई जानबूझकर टक्कर मारता निकल जाएगा। सड़क किनारे खड़ी कार डराती है, दरवाजा खोलकर कोई अंदर खींच लेगा।

यह डर दिल्ली में महिलाओं के खिलाफ बढ़ते अपराध के आंकड़ों की वजह से है। 2013 की तुलना में 2014 में महिलाओं से अपराध के मामले 18.3 प्रतिशत तक बढ़ गए, जिसमें बलात्कार के मामले 31.6 प्रतिशत बढ़े। दिल्ली पुलिस रिकॉर्ड में 2014 में बलात्कार के कुल 2,069 मामले दर्ज किए गए जबकि 2013 में 1,571 मामले दर्ज किए गए थे। दिल्ली पुलिस के ही वर्ष 2014 के आंकड़े बताते हैं कि यहां हर रोज महिलाओं के खिलाफ हिंसा के करीब 40 केस दर्ज किए जाते हैं, इनमें बलात्कार और छेड़खानी की घटनाएं ज्यादा होती हैं।

बलात्कार सामाजिक समस्या है। इसका हल भी समाज में बदलाव के जरिये ही निकल सकता है। मेट्रो के अंदर प्रवेश करते ही ज्यादातर लोगों का बरताव बदल जाता है। मेट्रो के बाहर वही लोग भरोसे लायक नहीं रह जाते। मेट्रो के अंदर की लकदक, सुरक्षा, शालीनता, यहां से बाहर निकलते ही बिखर जाती है। मेट्रो अपने आखिरी पड़ाव पर पहुंच गई है। 

यह सफर यहीं पूरा हुआ। लोगों का रेला बाहर की ओर उमड़ता है। मेट्रो के अंदर बिंदास सफर कर रही लड़कियां वापस उन्हीं रास्तों पर पहुंच गई हैं, जो उनके लिए अबतक सुरक्षित नहीं बन पाए हैं। तमाम दुर्घटनाओं-आशंकाओं, विपरीत हालातों को परे ढकेलते हुए वो तेज चाल से आगे बढ़ रही हैं। यह सफर आजादी का है।


(streekaal.com पर पहले प्रकाशित)

24 November 2014

ईरानी महिलाओं के संघर्ष और हम





ईरान की ओर हम दोस्ताना निगाहों से देखते हैं। टीवी-इंटरनेट युग से पहले भारत और ईरान के बच्चे एक सी कहानियों को पढ़कर बड़े हुए हों जैसे। इसलिए ईरान से कुछ लगाव सा है। ईरान की लड़कियों की ज़िंदगी के बारे में खबरों-सिनेमा-सोशल साइट्स के ज़रिये जो जानकारियां मिलती हैं वो बेहद परेशान करनेवाली होती हैं। भारत की लड़कियां भी संघर्ष के दौर से निकलकर कुछ आज़ाद हो रही हैं, कुछ आज़ादी हासिल करने की जद्दोजहद कर रही हैं। ईरान की लड़कियों के साथ भी ऐसा ही कुछ है। उनकी मुश्किलें हमसे कहीं ज्यादा हैं। ईरान की आज़ाद ख्याल लड़कियों को पढ़कर वहां के हालात के बारे में पता चलता है। कि ईरानी लड़कियां बालों में खुली हवा का एहसास करने के लिए कितना तड़पती हैं। साइकिल चलाना वहां मजहब के खिलाफ़ है। वो पुरुषों के बास्केटबॉल मैच नहीं देख सकतीं। कितनी सामान्य सी बातें हैं ये। जिसके लिए वहां की लड़कियों को कितने जुल्म सहने पड़ते हैं, जैसे उनकी आत्मा को जंजीरों में जकड़ दिया गया हो। उनके बालों को जबरन बांध दिया गया हो, उनकी खुली आंखें इधर-उधर भटकती हैं, उनके कानों में पड़ते मधुर संगीत को तो नहीं रोक सकते वो।




गोवा में आयोजित 45वें इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल ऑफ इंडिया में ईरानी फिल्म द डे आई बिकम ए वुमनप्रदर्शित की गई। ईरानी समाज का सच खोलती है ये फिल्म। ईारनी मूल की फिल्मकार मार्जिए मेशकिनी ने समकालीन ईरानी समाज में औरतों की हैसियत पर ये फिल्म बनायी है। फिल्म की कहानी शुरू होती है 9 साल की एक बच्ची के जन्मदिन से। बच्ची की दादी ने फ़रमान सुनाया है कि 9 साल की होने पर उसे लड़कों के साथ खेलने की इजाज़त नहीं मिलेगी। दादी के मुताबिक उस समाज में नौ साल की होने पर लड़की औरत बन जाती है। इसलिए लड़कों के साथ खेलना उनके समाज की मर्यादा के खिलाफ होगा। छोटी बच्ची दादी को तर्क देती है कि उसके 9 साल का होने में अभी एक घंटा बाकी है। बच्ची के इस तर्क के आगे दादी बड़ी मुश्किल से तैयार होती है। फिर लड़की उस अनमोल एक घंटे को कैसे बताती है फिल्म में दर्शाया गया है। इसी फिल्म में एक दूसरी कहानी शुरू होती है। जिसमें एक युवा लड़की कई लड़कियों के साथ साइकिल पर जा रही है। घोड़े पर सवार उसका मंगेतर पीछे से आता है और लड़की को साइकिल चलाने से मना करता है। साइकिल चलाना उनके मजहब के खिलाफ है। लेकिन युवा लड़की अपने दिल की सुनती है और साइकिल चलाती रहती है। फिर मंगेतर एक काजी के साथ आता है कि अगर लड़की साइकिल से नहीं उतरी तो वो तलाक दे देगा। लड़की साइकिल से नहीं उतरती, मंगेतर घोड़े पर से ही उसे तलाक दे देता है। फिर लड़की का पिता उसे साइकिल चलाने से मना करने के लिए आता है। लड़की फिर भी नहीं मानती। अंत में उसके दो भाई आते हैं और लड़की की साइकिल जबरन छीन लेते हैं। लड़की आखिर में हार तो जाती है लेकिन लड़ते हुए। इस फिल्म में बुजुर्ग औरत की भी कहानी है।छोटी बच्ची की कहानी जैसे ज़िंदगी से किसी अहम स्वाद का हमेशा के लिए छीन लिया जाना। युवा लड़की के परों को बुरी तरह कुचल देना। इन कहानियों को सुनकर जैसे हमारे जेहन का एक हिस्सा भी बुरी तरह छलनी होता है।


आज़ादी की हवा में सांस लेने के लिए तड़प रही हों जैसे हमारी ईरानी दोस्तें। माइ स्टेल्दी फ्रीडम यानी मेरी गुप्त आज़ादी। ये ईरानी लड़कियों का बनाया हुआ ख़ास फेसबुक पेज है। जिसमें वहां की लड़कियां बिना हिजाब पहने अपनी तस्वीरों को पोस्ट कर रही हैं। ईरानी कानून में महिलाओं के लिए सार्वजिनक स्थानों पर हिजाब पहनना अनिवार्य है। ऐसा न करने पर उन्हें गिरफ्तार तक किया गया है। मॉरल पुलिस की चेतावनियों से उन्हें गुजरना पड़ता है। इस फेसबुक पर लड़कियों ने कई तरह की तस्वीरें साझा की हैं। बिना हिजाब के समुद्र तट पर खड़ी अपार दृश्य को देखती हुई, घर की छत से खुली सड़क को देखती हुई ईरानी लड़कियां। तस्वीरों के साथ कुछ लड़कियों ने अपने मन की बातें भी बतायी हैं कि बिना हिजाब पहने हुए उन्हें अपने बालों में हवा कितनी प्यारी लगी। कुछ सेकेंड की आज़ादी भी उनके लिए कीतनी कीमती है। ये पढ़ते हुए आप अपने बालों में खुली हवा को महसूस कीजिए, इक ज़रा सा एहसास है हमारे लिए, लेकिन ईरानी लड़कियों के लिए बहुत मुश्किल सबब।
कुछ लड़कियों ने अपनी ज़िंदगी के किस्से साझा किए हैं। कैसे उनके परिवार में, उनके समाज में पुरुष उनकी ज़िंदगी को नियंत्रित करते हैं। उन्हें अपने फैसले खुद नहीं लेने देते, उनके फैसले कोई और लेता है। ब्रिटने की ईरानी मूल की पत्रकार मसीह अलीनेजाद ने हाल ही में ये पेज बनाया था। जिसे बहुत कम वक़्त में 2,48,000 लाइक मिले।



ग़ोन्चे ग़वामी की खबर पूरी दुनिया को लगी। 25 साल की ग़वामी को अभी ज़मानत पर रिहा किया गया है। 20 जून को उन्हें इसलिए गिरफ्तार किया गया क्योंकि वो कुछ महिलाओं के साथ पुरुषों के वॉलीबॉले मैच को देखने की कोशिश कर रही थीं। ग़वामी में जेल में ही भूख हड़ताल भी कर दी थी और जेल के बाहर हजारों लोग गवामी की रिहाई के लिए आंदोलन कर रहे थे। हस्ताक्षर अभियान चलाया जा रहा था। ईरान में महिलाओं को पुरुषों के वॉलीबॉल और फुटबॉल मैच देखने की आज़ादी नहीं है। गोन्चे को एक साल की सज़ा सुनाई गई है और दो साल तक उनके विदेश जाने पर पाबंदी लगा दी गई है।


पूरी दुनिया हैरान रह गई थी जब पिछले अक्टूबर के आखिरी हफ्ते में 26 साल की रेहाना जब्बारी को फांसी दे दी गई। उन्हें माफी देने के लिए अंतर्राष्ट्री मुहिम चलायी गई थी लेकिन ईरानी सरकार ने सब अनसुना कर दिया। रेहाना ने उस व्यक्ति का कत्ल किया था जिसने उसके साथ बलात्कार की कोशिश की। 2007 में गिरफ़्तार की गई थी रेहाना जब्बारी। अक्टूबर 2014 में उन्हें हत्या के जुर्म में फांसी दे दी गई। रेहाना का मां को लिखा आखिरी पत्र दुनियाभर के अखबारों की सुर्खियां बना। रेहाना ने पत्र में घटना का जिक्र करते हुए लिखा कि इस दुनिया ने मुझे सिर्फ 19 साल जीने का मौका दिया। उस मनहूस रात मुझे मर जाना चाहिए था। मेरी मौत के कुछ दिन बाद पुलिस तुम्हें आकर मेरी लाश पहचानने के लिए कहती। मेरी लाश देखने के बाद तुम्हें ये पता चलता कि मेरा रेप भी हो चुका है।
मेरी अच्छी मां, प्यारी शोले, मेरी ज़िंदगी से भी प्यारी, मैं ज़मीन के अंदर सड़ना नहीं चाहती. मैन नहीं चाहती कि मेरी आंखें, मेरा नौजवान दिल मिट्टी में मिल जाए, मैं चाहती हूं कि फांसी पर लटकाए जाने के तुरंत बाद मेरे दिल, किडनी, आंखें, हड्डियां और बाकी जिस भी अंग का प्रत्यारोपण हो सके उन्हें मेरे लिए शरीर से निकाल लिया जाए और किसी जरूरतमंद को तोहफे के रूप में दे दिया जाए। 

हिजाब ईरानी लड़कियों की ज़िंदगी का इतना अहम हिस्सा बना दिया गया है कि कई तो इसके बिना बाहर जाने की कल्पना भी नहीं कर पातीं। कुछ संघर्ष की राह चुनती हैं। हाल ही में इंचियॉन में संपन्न हुए एशियाई खेलों में मुस्लिम देशों की बहुत सारी महिला खिलाड़ी हिजाब पहने नज़र आईं। इसके बिना उन्हें खेलने की अनुमति नहीं है।


जुलाई 2014 में ईरान की एक तस्वीर ने सोशल मीडिया पर खूब धूम मचायी इस तस्वीर में एक लड़की ने हाथ में बर्तन धोनेवाले लिक्विड की बॉटल को ट्रॉफी की तरह उठाया हुआ है। ईरान की फुटबॉल टीम के जैसे कपड़े पहने हैं। सर पर हिजाब है, आंखों में गुस्सा। ये तस्वीर स्ट्रीट आर्ट की तरह तेहरान में एक सड़क पर दीवार पर उकेरी गई थी। जिस पर लिखा हुआ था ब्लैक हैंड 2014. ब्लैक हैंड यानी एक गुमनाम कलाकार। तस्वीर उजागर होने के चंद घंटों के अंदर ही इस पर लाल रंग पोत दिया गया। ये माना गया कि कलाकार ने ही बाद में अपनी ग्रैफिटी पर लालन रंग पोत दिया और ऐसा करके कुछ संदेश देने की कोशिश की गई। माना गया कि इस तस्वीर के जरिये ये बताने की कोशिश की गई कि ईरान में महिलाओं के साथ कैसा सलूक हो रहा है।


ईरान की लड़कियों की दुआओं में हमारी प्रार्थनाएं भी शामिल हैं। उनकी सुबह हमसे कुछ पीछे है। हमारी सुबह का सूरज भी अभी पूरा गोल नारंगी नहीं है। घर की छोटी-छोटी बातों से लेकर जीवन के कठिन डगर पर हमारे संघर्ष का रास्ता अभी लंबा है। ईरान-भारत के साथ ही पूरी दुनिया में औरतों के अधिकार की ये लड़ाई जारी है। ताकि धरती पर जन्म लेनेवाली नन्ही बच्चियां हमसे ये सवाल न पूछें कि सिर्फ लड़कों को ये हक़ क्यों हासिल हैं, मम्मा मैं लड़कों की तरह क्यों नहीं खेल सकती, मम्मा मैं देर से घर आऊंगी तुम चिंता मत करना और हमें सचमुच चिंता न हो, भरोसा हो हमारी बेटी जहां भी है सुरक्षित है। आकाश, सूरज, चांद सितारे, हवा, धरती, पेड़,पौधे, घास, फूल सब...सबके लिए समान हों।