27 October 2014

मैं अपनी आंखें-दिल को मिट्टी बनने देना नहीं चाहती

रेहाना जब्बारी को बचाया नहीं जा सका। उनकी मौत परेशान करने वाली है, उनकी कहानी पूरी दुनिया को झकझोरने  वाली है। आज के नवभारत टाइम्स से ये खबर अपने ब्लॉग पर पोस्ट कर रही हूं। उन्हें बहादुरी भरा सलाम देते हुए। हम उनसे से दूर थे, पर उनके साथ थे, हैं, रहेंगे।


फांसी पर चढ़ा दी गई ईरानी महिला का अंतिम पत्र


अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तमाम प्रयासों के बावजूद 26 वर्षीय ईरानी महिला रेहाना जब्बारी को नहीं बचाया जा सका। अपने साथ जबरदस्ती सेक्स करने की कोशिश करनेवाले शख्स को जान से मार देने के आरोप में करीब 7 साल से जेल की सजा काट रही रेहाना को 25 अक्टूबर को फांसी दे दी गई। रेहाना ने फांसी से पहले अपनी मां को एक पत्र लिखकर अपनी मौत के बाद अंगदान की इच्छा जताई। दिल दहला देनेवाला यह पत्र अप्रैल में ही लिखा गया था लेकिन इसे ईरान के शांति समर्थक कार्यकर्ताओं ने रेहाना को फांसी दिए जाने के एक दिन बाद 26 अक्टूबर को सार्वजनिक किया। 




मेरी प्रिय मां, 

आज मुझे पता चला कि मुझे किस्सास (ईरानी विधि व्यवस्था में प्रतिकार का कानून) का सामना करना पड़ेगा। मुझे यह जानकर बहुत बुरा लग रहा है कि आखिर तुम क्यों नहीं अपने आपको यह समझा पा रही हो कि मैं अपनी जिंदगी के आखिरी पन्ने तक पहुंच चुकी हूं। तुम जानती हो कि तुम्हारी उदासी मुझे कितना शर्मिंदा करती है? तुम क्यों नहीं मुझे तुम्हारे और पापा के हाथों को चूमने का एक मौका देती हो?

मां, इस दुनिया ने मुझे 19 साल जीने का मौका दिया। उस मनहूस रात को मेरी हत्या हो जानी चाहिए थी। मेरा शव शहर के किसी कोने में फेंक दिया गया होता और फिर पुलिस तुम्हें मेरे शव को पहचानने के लिए लाती और तुम्हें पता चलता कि हत्या से पहले मेरा रेप भी हुआ था। मेरा हत्यारा कभी भी पकड़ में नहीं आता क्योंकि हमारे पास उसके जैसी ना ही दौलत है, ना ही ताकत। उसके बाद तुम कुछ साल इसी पीड़ा और शर्मिंदगी में गुजार लेती और फिर इसी पीड़ा में तुम मर भी जाती। लेकिन, किसी श्राप की वजह से ऐसा नहीं हुआ। मेरा शव तब फेंका नहीं गया। लेकिन, इविन जेल के सिंगल वॉर्ड स्थित कब्र और अब कब्रनुमा शहरे रे जेल में यही हो रहा है। इसे ही मेरी किस्मत समझो और इसका दोष किसी पर मत मढ़ो। तुम बहुत अच्छी तरह जानती हो कि मृत्यु जीवन का अंत नहीं होती।


तुमने ही कहा था कि आदमी को मरते दम तक अपने मूल्यों की रक्षा करनी चाहिए। मां, जब मुझे एक हत्यारिन के रूप में कोर्ट में पेश किया गया तब भी मैंने एक आंसू नहीं बहाया। मैंने अपनी जिंदगी की भीख नहीं मांगी। मैं चिल्लाना चाहती थी लेकिन ऐसा नहीं किया क्योंकि मुझे कानून पर पूरा भरोसा था।'

मां, तुम जानती हो कि मैंने कभी एक मच्छर भी नहीं मारा। मैं कॉकरोच को मारने की जगह उसकी मूंछ पकड़कर उसे बाहर फेंक आया करती थी। लेकिन अब मुझे सोच-समझकर हत्या किए जाने का अपराधी बताया जा रहा है। वे लोग कितने आशावादी हैं जिन्होंने जजों से न्याय की उम्मीद की थी! तुम जो सुन रही हो कृपया उसके लिए मत रोओ। पहले ही दिन से मुझे पुलिस ऑफिस में एक बुजुर्ग अविवाहित एजेंट मेरे स्टाइलिश नाखून के लिए मारते-पीटते हैं। मुझे पता है कि अभी सुंदरता की कद्र नहीं है। चेहरे की सुंदरता, विचारों और आरजूओं की सुंदरता, सुंदर लिखावट, आंखों और नजरिए की सुंदरता और यहां तक कि मीठी आवाज की सुंदरता।

मेरी प्रिय मां, मेरी विचारधारा बदल गई है। लेकिन, तुम इसकी जिम्मेदार नहीं हो। मेरे शब्दों का अंत नहीं और मैंने किसी को सबकुछ लिखकर दे दिया है ताकि अगर तुम्हारी जानकारी के बिना और तुम्हारी गैर-मौजूदगी में मुझे फांसी दे दी जाए, तो यह तुम्हें दे दिया जाए। मैंने अपनी विरासत के तौर पर तुम्हारे लिए कई हस्तलिखित दस्तावेज छोड़ रखे हैं।

मैं अपनी मौत से पहले तुमसे कुछ कहना चाहती हूं। मां, मैं मिट्टी के अंदर सड़ना नहीं चाहती। मैं अपनी आंखों और जवान दिल को मिट्टी बनने देना नहीं चाहती। इसलिए, प्रार्थना करती हूं कि फांसी के बाद जल्द से जल्द मेरा दिल, मेरी किडनी, मेरी आंखें, हड्डियां और वह सब कुछ जिसका ट्रांसप्लांट हो सकता है, उसे मेरे शरीर से निकाल लिया जाए और इन्हें जरूरतमंद व्यक्ति को गिफ्ट के रूप में दे दिया जाए। मैं नहीं चाहती कि जिसे मेरे अंग दिए जाएं उसे मेरा नाम बताया जाए और वह मेरे लिए प्रार्थना करे।

10 October 2014

गांव का घर- स्मृतियों का घर


उस घर के बारे में आपको बताना चाहती हूं जिसका होना सिर्फ एक घर का होना भर नहीं है। कुछ ईंट और ढेर सारी मिट्टी से बना वो स्मृतियों का घर है। जिसमें तरह-तरह की स्मृतियां तैरती हैं। उन स्मृतियों के बारे में विस्तार से बात की जानी चाहिए।

आज दो कमरे का घर लाखों रुपयों से खरीदनेवाले, हर महीने घर की मोटी ईएमआई के कुचक्र में फंसे, ताज़िंदगी एक बैंक के कर्ज़दार हो गए लोगों को जरूर जाना चाहिए ऐसे घरों के बारे में, जो महज एक घर भर नहीं थे। आज के आठ बाई आठ के दो कमरों के मकान, ज़रा सी रसोई जिसमें पांच किलो आटा और पांच किलो चावल से ज्यादा राशन नहीं रखा जा सकता, एक सर्विस बालकनी जिसमें एक वाशिंग मशीन ही रह सकती है, एक और बालकनी कपड़े सुखाने के लिए, जहां कबूतर अपना शानदार आशियाना बनाते हैं, कम जगह में ज्यादा की तरकीबें आजमानेवाले इन घरों में दरवाजा खोलो तो पहले किचन फिर ड्राइंगरूम...। ठुंसम-ठुंसाई से बने हुए इन घरों के बारे में मैं ज्यादा बात नहीं करना चाहती। क्योंकि इनमें कुछ भी ज्यादा नहीं होता।

स्मृतियों में बसे उस घर की बसावट बहुत सुंदर है। खेतों के बीच बना मिट्टी का वो मार्ग जहां खत्म होता है वहां से शुरू करती हूं क्योंकि उसके आगे कुछ नहीं दिखता और उससे आगे हमें जाना भी नहीं है बल्कि पीछे की ओर आना है। तो जहां वो मिट्टी का मार्ग शुरु होता है उससे पहले ही एक बड़े से मैदाननुमा जगह के एक ओर, एक जैसे दो या तीन छोटे मगर खुले हुए घर हैं। उन घरों के आगे एक छोटा सा मंदिर है। ईंट का बना हुआ मंदिर जिस पर सीमेंट की चादर नहीं चढ़ायी गई, यहां हनुमान जी रहते हैं। मंदिर के ठीक सामने एक बड़ा तालाब है। और तालाब के उस पार हमारा ये घर। मंदिर से तालाब को पारकर उस घर तक जाने के लिए एक छोटा सा पगडंडी नुमा रास्ता है। कोई तीन-चार सौ मीटर लंबी पंगडंडी। मंदिर से बायीं तरफ पीछे की ओर तो खेत हैं, जिसके बीच में एक-दो छोटे-छोटे मिट्टी के घर भी बने हैं। मंदिर से बाएं होकर आगे पंगडंडी की ओर बढ़ते हैं। पंगडंडी की शुरुआत जहां से होती है वहीं ठीक बगल में एक ऊंचा सा टीला है। इस टीले पर एक कब्र है। गांव के कुछ लोग हर रात नियमपूर्वक कब्र पर दीये जलाते हैं। सफेद रंग की कब्र किसी पीर फकीर की है। इस शांत टीले पर बच्चे खेलते हैं। कब्र और मंदिर बिलकुल आसपास हैं। मानो रात में जब सब सो जाते हों तो ये आपस में बतियाते भी हों। कुछ हालचाल लेते हों। पीर बाबा पूछते होंगे, हनुमन आज कितने भक्त आए, कैसा दिन गुजरा। हनुमान जी हालचाल लेते होंगे आज दीया सही समय पर जला तो दिया गया।

खैर अभी हम अपने घर तक नहीं पहुंचे। टीले को पीछे छोड़ पगडंडी पर आगे बढ़ते ही दायीं तरफ पूरी गोलाई में  तालाब रहता है। जो दरअसल पगडंडी के दोनों तरफ फैला है। पगडंडी के नीचे ठीक बीच में तालाब के पानी को रोकने के लिए दरवाजा सा बना हुआ है। तालाब का दायीं तरफ का बड़ा हिस्सा पानी से भरा-पूरा रहता है। और बायीं ओर का हिस्सा सूखा सा रहता है। बरसात के दिनों में ये दरवाजा खोल दिया जाता है ताकि लबालब हुए तालाब का पानी और विस्तार ले सके। बारिश के दिनों में तालाब के बायीं ओर का हिस्सा भी भरा-पूरा रहता है। बल्कि तब तो पानी पगडंडी के उपर हिलोरें मारने लग जाता है। क्या पता पगडंडी तब नाराज़ हो जाती हो। गर्मियों में तो कितनी चौड़ी रहती है बारिश में उसके किनारे सिकुड़ से जाते हैं। तब तालाब उसे डराता है।

ये पगडंडी खत्म होती है उस बड़े से घर के दालान पर। जिसमें जंगली घास को फुरसत से पसरने का पसरने का पूरा मौका रहता है। वो इधर-उधर छितरायीं रहती हैं, कहीं-कहीं गुट बनाकर जमा हो जाती हैं, तो हरी-भरी लगती हैं। दालान को छूते तालाब में जलकुंभियों ने डेरा जमाया हुआ है। जलकुंभियों के गहरे गुलाबी रंग के फूल बड़े सुंदर लगते हैं। पानी के फूल ये, पानी का मोह जगाते हैं। 

अब हम सामने खड़े होकर उस घर को देख सकते हैं। एक बड़े संयुक्त परिवार के हिसाब से बना एक बड़ा सा घर। जिसकी छतों पर खपरैल लगी थीं। जहां मेहमानों के ठहराने की पूरी व्यवस्था थी। जहां हवा के गुजरने की भरपूर जगह थी। रोशनी घर के हर कोने में छितरा सकती थी। पानी का पूरा इंतज़ाम था। ये एक ही आबाद घर था यहां, और हां अकेला बिलकुल नहीं।

घर के अंदर आपको ले चलें इससे पहले बाहर की तस्वीर को थोड़ा और स्पष्ट करने की कोशिश करते हैं। घर के ठीक सामने तालाब है। घर के बाएं हिस्से पर उजड़े हुए मिट्टी के दो छोटे से घर हैं, जिनकी बाहरी दीवारें ढही चुकी हैं, बरसों से वहां कोई गया न हो जैसे। घर के दायें हिस्से पर थोड़ा नीचे खेत है। खेत में बीचोंबीच एक आम का छोटा सा पेड़ लहलहाता है। अभी नौजवान है ये, इस पर लटकती कच्ची अमिया देखी जा सकती हैं।  खेत को पार करेंगे तो बड़े पेड़ों के झुरमुट के बीच एक कुआं है। कुएं तक पहुंचने के लिए आप घर को भी पार कर गए तो वापस लौट आइये। और फिर हम घर के सामने खड़े हो जाते हैं।

ये एक बड़ा और भव्य घर है। मिट्टी का बना है। जिसमें ईंटों का भी बखूबी इस्तेमाल हुआ है। सबसे पहले तो बाहर का हिस्सा है आयताकार। दो-दो मीटर की दूरी पर चार पिलर हैं जिन्हें पकड़कर छोटे बच्चे चारों तरफ घूमते हैं।  ज़मीन पर ईंटें बिछी हैं, जो बिलकुल मिट्टी में धंसी हुईं है और बाहर से नहीं दिखायी पड़ती। इसके दोनों छोर पर दो कमरे हैं। खेत की तरफ का कमरा बैठक है। इसमें दाखिल होते हैं। इसके दूसरे छोर पर भी एक किवाड़ है जो खेत की तरफ खुलता है। किवाड़ खोल देने पर भरपूर ताजी हवा अंदर आती है। सुबह की नम, दोपहरी की गर्म, शाम की ठंडी हवा कमरे का किवाड़ खुलने के इंतज़ार में रहती हो जैसे। यहां कोई गणित के भारी भरकम प्रमेय हल करने के लिए बैठता है, कोई कहानियां-कविताएं पढ़ने, ये कमरा एक रचनात्मक ऊर्जा देता है। बैठक में लकड़ी का बना ऊंचा सा पलंग रखा है कोई चार बाई छह फीट का। सफेद पट्टियों से बुना हुआ। पट्टियां ढीली होकर बीच में से थोड़ी झूल सी भी गई हैं। प्लास्टिक के तारों से बुना हुआ लकड़ी का पुराने वक्त का सोफा भी रखा है। दीवारों पर एक तरफ बारासिंगा की सींगें लटकी हुईं हैं। दादाओं के शिकार की निशानियां। दूसरी तरफ की दीवार पर एक बड़ी सी ब्लैक एंड व्हाइट फोटो फ्रेम कराकर रखी है। स्टूडियो में खिंचवाई हुई उस ज़माने की जब इक्का दुक्का फोटो ही हुआ करती थीं। दीवारों में ही आलमारी बनी हुई थी वहां कुछ और सजावटी वस्तुएं थीं। इसके ठीक दूसरे छोर का कमरा बिलकुल उलट था। गलती से दरवाजा छोड़ दिया गया तो बदबू उठने लगती थी। यहां मुर्गी-बकरी पालन का व्यवसाय किया गया था। उनकी गंदगी और उनके होने की खास गंध यहां जमा थी। घर के बगल में खेतों की ओर गायें भी बंधी हैं। जिनकी खूब खातिरदारी की जाती है।

चलिये इस बाहरी हिस्से से अब घर के अंदर की ओर दाखिल होते हैं। ठीक बीचोंबीच एक बड़ा सा लकड़ी का किवाड़ है। जिसे खोलते ही एक मिट्टी से लीपे कमरे में प्रवेश करेंगे आप। जिसके दोनों तरफ दो चारपाइयां रखी थीं। ये मेहमानों को टिकाने का कमरा था। यहां ज्यादा कुछ नहीं था। जब गर्मी की छुट्टियों में सारा परिवार इकट्ठा होता तो यहां की चारपाइयों पर लोग जमते और गप्पें मारते। चारपाई पर अगर सुसता लिये हों तो आगे बढ़िये दूसरा दरवाजा है जो घर के अंदर खुलता है। बीचों-बीच बड़ा सा आंगन। इतना बड़ा जितने में दिल्ली-गाजियाबाद में दो कमरे के फ्लैट बनते हैं। आयताकार आंगन के चारों तरफ बड़े-बड़े कमरे। इन कमरों में मिट्टी और गोबर से लीपाई-पोताई होती थी। इसलिए इनकी खास गंध थी। आंगन और कमरों के बीच में कोई पांच फुट की चौड़ाई में वर्गाकार जगह। जो आंगन और कमरों को अलग करती थी। ये जगह हर वक़्त चहकती रहती थी। कोई बैठा गपियाता। कोई सिलाई-बुनाई करता। घर की औरतों की चिल्लाहट, उनके लोकगीत, उनकी हंसी-ठिठोली, बच्चों के भागते कदमों की थप-थप, आदमियों का गुस्सा, दादियों की कहानियां....यहां सबकुछ गूंजता। कमरों में तो लोग सिर्फ रात में सोने जाते। बाकी सारा वक़्त यहीं गुजरता।

यहां भी बीच-बीच में ईंटों के पिलर बने थे और फिर बीचोंबीच आंगन। आंगन के एक छोर पर तुलसी का पौधा। मिट्टी और सीमेंट से जिसके लिए तीनफुट ऊंचा घेरा बनाया गया था। इसी में पतली और ऊंची बल्ली में नारंगी पताका भी फहराती। जो बताती कि इस घर में आस्थावान लोग रहते हैं। बीचोंबीच एक हैंडपंप। जो नहाने, बर्तन धुलने के काम में आता था। फुदकती चिड़ियां यहां खूब गुनगुनाती। किस्म-किस्म की चिड़ियां दिखती यहां। गौरैया, कोयल, नीलकंठ। हर वक़्त चहचहाता आंगन। कौआ अगर मुंडेर पर बैठकर कांव-कांव करता तो महिलाएं मेहमान के आने का इंतज़ार करतीं, अटकलें लगातीं, कौन सा मेहमान आ सकता है। अगर भूला-भटका कोई दूरदराज का रिश्तेदार आ जाए तो कौए की कांव-कांव सफल हो जाती। आंगन में गेहूं धुलकर सुखाया जाता और फिर दिन भर की पहरेदारी। चिड़िया ताक में रहती, दाना-दाना चुगने को बेकरार होती। महिलाएं चिड़िया उड़ातीं और वो उनकी आंख चुराकर फुदक-फुदककर आती। लुकाछिपी का ये खेल पूरी दोपहरी चलता।

आंगन के सामनेवाले हिस्से में एक तरफ रसोई जमती। मिट्टी के चूल्हे बने थे। जिनमें फूंक मारने के लिए लोहे की एक लंबी सी धौंकनी रखी थी। लकड़ियों पर आग सुलगाने के लिए पूरी सांस खींचकर धौंकनी में फूंक मारती। एक छोटी सी चिंगारी फड़फड़ाती। बड़ी तेज़ी से दूसरी लंबी फूंक ताकि चिंगारी कमज़ोर पड़े इससे पहले लौ बन जाए, चूल्हे की लकड़ियां सुलगने लगें। जो ये काम पहली बार करेंगे उन्हें बहुत दम साधना पड़ेगा। चूल्हे की आग जलाना अनाड़ी के लिए मुश्किल है। चूल्हे पर सेंकी गई रोटियों की ख़ुशबू और स्वाद दोनों ही अलग होते हैं। गांव के पानी का भोजन बहुत स्वादिष्ट बनता है। आग और पानी दोनों की ख़ुश्बू गांव की तश्तरी में होती है। लेकिन इसकी बहुत कीमत भी चुकानी पड़ती है। सुलगती लकड़ियों से निकलती राख फेफड़ों को धीरे-धीरे अपने कब्जे में ले लेती। एक समय में टीबी ने बहुत ज़िंदगियां लीं। गांवों में इस समय गैस तो नहीं पहुंची थी, मिट्टी के तेल वाले स्टोव खूब इस्तेमाल होने लगे थे। यहीं रसोई में लकड़ी की आलमारी थी जिसमें लोहे की जालियां लगीं थीं। इन आलमारियों में अंचार के बड़े-बड़े मर्तबान रखे थे। तेल-घी के डब्बे रखे थे। नीचे की तरफ कांच के कप और केतली जमाकर रखी गईं थीं। रसोई के ठीक पीछे एक बडी सी मिट्टी की खोह नुमा ऊंचा सा कमरा था। ये अनाज रखने की जगह थी। इसमें अंदर ही मिट्टी की सीढ़ियों सा भी कुछ बना था जो अब टूट चुका था। वहां उपर भी अनाज रखा जाता था। 

चार भाइयों का घर था ये। जो अब बुजुर्ग हो चुके थे। उनके आठ बेटे और छह बेटियां और उन सभी के नन्हेमुन्हे बच्चे। जो गर्मी की छुट्टियों, या किसी मौके पर गांव आते। बड़े अदभुत और अचंभित भाव से इस बड़े घर को देखते। अनाज रखनेवाली इस जगह को उन्होंने भूतिया घोषित किया था। बात न सुनने वाले बच्चों को महिलाएं इसी कमरे में छोड़ने का डर दिखाती। बच्चे वहां बाहर से झांक-झांककर भाग निकलते। अनाज घर के अलावा कुल दस कमरों से घिरा हुआ आंगन था। कमरों के अंदर का डिजायन तकरीबन एक जैसा था। सभी कमरों में उपर की ओर मचान सी बनी थी। जिसमें ढेर सारा सामान रखा था। बड़े-बड़े लोहे के बक्से रखे थे। घर का कबाड़ भी इन्हीं मचानों में रखा था। दीवारों में आलमारियां थीं। छोटी-मोटी चीजें इन्हीं आलमारियों पर रखी जातीं। कमरे में एक दीवार से दूसरे दीवार तक रस्सी खींच दी थी। इस पर कपड़े लटका दिये जाते। कुछ पुरानी आलमारियां भी रखी थीं। अब परिवार के सभी सदस्य तो यहां रहते नहीं थे तो कोने पर एक टूट रहे कमरे में झूला टांग दिया गया था यहां बच्चे खेलते, झूला झूलते। कमरों की बाहरी मिट्टी की दीवारों में ही आइने जड़े हुए थे। जगह-जगह कई आइने थे जो वक्त के साथ धुंधले पड़ चुके थे। बाल बनाकर, बिंदी-सिंदूर लगाकर महिलाएं इन जड़े हुए आइनों में खुद को एक बार देख लेतीं, निहार लेतीं, कभी खुद की निगाहों से, कभी अपनी पतियों की निगाहों से। हर आइने के बगल में दीवार पर ही एक छोटी सी आलमारी भी बनी थी। जिसमें कंघी, तेल, काजल की डिबिया, सिंदूर की डिबिया रखी थी। कुछ आलमारियों में दीये रखे गए थे। कांच की शीशियों में तेलभरकर उसके ढक्कन पर बत्ती निकालकर बड़े दीयों का जुगाड़ किया गया था। मिट्टी के दीयों के उपर कजरौटा रखा था। दीया जलता, उसकी लौ कजरौटे में जमा होती और काजल बनता। यही काजल उनकी आंखों की घेरेबंदी करता, छोटे बच्चों के माथे पर नज़र का टीका बन जाता। रात में रोशनी के लिए आंगन के दोनों कोनों पर दो बड़े लालटेन भी लटके थे।

पुराने जमाने में मां-बाप की मौजूदगी में पति अपनी पत्नियों की ओर नजर उठाकर देखते भी नहीं। उनसे बातें सिर्फ बंद कमरों में रात ढले होतीं, दिन में जैसे अजनबी बन जाते हों। पतियों के खाना खाते समय पत्नियां पंखा झुलातीं, यही वो वक़्त होता जब वो अपने मन की कोई बात कह पाती हों। चाहे सासु मां की शिकायत, अपने लिये नई साड़ी या बच्चों के लिए कॉपी-पेंसिल लाने की बात।

समय-समय पर मिट्टी और गोबर से कमरों और पूरे घर की लिपाई की जाती। घर के बायें हिस्से की ओर एक कमरे में जमीन पर चक्की बनी हुई थी। दोपहर में सारा काम निपटाकर घर की महिलाएं उसमें अनाज पीसती थीं। उनकी मदद के लिए बाहर से गरीब घरों की महिलाएं भी आतीं। अनाज पीसने का काम खासी मेहनत का था। दोनों बाजुओं से पूरी ताक़त लगाते हुए पत्थर की बनी चक्की दो महिलाएं मिलकर घुमातीं। वो आमने-सामने बैठतीं। अनाज पिसाई के काम के समय वो अपने लोक गीत गातीं। एक दूसरे को चिढ़ातीं। सहेलियों को चिढ़ाने के लिए भी खूब गीत बने थे। यही उनका मनोरंजन का समय भी होता। चक्की वाला ये कमरा अहाते में खुलता। एक बड़ा खुला सा अहाता, बोलते समय जिसमें से अ को हटा दिया जाता और सिर्फ हाता पुकारा जाता। इसमें अमरूद, आम के कई पेड़ लगे हुए थे। बीचों-बीच आठ बाई छ की लंबाई चौड़ाईवाली सीमेंट से बनी पक्की फर्श थी। जिसके चारों ओर एक ईंट की सीमेंट जड़कर मेड़ सी बना दी गई थी। ये जगह कपड़े धुलने के लिए थी। घर की महिलाएं, माएं-चाचियां-बुआएं यहां कपड़े धोतीं। आश्चर्य होता है कि कपड़े धोने के लिए इतनी बेहतरीन व्यवस्था। हाता वो जगह थी जहां एक ओर पुरानी तकनीक का शौचालय भी बना हुआ था। जिसकी बदबू का भभका वहां जाने से हर किसी को रोकता। ईंट की दीवार से घिरा हुआ शौचालय था ये। कपड़े धुलने की जगह से थोड़ा सा आगे। वहां कोई जाना नहीं चाहता था। सब खुले में ही शौच जाते। महिलाएं शाम ढलने के बाद। लेकिन शहरों में पले-बढ़े बच्चे जब गांव आते तो मजबूरी में नाक बंदकर इसी जगह का इस्तेमाल करते। हाते में हवा खूब चलती। ये घर का एक स्वतंत्र हिस्सा था। अब ये बताने पर दुख होगा कि आज के वक्त में आबादी के लिहाज से हम जितना बढ़ चले हैं, ऐसे अहाते में दो-तीन घर तो बिल्डर लोग आसानी से बना देते। उसके उपर कई मंज़िलें भी डाल देते। खैर..।

उस ज़माने की तकनीक, खुले-हवादार, ऊंची छतोंवाले मिट्टी के घर में गर्मी के दिन बहुत सताते न थे। कमरों के बाहर चारपाइयां डालकर लोग आराम फ़रमाते। दोपहर की हवा गर्म तो लगती लेकिन जलाती नहीं।

इतना किस्सा सुनाते-सुनाते अब शाम हो चुकी है तो चलिये ज़रा घर के बाहर की तरफ चलते हैं, घर के सभी सदस्य वहीं खाट पर जम गए हैं। मिलने-मिलाने आनेवाले भी उधर ही ठहरकर बतियाते हैं। जरा तालाब की ओर तो देखिए। छोटे बच्चों का एक झुंड पानी में खेल रहा है। एक ओर बंशी भईया बड़ी देर से कंटिया डालकर मछली फंसाने की कोशिश में बैठे हैं। मछली को फंसाने के लिये यहां लाल चींटों का चारा बनाया जाता और उसे कंटिये की हुक में फंसा देते। कभी आटे की गोलियां फंसाते। एक दिन आप भी कंटिया डालकर बैठिये तब पता चलेगा कि मछली मारना कितने धैर्य का काम है। घंटों बैठे रहो तब जाकर कंटिये में हलचल होती। एक बड़ी मछली कांटे में फंस गई तो बस रात का भोजन तैयार। कई बार तो मछली को आग पर भुनकर पकाया जाता और नमक मिर्च लगाकर चट कर लिया जाता। शाकाहारी लोग माफ करें। तालाब में एक छोर पर कुछ भैंसें आराम फ़रमा रही हैं। भैंसे गर्मी में तालाब का पानी सोख रही हैं। तालाब में पगडंडी की तरफ कम पानी रहता है। वहीं एक-दो शिलाएं भी रखी रहती हैं। जहां लोग कपड़े भी धोते हैं। दूसरी तरफ तालाब का पानी गहरा होता जाता है। तालाब से जुड़े भूतों के कुछ किस्से भी चटखारे लेकर सुनाये जाते हैं। रात में एक आदमी पगडंडी से गुजरता है, उसे रोज़ आवाज़ आती है भाई बीड़ी दे दे। वो आदमी इधर-उधर देखता है कोई नहीं दिखायी देता। मगर दोबारा जैसे ही वो कदम आगे बढ़ाता है फिर आवाज़ आती है, बीड़ी दे दे। आदमी ठिठककर रकता है और अपनी जेब से बीड़ी का बंडल निकालकर वहीं फेंकता है और भागता चला जाता है। तब से किस्सा मशहूर है एक यहां एक भूत रहता है जो रात में लोगों से बीड़ी मांगता है।


बच्चे और बूढ़ों की किस्से-कहानियों में शाम कब की चल पड़ी और रात तारों की ओढ़नी ओढ़कर चुपके से उतर आई। गांवों की रात में जुगनू-टिड्डे और अदृश्य से रहनेवाले तमाम छोटे-छोटे जीव गूंजने लगे। खाना पक चुका था। पहले बच्चों की कतार निपटी, आदमियों की, औरतों ने सबसे आखिर में खाना खाया। बच्चों ने चरपाइयां लगा दीं। उनकी जादुई और भूतों वाली कहानियां चल रही हैं। घर के बाहर दालान में रात के सुरीले जीवों में कुछ खर्राटे भी गूंजने लगे हैं। औरतें थक के निढाल हो गईं हैं और आंगन में ही चारपाइयां डाल के सो रही हैं। हवा रह-रह कर सबके सिराहने से गुजरती है, सो गए लोगों को दुलारती है, नींदभरी मीठी थपकियां देती है। सामने तालाब भी उनींदा है, अपनी जलतरंग में चुपके से जम्हाईयां लेता है। सबके सो जाने की तसल्ली करता हुआ अलमस्त नींद में घुल जाता है। 


28 September 2014













नवरात्र के मौके पर कवियित्री शुभा की एक कविता


मुझे संरक्षण नहीं चाहिए
न पिता का न भाई का न माँ का
जो संरक्षण देते हुए मुझे
कुएँ में धकेलते हैं और 
मेरे रोने पर तसल्ली देने आते हैं
हवाला देते हैं अपने प्रेम का

मुझे राज्य का संरक्षण भी नहीं चाहिए
जो एक रंगारंग कार्यक्रम में
मुझे डालता है और
भ्रष्ट करता है

मुझे चाहिए एक संगठन
जिसके पास तसल्ली न हो 
जो एक रास्ता हो
कठोर लेकिन सादा

जो सच्चाई की तरह खुलते हुए
मुझे खड़ा कर दे मेरे रू-ब-रू

जहाँ आराम न हो लेकिन 
जोख़िम अपनी ओर खींचते हों लगातार

जहाँ नतीजे तुरन्त न मिलें
लेकिन संघर्ष छिड़ते हों लम्बे

एक लम्बा रास्ता
एक गहरा जोख़िम
रास्ते की तरह खुलती
एक जटिल सच्चाई मुझे चाहिए ।

12 July 2014

रात का राग




जी चाह रहा था पोटली में इस आवाज़ को बांध लूं, सहेज लूं, जब जी चाहा, पोटली खोली, आवाज़ सुनी, थोड़ा सुकुन बटोरा और पोटली फिर संभाल कर रख दी।
ये बहुत सारे कीट-पतंगों, झींगुर, जुगनू समेत रात के यात्रियों की आवाज़ थी। एक लंबी धुन की तरह। जो रात भर अनवरत बजती रहती है। खूब पेड़-पौधे रहते हो जहां ये आवाज़ आती ही है। पेड़-पौधों, जंगली घास, कुछ झाड़-झंखाड़ के बीच अपने रहने के लिए जगह बना लेते हैं बहुत सारे छोटे-छोटे जीव। दिन में हमारे शोरोगुल के बीच इनकी आवाज़ दब जाती है। लेकिन रात के सन्नाटे में खूब गूंजते हैं ये। कितने जुगनू, कितने झींगुर, चीटें-चीटियां, मकड़ियां, गिरगिटें, मेंढकें, लाल-लाल कीड़े ये सब एक सुर में गाते हों जैसे। इन सबकी आवाज़ों को मिलाकर रात के सन्नाटे में ये आवाज़ तैयार होती है। कुदरत ही इसकी संगीतकार है। इतने सारे वाद्यंत्र जुटे हैं इसके लिए। झींगुर अपनी तान दे रहा, जुगनू अपनी बात गुनगुना रहा, मेढक भी कुछ टर्राने आ गया, लाल कीड़े क्या कह रहे होंगे। रात के इस पटल पर मेरे सामने लीची के पेड़ हैं। कुछ आम के पेड़ हैं। चीकू, आंवला, नींबू के पेड़ हैं। इनके नीचे ढेर सारी जंगली घास। झाड़-झंखाड़ है। मुझे ये झाड़झंखाड़ भी पसंद हैं। पेड़ पौधे अपने जंगलियत में ही पसंद हैं। किसी गार्डन में करीने से काढ़े हुए पेड़ नहीं। कांट-छांट कर जिन्हें आकार दे दिया गया हो। रात के इस छंद में जंगली घास की फुसफुसाहट भी शामिल होगी। गाती हो शायद..हम कहीं भी उग सकती हैं, हम धरती के सबसे करीब हैं, हम नहीं रौंदी जा सकतीं, हमारी कोमल लटें सबसे ज्यादा ताकतवर हैं। हर तूफान का हम डटकर सामना करती हैं। हां हम जंगली घास हैं। वहीं लीचियों को चट करने आए कीड़े भी अपनी आवाज़ छोड़ रहे होंगे। कुछ बुदबुदा रहे होंगे। लीचियों का रस निचोड़ रहे होंगे। आम के पेड़ में घोसला बनाकर रह रही चिड़िया आंखें मूंद कर सो रही होगी। रात में कुनकुनाते अपने नन्हे बच्चों को चीं-चीं कर डांट लगा रही होगी। हवा घास को छूते हुए पेड़ों के बीच घुसकर कुछ सरसराहट पैदा करती है। हवा के संगीत पर फिर बज उठते होंगे सारे कीड़े-मकोड़े। एक साथ फिर सब लेंगे द्रुत गति में अलाप। उनकी संगीत सभा को अचानक तोड़ देता है सोने की कोशिश कर रहा कुत्ता। भूंकता है आसमान की ओर देखते हुए। जाने क्या आहट पायी, जाने क्या देखा। रात की तंद्रा को भंग करती हुई, गुजरती हुई गाड़ियों की आवाज़ भी आती है, कोई देर रात लौट रहा है अपने घर को। सबकुछ एक बार फिर शांत होता है और फिर धीरे-धीरे बजने लगता है ये जंगली संगीत। आसमान में छिटके तारे बेआवाज़ संगीत की तरह ही टिमटिमाते हों जैसे। धरती पर ये रात का राग है। रात की कोई लंबी कविता हो जैसे।
बरसाती रात की इस सभा की दर्शक हूं मैं। देहरादून की इस रात में मैं इस आवाज़ पर अपने कान रखती हूं। देरतक इसे सुनने की कोशिश करती हूं। दिल के किसी कोने में एक कमरा बनाती हूं जहां इन आवाज़ों को सहेजा जा सके। सामने धुंधलाती पहाड़ियां देख रही हूं। दिल बेचैन होता है। अफसोस जताते हुए कि फिर लौटना है तेज़ भागते अपने महानगर की ओर। जहां इस सब के लिए वक़्त ही नहीं। जहां सड़कें हर समय भागती रहती हैं। गाड़ियों और उनके हॉर्न की तेज़ आवाज़ सड़क को ठहरने नहीं देती। आंखों में सपने मसलते हुए जहां आ पहुंचे हम। और ऐसी जगह के वासी हो गए जहां हमेशा अजनबी की तरह रहना है। एक बड़े सराय की तरह ये महानगर।
दिल्ली-नोएडा-गाजियाबाद के ईर्दगिर्द पंद्रह साल होने को आए। इसके बावजूद ये अजनबियत अभी गई नहीं है। यहां रात में सिर्फ शोर सुनायी देता है। एयर कंडीशन, कमप्यूटर, फ्रिज और टीवी समेत तमाम इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों की आवाज़ें जहरीले शोर की तरह हमारे ईर्दगिर्द हर समय बजती रहती हैं। रात में सड़क पर भागती गाड़ियों के दनदनाते हॉर्न की आवाज़ें डरावनी लगती हैं। देररात कभी हॉर्न की तेज़ आवाज़ सुनायी दे जाए तो हादसे का डर लगता है। इस शोर शराबे में दब जाती है किसी चिड़िया की तान। कबूतरों की गुटरगूं ही बचीखुची है यहां। हां देर रात कुत्ते यहां भी भूंकते हैं। जाने क्या सोचते हों वो भी। कंक्रीट के जंगल में कैसे आ गए हम। और आ जो गए तो ऐसा भी नहीं कि सबकुछ छोड़छाड़ फिर निकल जाएं। ऐसा करने के लिए भी हिम्मत चाहिए।

(चित्र गूगल से साभार)



14 June 2014

उत्तराखंड आपदा से हमने क्या सीखा




उत्तराखंड आपदा को एक साल होने को आए। कुदरत का ऐसा खौफनाक खेल इससे पहले शायद ही किसी ने देखा हो। देश के अलग-अलग हिस्सों से आए लोग। केदरानाथ को पूजने के लिए। बाबा केदार के दर्शन के लिए कठिन-दुर्गम रास्ते कय कर पहुंचे श्रद्धालु। किसी को पता न था कि पहाड़ों के उपर कुदरत कौन सा चक्रव्यूह रच रही है। कौन सा बादल फट पड़ेगा और अपने साथ तबाही का सैलाब ले आएगा। पहाड़ों के बीच बड़ी खामोशी से कौन सी झील बुनती चली गई और विस्फोट की तरह उन हजारों श्रद्धालुओं पर टूट पड़ेगी। जो अभी बाबा केदार की पूजा के लिए आरती का थाल सजा रहे थे। जो केदार मंदिर के बाहर नंदी को गेंदा फूलों से सजा रहे थे। बारिशें तो कई दिनों से हो रही थीं। लेकिन उन बारिशों में एक खतरनाक धुन छिपी थी। ये शायद ही कोई भांप सका था। पूरी केदारघाटी अपने श्रद्धालुओं की श्रद्धा से ओतप्रोत पसरी हुई थी। सब जन अपने अपने कामों में जुटे थे। फूलवाले, होटलवाले, चायवाले, घोड़ेवाले। किसी को मालूम नहीं चला कि मंदाकिनी बस हरहरा के गिरने वाली है। किसी सैलाब की तरह अपने साथ सबकुछ बहा ले जाने पर अमादा। विनाश की लीला अपने साथ लेकर उतरेगी मंदाकिनी और चारों तरफ हाहाकार मच जाएगा।
हाहाकार मच चुका था। पहाड़ों से मलबा उतर रहा था। मंदाकिनी उतर रही थी। बादल फट रहा था। झील टूट रही थी। सबकुछ एक साथ। किसी के पास भागने का मौका न था। कुदरत के आगे समूची मानवता बेबस थी। मंदाकिनी के शोर में लोगों की चीखें दबी जा रही थीं। छोटे बच्चों के हाथ उनके मां-बाप से छूट गए थे। कुदरत के करीब रहनेवाले स्थानीय लोग, दूसरे पहाड़ों पर चढ़ इस विनाशलीला से बचने की कोशिश कर रहे थे। कुछ कामयाब भी हुए। लेकिन पहाड़ों को न जानने समझनेवाले लोगों के पास इतना मौका न था। कौन किधर जा रहा था,कौन  कहां गिर रहा था, कौन कहां बह रहा था। कुछ होश नहीं था। मंदिर के आगे शव बिछ गए। गेंदा फूल से सजे नंदी शवों से घिर गए। जान छिपाने के लिए लोग मंदिर के अंदर जा छिपे लोग शवों में तब्दील हो गए। मंदाकिनी की तेज़ प्रलयकारी धारा में लोग बहते चले गए। एक औरत ने अपने पूरे परिवार को बहते देखा। एक बाप ने अपने इकलौते बेटे को बहते देखा। एक मां ने अपनी तीन बेटियों को बहते देखा। कल्पना से इतर कुदरत अपने आप में घटित हो रही थी। और उसके साथ जो हो रहा था उसके बारे में अब बातें ही की जा सकती हैं। रामबाड़ा डूब गया था। घोड़ा पड़ाव डूब गया था। केदारघाटी से शुरू हुई कुदरत की विनाशलीला का दायरा यहीं तक नहीं सीमित था। पूरा उत्तराखंड कांप गया था। बदरीनाथ की सड़कें उधड़ चुकी थीं। ऋषिकेश में गंगा की लहरें तूफान मचा रही थीं। मंदाकिनी, अलकनंदा, भागीरथी के रास्ते में जो-जो आया सब ध्वस्त हुआ। बताया गया कि उस रोज गुस्सैल हुई नदियां अपने पुराने रास्तों पर लौट आईं थीं। जहां वो कभी पहले बहा करती थीं। नदियों के रास्ते बदलने का इल्म किसी को न था।  उन रास्तों पर अब नई इमारतें उगा दी गई थीं। नए होटल बना दिए गए थे। लोगों ने नदियों के बिस्तर पर अपना घर बना लिया था। इसलिए ये तबाही और उग्र हो गई। और भयावह। पांच हज़ार से ज्यादा लोग उत्तराखंड में आई तबाही का शिकार हुए। उत्तराखंड के सैंकड़ों गांव इस तबाही में उजड़ गए। यात्रियों की मौतों के बीच उनके दुख पर ठीक से बात भी नहीं की जा सकी। उनके जख्म अब भी रिस रहे हैं। उस तबाही की दास्तान सुनाने के लिए कुदरत ने कुछ लोगों को बख्श दिया। जो बता सकें कि हमने प्रलय को देखा था।


फिर पड़ताल की बारी आई। उत्तराखंड में ऐसा क्यों हुआ। विकास की लालसा में पहाड़ों में धड़ाधड़ हुए विस्फोटों में सबकुछ इतना कच्चा हो चुका था कि एक चूक पर बचने की गुंजाइश बेहद कम थी। जानने की कोशिश हुई कि छोटी सी केदारघाटी में हजारों की संख्या में श्रद्धालु क्यों जमा हुए। इतने सुदूर पहाड़ियों में पर्यटन की कितनी गुंजाइश रखी जानी चाहिए। देश के किस-किस कोने से कौन-कौन से यात्री आए। उनका पता-ठिकाना क्यों नहीं रखा गया। क्यों नहीं पर्यटकों का रजिस्ट्रेशन हुआ। कैसे नदियों के किनारे गैरकानूनी तरीके से होटल-गेस्टहाउस बनते चले गए। संतुलित पर्यटन की बात हुई। फिर बात हुई नदियों के किनारों को संरक्षित करने की। इको-सेंसेटिव ज़ोन बनाने की। नदियों के रहने के लिए कुछ जगह छोड़ दी जाए। लेकिन इस सब पर बात और कार्रवाई ढीले-ढाले ढर्रे पर ही हुई।

इको-सेंसेटिव ज़ोन को लेकर तमाम तरह के विरोध और भ्रांतियां देखने को मिलीं। स्थानीय लोग खतरा महसूस करने लगे। उत्तराखंड में चल रही छोटी-बड़ी बिजली योजनाओं की पड़ताल शुरू हुई। पर्यटकों का रजिस्ट्रेशन कराया गया।

इस पूरे एक साल में उत्तराखंड में आई आपदा पर ऐसा कुछ नहीं देखने को मिला जो सबक के तौर पर याद रखा जाए। आपदा पर राजनीति ही देखने को मिली। उत्तराखंड आपदा में उजड़े गांवों को अबतक नहीं पूछा गया। इसी वजह से कई गांवों ने यहां लोकसभा चुनावों में बहिष्कार भी किया। उत्तराखंड सरकार ने केदारघाटी में पूजा दोबारा शुरू करने की जल्दबाज़ी दिखायी। जबकि पहली चिंता वहां के रास्तों को दुरुस्त करने की होनी चाहिए थी। ताकि दोबारा वहां कोई हादसा न हो। और अगर हो तो उससे निपटा जा सके। लेकिन वाहवाही बटोरने के लिए सरकार की चिंता केदारनाथ में दोबारा दर्शन कराने की ही रही। खतरनाक हद तक की स्थितियों में दोबारा पूजा चालू भी कर दी गई। यात्रा मार्ग दोबारा चालू कर दिए गए। लेकिन वहां अब भी स्थितियां यात्रा करने योग्य नहीं हैं। वहां अब भी जगह-जगह दबे शवों को देखा जा सकता है। उन शवों को अबतक हटाया तक नहीं गया। प्रलय और मौत के निशान वहां जगह-जगह दिखायी दे रहे हैं और पूजा चालू है।
क्या होता अगर उत्तराखंड में केदारयात्रा एक साल के लिए  स्थगित कर दी जाती। और स्थानीय स्तर पर दुरुस्तगी के काम पहले किये जाते। उजड़े संपर्क मार्गों से कटे गांवों में रह रहे लोगों को पहले ठीक से बसाने का काम किया जाता।
इस बीच केदारघाटी में पूरे साल बर्फबारी होती रही। फरवरी, मार्च, अप्रैल, मई तक बर्फ़बारी से यहां पांच-पांच फीट तक बर्फ़ जमी रही और है। कुदरत जैसे केदारघाटी के जख़्मों पर बर्फ़ की रुई रख रही हो।
उत्तराखंड आपदा  से कुदरत से छेड़छाड़ किस हद तक खतरनाक हो सकता है। हमने जाना कि कुछ जगह नैसर्गिक तौर पर मानवीय क्रियाकलापों से रिक्त ही रखनी चाहिए। कुछ जगहों को उनके प्रकृतितम रूप में रहने देना चाहिए।


23 May 2014

ये तस्वीर कब बदलेगी


चौड़ी सड़क पर आकर खत्म होती गली के मुहाने पर चाय की गुमटी थी। वो बच्चा यहां उदास सा बैठा था। खिन्न था। बारह-तेरह साल की उम्र में ही उसके कंधों पर नई ज़िम्मेदारी आ गई थी। दादा के साथ काम में हाथ बंटाने की। चाय देना, गिलास साफ करना, दादा की अनुपस्थिति में चाय बनाना। अम्मा का इंतकाल तीन दिन पहले हुआ। अम्मा ही दादा के साथ चाय की उस गुमटी में हाथ बंटाती थी। अंतिम दिन तक वो अपनी चाय की गुमटी पर डटी रही। तबियत ढीली चल रही थी। मई की इस बरसाती रात में अचानक और बिगड़ गई। बिना देरी किए उन्होंने दुनिया से कूच कर दिया। अम्मा चली गई तो फर्क बस इतना पड़ा कि चाय की दुकान पर दादा का हाथ बंटाने के लिए बड़े पोते को नियुक्त कर दिया गया। तीनों बच्चों में सबसे बड़ा होने के नाते ये जिम्मेदारी उसे ही मिलनी तय थी। ज़िंदगी के कैनवस पर ये उसका प्रमोशन था या डिमोशन। गली के छोर पर चाय की दुकान के बगल में दोनों छोर पर उसके दो छोटे भाई बहन क्रिकेट खेल रहे थे। छोटी बहन गेंद फेंकती, उससे बड़ा भाई बल्ले से गेंद को हवा में उछालता। उन्हें क्रिकेट खेलता देख बच्चे के चेहरे पर मुस्कान आ जाती। और फिर उतनी ही तेज़ी से लौट भी जाती।  सड़क पर ढुलकती गेंद में जैसे उसकी हसरतें भी ढुलकती जा रही हों। वो ख़ुश नहीं था। परिवार में मिली इस नई भूमिका को स्वीकार नहीं करना चाहता था। लेकिन यहां न कि गुंजाइश नहीं थी।

उसकी उदासी चाय की भाप में मिलकर मई की इस सुबह को और गरमा रही थी। तभी ठंडी हवा के झोंके की तरह वो तीन लड़कियां वहां से गुजरीं। वो भी बारह-तेरह की उम्र की ही थीं। सफेद रंग के सलवार-कुर्ते की यूनिफॉर्म पहने स्कूल जा रही थीं। बीच में चल रही लड़की आत्मविश्वास से लबरेज थी। गली जिस सड़क पर आकर खत्म होती है। वहीं बाईं छोर पर उसके पिता जूस का ठेला लगाते हैं। वो अक्सर ही पिता की मदद करती। सुबह ठेले को तैयार करती। उसके पहियों के नीचे ईंट टिकाती। बोरियों में बंद मौसमियों को निकालकर ठेले पर सजाती। जूस निकालने की मशीन को साफ करती। पिता की मदद के लिए एक-एक मौसमी छील-छील कर रखती जाती। माहिर की तरह वो मौसमी के सख्त छिलके उतार कर रखती। ये सब करते हुए उसके चेहरे पर आत्मविश्वास झलकता। वो बेहद मज़बूत लड़की थी। पिता की मदद कर रही थी। ये सब करते हुए वो उन तमाम बातों को भी ख़ारिज कर रही थी कि बेटा ही बाप का हाथ बंटाता है, बेटी जिम्मेदारी होती है। बेटी अपने पिता का हाथ बंटा रही थी। छोटी सी उम्र में घर की जिम्मेदारी संभाल रही थी। जूस के ठेले पर ज्यादातर अजनबी पुरुष ही आकर रुकते। वो उन सब के बीच पूरी तन्मयता से अपने काम को अंजाम देती। चेहरे पर कोई शिकन नहीं। गली से गुजरते हुए तेज़ चाल, चेहरे पर आत्मविश्वास, जिसमें खुशी की एक लकीर भी खिंची थी, अपने पीछे वो सुखद एहसास छोड़ गई। 

इसी सड़क पर जूस के ठेले से पहले ही बस स्टैंड है। जिसके बगल में कूड़े का ढेर पड़ा रहता है। यहां यात्री इंतज़ार नहीं करते। बस थके-मांदे लोग बैठकर सुस्ताते हैं। बारह-तेरह की उम्र के ही दो बच्चे झूमते हुए बस स्टैंड पर आ बैठे। उनकी चाल से पता चल रहा था वो नशे के झोंके में हैं। बेहद खराब हालत में। कपड़े चीथड़ों जैसे। आंखें नशे में बुझी हुई। जीवन का न्यूनतम सौंदर्य़ भी नहीं झलक रहा था उनमें। उनमें से एक ने अपनी जेब से एक पन्नी निकाली। उसमें ब्रेड पकौड़े के दो टुकड़े थे। दूसरे बच्चे ने अपनी जेब से लाल रंग का एक चमकता हुआ पाउच निकाला। इस पाउच को देखकर समझा जा सकता था कि ये बिलकुल नया है। इसमें वाइटनर था। ब्रेड पकौड़े के उपर उन्होंने वाइटनर लगाया, फोल्ड किया और खा लिया। उन दोनों की ओर किसी की नज़र नहीं थी, न उनकी नज़र किसी की ओर। जैसे वो इस दुनिया में होके भी नहीं हैं। या वो हैं ही क्यों। वो देखना भी नहीं चाहते थे इस समाज को। न समाज देख रहा था इनकी ओर। खुद में खोने के लिए उन्हें नशा सिखा दिया गया था।

21वीं सदी के भारत के एक महानगर की सड़क का ये बेहद आम दृश्य। हर कोई अपनी अलग कहानी में लिपटा हुआ। अपनी दिक्कतों से जूझता हुआ। सड़क बढ़ती हुई। सड़क के साथ लोग बढ़ते हुए। उनकी कहानियां बढ़ती हुईं। एक दूसरे से होड़ लेती हुईं। एक दूसरे को छूती हुईं। कभी मुस्कुराती हुईं। कभी दनदनाती हुईं। लेकिन बच्चे। बच्चों की कहानियां एक सी ही होनी चाहिए। सिर्फ मुस्कुराती हुईं। ये तस्वीर कब बदलेगी।








10 May 2014

शब्दों की तलाश में


जब ज़िंदगी किसी शिल्प में न ढल सकीं
कविताएं कैसे ढलेंगी
पूछती हूं खुद से
अनमनी, अधूरी, बिखरी
शब्दों के पैमाने पर कैसे नापूं
पतझड़, अंधड़, उमड़ता समंदर
बेचैनियों को, उमड़ती लहरों को
किन लफ्जों में समेटूं
जो सुबहें सूरज उगने पर न हों
जो रातें टुकड़ों में आती हों
उजाले का सुबह से नाता न हो
रात सूरज को ढांक कर हो
एक जलती लौ में प्रवेश कर
चले जाएं किन्हीं रास्तों पर
किन्हीं बस्तियों में
जिनका पता...नहीं पता..
जहां सवाल नहीं जवाब हों
अब ऐसे अबूझ को कैसे लिखें
खड़कने लगे चुप खड़े दरवाजे
धूप-हवा-पानी सब
होने लगें एक दूसरे में मगन
उड़ने लगे धूल हर तरफ
दीखता जब कुछ नहीं
आए ऐसा अंधड़
कुदरत की इस बेचैनी
को किन शब्दों में ढालें
कोई इंद्रधनुष ले आएं
तड़पते मन को कस कर बांधें
बिखरे शब्दों, बिखरी कविताओं के लिए
कोई बिखरा शिल्प तलाशें


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उस छल का क्या करे
जिससे छली जाती है हर रोज
घर में, मन में
अपनी ही आंखों में
होती है तिरस्कृत
उतरती चली जाती है
अंतर्मन की सीढ़ियों से
दिल के कोनों में कहीं बसी
गहरी  उदास झील किनारे
चुप बैठती बड़ी देर वहां
मन का मौन टूटता नहीं
आंखों से अंदर ही अंदर
झर-झर बह गए आंसू
भरती जाती झील लबालब
तूफान उमड़ने को होता है
पर उमड़ता नहीं
खुद से हारी हार
बड़ी खतरनाक
दिल टूटता है
अब मगर रोता नहीं
लौट आएगी जल्दी ही
हां मालूम है
कोई नहीं कर रहा इंतज़ार