एक जगह दरवेश कहते हैं: शहरों की अपनी विशिष्ट गंध होती है, अकरा में समुद्र और मसालों की गंध होती है, हैफा से गंध आती है चीड़ों और बिस्तर की सिलवटदार चादरों की, मास्को से गंध आती है बर्फ पर पड़ी वोद्का की, काहिरा में गंध है आम और अदरक की, बेरूत में धूप और समुद्र और धुएं और नीबुओं की, पेरिस में गंध है ताजा रोटी और पनीर की और फेटा पनीर के रेशों की, दमिश्क गंधाता है चमेली और सूखे मेवा से, ट्यूनिस रात और नमक की मुश्कीं से, रबात मेंहदी और लोबान और शहद से।
कोई भी शहर जो अपनी गंध से जाना जाता है, याद किए जाने के लिए आश्वस्त नहीं हो सकता। निर्वासन की जगहों पर एक समान गंध होती है, कुछ और के लिए उत्कंठा की गंध, एक गंध जिसे याद रहती है दूसरी गंध, बाधित हुई सांस की गंध, एक भाव जो आपको ले जाता है काफी इस्तेमाल किए गए पर्यटक नक्शे की तरह पहली जगह की गंध की ओर। गंध एक स्मृति हैं और एक सूर्यास्त। यहां सूर्यास्त अजनबियों को सौंदर्य का उलाहना है।
एक अखबार में महमूद दरवेश के इस पीस का हवाला दिया गया, पढ़ते हुए बड़ी बेचैनी सी हुई, कई बार कोई बहुत अच्छी चीज हो, चाहे पढ़ने की या खाने की, बातचीत का कोई हिस्सा हो या कोई लम्हा, बहुत अच्छी चीज, बेचैनी पैदा करती है। दरवेश के इस अंश को पढ़कर भी ऐसा ही लगा और फिर अपने शहर की गंध भी महसूस करने की कोशिश करने लगी।
लखनऊ में जैसे गंध है गंधहीन बोगनवेलिया की, पुरानी किताब की, और शाम को...कान के पीछे लगाई जानेवाली इत्र की भीनी गंध में घुल जाती है तेज़ टुंडे कबाब की गंध
गोरखपुर में साइकिल पर बर्फ़वाली आइसक्रीम की गंध है, ठीक बगल में रही आलू टिक्की की भी
वाराणसी में गेंदाफूल के मालाओं की गंध है, जलेबी के साथ सड़क की भी अपनी खास गंध है
बलिया में कच्चे आम की गंध है
नोएडा में सीमेंट की गंध उड़ाती हुई हवा की गंध
ग़ाज़ियाबाद में पेट्रोल-पसीने की गंध
पॉन्डीचेरी के समुद्र से उठती है स्ट्रॉन्ग बियर की गंध
देहरादून से ऊंचे-हरे-पेड़ों और गर्मियों में सूखी बरसाती नदियों की गंध आती है
हां सचमुच गंध एक स्मृति है, कभी-कहीं किसी ख़ास गंध से याद आ जाती है बरसों पुरानी कोई गंध, उससे जुड़ी कोई बात, कोई वाकया...
कोई पढ़ी गई किताब भी बस जाती है एक गंध की तरह हमारी स्मृतियों में।
जैसे बाबर से आती है घोड़ों के टापों से उडती धूल की गंध
टॉलस्टॉय के पुनरुत्थान से कात्या और उसकी साथिन कैदियों के पसीने की तेज़ गंध
माक्सिम गोर्की की मां से आती है रोटी की, समुद्र के नमक की गंध
पूर्वबेला में है प्रेम की गंध
रसूल हमजातोव के नाम पर खेतों की मेड़ पर पहाड़ी टोपी पहने सुस्ताते व्यक्ति की सांसों की गंध आती है
महमूद दरवेश के नाम पर रेगिस्तान की रात में चमकते तारों के बीच मेंडलिन की मीठी धुन की गूंज की गंध




1 comment:
बहुत सुन्दर प्रस्तुति!
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