
तो, अब तो आप ये मान गए न
कि आप बेहद मजबूर हैं
हां आप सरकार चुन सकते हैं
वोट किसे देना है ये तय कर सकते हैं
पर अपनी चुनी हुई सरकार को
हटाने का हक़ आप पर नहीं
सियासत के खेल में कोई विपक्ष नहीं
अपने घर का बिगड़ा बजट संभालने के लिए
रुपया-दो रुपया- पांच रुपया बचाने की जुगत में लगे रहते हैं
चाय पूरी नहीं आधी प्याली पीते हैं
हां बूंद-बूंद घड़ा भरता है
पर अब तो घड़ा बूंद-बूंद खाली हो चुका है
भारत की जनता के गले की आवाज़
सूख चुकी है
आंखें भी सूख गई हैं और सांसें भी
बोलते हैं तो लगता है
कि गला खर्र-खर्र कर रहा है
कुछ पढ़े लिखे लोग
पुराने हिंदी गाने गुनगुना ग़म गलत कर लेते हैं
अब तो हंसी भी नहीं आती...नींद क्यों रातभर नहीं आती
और एक वाकया भी सुनिए
किसी ने सुबह-सुबह अपना टूटा चश्मा दिखाया
शीशा टूटा था, बदलना जरूरी था
पर जेब की इजाज़त नहीं थी
एक बोला,
कोई ग्रह था, चश्मा तोड़ टल गया
दूसरा बोला, हां टल गया
पेट्रोल की कीमत यूं तो बढ़कर 100 रुपये तक हो जानी थी
पर चश्मा टूट गया और बेचारी निजी कंपनियां
सिर्फ दो रुपये तक ही कीमत बढ़ा पायीं
मजबूरी समझिए
सरकार की नहीं अपनी
और हंस लीजिए
व्यवस्था पर नहीं, खुद पर



9 टिप्पणियाँ:
कल के चर्चा मंच पर, लिंको की है धूम।
अपने चिट्ठे के लिए, उपवन में लो घूम।।
आप ने ठीक कहा अब हंसी भी नही आती शायद रोना आ जाये । कटौतियों के चलते ।
अपने पर ही हंस रहे हैं और कर भी क्या सकते हैं?
किसी ने सुबह-सुबह अपना टूटा चश्मा दिखाया
शीशा टूटा था, बदलना जरूरी था
पर जेब की इजाज़त नहीं थी
बहुत ही करारा तमाचा!
सुप्रभात!
नमस्कार!
मंहगाई पे इधर भी एक रचना पेश है ...
http://dilkejajbat.blogspot.com/2011/11/blog-post.html
एक दम सही कहा है..
करारा.
सुन्दर रचना.... सच्ची और खरी...
सादर...
बहुत जानदार व्यंग्य है आपका,मार्मिक,रोचक
और सटीक आज की व्यवस्था पर प्रहार
करता हुआ.
सुन्दर प्रस्तुति के लिए आभार,वर्षा जी.
मेरे ब्लॉग पर आप आयीं,बहुत अच्छा लगा.
फिर से आईयेगा,आपका इंतजार है.
वर्षा जी,
आपने बहुत सुंदर सटीक व्यंग..एकदम खरा..
बढ़िया पोस्ट ...
मेरे पोस्ट पर स्वागत है,
बहुत सुन्दर. अब खुद पर ही हंस लेते हैं.
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