01 October 2011

खंडहर को देखते हुए















ईंटें
जिनसे बीती सदियों के वक़्त की
सीलन भरी महक आती है

झरोखे
लगता है झांक रही होगी
उस दौर की कोई स्त्री
उसकी अंगुलियों के निशान
अब भी चिपके होंगे वहां

दरवाजे
जैसे लंबा लबादा पहाने कोई पुरुष
अभी-अभी गुजरा
उसकी रौबदार आवाज़ वहीं छूट गई
गूंजती है अब भी

जैसे कोई पुरानी चिड़िया
वहां ठहरी होगी कभी
उसकी धुन खंडहर की दीवार में
छिप गई कहीं
पर अब डरावनी लगती है

चारदीवारी में उग आए
पीपल, झाड़-झंखाड़ उसे
और पुरातन बनाते

उस पर जमी काई उसकी
उम्र को और बढ़ाती

धूल की कोई सौ दो सौ तीन सौ
चार-पांच-छ सौ साल पुरानी परतें
उन्हें हटाया नहीं सुखाया जाना चाहिए

अच्छा नहीं लगता
खंडहर की ऐतिहासिक दीवारों पर पुता
नया सीमेंट

ऐतिहासिक इमारतों से गुजरते हुए लगता है
जैसे बीते वक़्त से गुज़र रहे हों

8 टिप्पणियाँ:

मनोज कुमार said...

इस पृथ्वी को बचाकर रखना है तो विज्ञान और प्रद्योगिकी का सुनियोजित और संतुलित विकास होना चाहिए। प्राकृतिक संसाधनो का अनुशासित तरीके से इस्तेमाल होना चाहिए। ऊर्जा के वैकल्पिक स्रोतों का व्यवहार किया जाना चाहिए।

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

राष्ट्रपिता महात्मा गांधी और यशस्वी प्रधानमंत्री रहे स्व. लालबहादुर शास्त्री के जन्मदिवस पर उन्हें स्मरण करते हुए मेरी भावपूर्ण श्रद्धांजलि!
इन महामना महापुरुषों के जन्मदिन दो अक्टूबर की आपको बहुत-बहुत शुभकामनाएँ!

वाणी गीत said...

वाकई इन इमारतों से गुजरना उस समय को महसूसना है !

आशा जोगळेकर said...

सुंदर कविता ।
इन पुरानी इमारतों में इतिहास को तो महसूस किया जा सकता है पर इस धरोहर को ना सम्हालें जो कि हम नही समहाल रहे है ये धीरे धीरे खत्म हो जायेंगी ।

P.N. Subramanian said...

आपने मेरे ह्रदय को इस कविता में उंडेल दिया. आभार.

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

वाकई, यह सब हुआ होगा, पर कालचक्र कब रुकता है।

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

वर्षा,
आपको, परिजनों तथा मित्रों को दीपावली पर मंगलकामनायें! ईश्वर की कृपा आपपर बनी रहे।

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साल की सबसे अंधेरी रात में*
दीप इक जलता हुआ बस हाथ में
लेकर चलें करने धरा ज्योतिर्मयी

बन्द कर खाते बुरी बातों के हम
भूल कर के घाव उन घातों के हम
समझें सभी तकरार को बीती हुई

कड़वाहटों को छोड़ कर पीछे कहीं
अपना-पराया भूल कर झगडे सभी
प्रेम की गढ लें इमारत इक नई
********************

Dhiresh said...

Varsha , bahut achhi kavita hai, dost