
खाली वक़्त में घटती हैं
बहुत सारी घटनाएं
जब आप सोचते हैं
क्या करें, क्या न करें
बहुत कुछ हो रहा होता है
खुद-ब-खुद
कोई ऐसा ख्याल आ धमकता है
जो पहले कभी नहीं आया
आप किसी ऐसे शख्स से
फोन पर करते हैं लंबी बातचीत
जो कब से यादों की पोटली में
बंद था
खाली वक़्त में ही बनते हैं
काग़ज के हवाईजहाज़
खाली वक़्त में ही
बनती है काग़ज़ की कश्ती भी
बोलते हैं अगड़म-बगड़म-शगड़म
खाली वक़्त में ही गुनगुनाई जाती हैं
पुरानी धुनें
याद आती है
पहले कभी पढ़ी गई कोई किताब
में बंद कुछ दिल के करीब रहनेवाले वाकये
खाली वक़्त सहेजता है बहुत कुछ
हमेशा कुछ न कुछ करते रहना
तो मशीन बना देता है न
खाली वक़्त में ली गई
एक लंबी सांस
फेफड़ों को करती है तरोताजा
खाली वक़्त में ली गई अंगड़ाई
बदन की नसों को देती है खोल
दिमाग़ को जब नहीं करना होता
कोई काम
तब सचमुच वो करता है
कुछ बेहद जरूरी काम
खाली वक़्त खाली ही हो
ये जरूरी नहीं होता
(चित्र गूगल से साभार)



11 टिप्पणियाँ:
सुन्दर! कुल्हाडी को तेज़ करना समय की बर्बादी नहीं होती।
बहुत सुंदर!
wo khali waqt kai baar aap ko aap hone ka ehsaas de jata hai...kuchh unsuljhe sawaalon k jawaab de jata hai... aur apne aap par ji bhar ke muskurane ka ek mauka bhi de jata hai :-)
माधवी की टिप्पणी गलती से हट गई। उन्होंने अपनी एक कविता का लिंक भी दिया था। माधवी वो मैं तुम्हारे ब्लॉग पर पढ़ूंगी।
आप बहुत अच्छा लिखती है .. आपकी ये कविता बहुत ही शानदार बन पड़ी है ....
आपको बधाई !!
आभार
विजय
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कृपया मेरी नयी कविता " फूल, चाय और बारिश " को पढकर अपनी बहुमूल्य राय दिजियेंगा . लिंक है : http://poemsofvijay.blogspot.com/2011/07/blog-post_22.html
आपकी खूबसूरत भावों कीकि बरसात में
कुछ छण 'खाली वक्त'के बिताना
अच्छा लगा.
इतना अच्छा कि आपका फालोअर भी बन गया हूँ.
मेरे ब्लॉग पर आईयेगा 'खाली वक्त' में.
आपका हार्दिक स्वागत है,वर्षा जी.
खाली वक़्त में ली गई
एक लंबी सांस
फेफड़ों को करती है तरोताजा
खाली वक़्त में ली गई अंगड़ाई
बदन की नसों को देती है खोल
दिमाग़ को जब नहीं करना होता
कोई काम
तब सचमुच वो करता है
कुछ बेहद जरूरी काम
खाली वक़्त खाली ही हो
ये जरूरी नहीं होता
कितनी सच्ची बात । सुंदर कविता के लिये बधाई ।
सुन्दर रचना. अकेले में खाली वक्त न जाने क्या क्या करवाती रहती है. हमें रोज अनुभव हो रहा है.
♥
आपको सपरिवार
नवरात्रि पर्व की बधाई और शुभकामनाएं-मंगलकामनाएं !
-राजेन्द्र स्वर्णकार
आग कहते हैं, औरत को,
भट्टी में बच्चा पका लो,
चाहे तो रोटियाँ पकवा लो,
चाहे तो अपने को जला लो,
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