20 June 2011








सुनो तो चांद
तुम जरूर इठलाते होगे
कि कितने कवियों की कल्पना हो
प्रेम के प्रतीक हो
कि तुम तक पहुंचने के लिए
शब्दों की कितनी सीढ़ियां बनाईं जा चुकी हैं
कि तुम्हारी चांदनी पर
कितने मन तरसे-बरसे
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मेरे लिए तो तुम जैसे
एक हलचल हो
उथलपुथल मच जाती है
हसरतें, सपने, इच्छाएं, आशाएं, निराशाएं
कि जैसे समंदर में ज्वार-भाटा आता है न

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पर मज़ेदार बात
मेरी बेटी तुम्हें ढूंढ़ती है, बुलाती है
चां-मामा
आ जाओ
चां-मामा
आज नहीं आए
चां-मामा
वो रहे
तुम नहीं दिखते तो गुस्सा होती है
तुम उसे अच्छे नहीं लगते घटते हुए
या बादल के पीछे छिपे हुए
कई बार तो नींद में भी पुकारा उसने
तुम्हें चां-मामा
वो अभी दो साल की भी नहीं हुई
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तुम दरअसल सबके लिए अलग तरह से हो
धरती का बोझ हल्का करने की
एक उम्मीद
तुम्हारी उबड़-खाबड़ ज़मीन
जिस पर पानी ढूंढ़ने की
तमाम कोशिशें नाकाम हुईं अबतक

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हां याद आयी
तुम्हारी सबसे अच्छी कहानी
चांद पर चरखा कातती बुढ़िया नानी
तुम्हें क्या पता होगा...
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धरती तुम्हें लेकर बहुत बेसब्र है
तुम इतने नज़दीक जो हो
और तुमसे इतनी दूरी भी तो जरूरी है
तुम ये दूरी बनाए रखना
और इतनी नज़दीकी भी
ठीक है
चां मामा

3 टिप्पणियाँ:

शालिनी कौशिक said...

हां याद आयी
तुम्हारी सबसे अच्छी कहानी
चांद पर चरखा कातती बुढ़िया नानी
तुम्हें क्या पता होगा...
yad dila dee aaj aapne ye kahani varsha ji bahut sundar bhavnatmak prastuti.

neelima garg said...

very sweet....

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

चान्द अब नहीं इठलाता, दुनिया ने उसे मामू बना डाला।