वो आवाज़ कभी इस घर की
शान हुआ करती थी,
करघा चलता था
रोटी की फिक्र नहीं थी
लेकिन अब
जिस घर से वो आवाज़ आ रही हो समझिए
वो भूख की आवाज़ है और दर्द की आवाज़
बदरुनिशां ने अब भी अपने चरखे से
बीते वक़्त को संभाल रखा है
जब घर-घर चरखा होता था
घर-घर सूत काटाजाता था
अब वो चरखा बदरुनिशां से
बंद होने की इजाज़त मांग रहा है
कहीं तो ये महज निशानी बनकर भी रह गया है
किसी ऐसी ही बदरुनिशां के घर में झांककर
लिखा गया होगा....
'मां पत्थर उबालती रही तमाम रात
बच्चे फरेब खाकर चटाई पर सो गए'
चलिए उसकी थाली में अब और न झांका जाए
क्योंकि माड़ के साथ चावल का लुत्फ
सब नहीं उठा सकते
बुनकर रिक्शा खींचने लगा
बुनकर मज़दूरी करने लगा
बुनकर मोची बन गया
बुनकर, बुनकर न रहा
10 April 2011
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14 टिप्पणियाँ:
बहुत खूब!
'मां पत्थर उबालती रही तमाम रात
बच्चे फरेब खाकर चटाई पर सो गए'
चलिए उसकी थाली में अब और न झांका जाए
क्योंकि माड़ के साथ चावल का लुत्फ
सब नहीं उठा सकते
बहुत ही बढ़िया ....... प्रभावित करती हैं यथार्थ परक पंक्तियाँ .....
'मां पत्थर उबालती रही तमाम रात
बच्चे फरेब खाकर चटाई पर सो गए'
Excellent one!!
बहुत ही खुबसुरत रचना
रामनवमी पर्व की ढेरों बधाइयाँ एवं शुभ-कामनाएं
लेकिन अब
जिस घर से वो आवाज़ आ रही हो समझिए
वो भूख की आवाज़ है और दर्द की आवाज़
बहुत ही सशक्त कविता ....
पंक्तियाँ बार बार पढने का आग्रह करती हैं ......!!
बहुत ही बढ़िया
'मां पत्थर उबालती रही तमाम रात
बच्चे फरेब खाकर चटाई पर सो गए'
चलिए उसकी थाली में अब और न झांका जाए
क्योंकि माड़ के साथ चावल का लुत्फ
सब नहीं उठा सकते...
वह कितना दर्द उड़ेल दिया आपने..
पहली बार आपको पढ़ा , बहुत अच्छा लगा
कभी हमारे ब्लॉग में भी पधारे.. हमे खुशी होगी, नया जो हूँ...
avinash001.blogspot.com इंतजार रहेगा आपका
बुनकर बुनकर न रहा..बहुत खूब..बढ़िया अभिव्यक्ति..बधाई
समय की मार जिस पर पडती है वही जानता है या कवि हृदय जानता है।
समय की मार जिस पर पडती है वही जानता है या कवि हृदय जानता है।
shashakt....rachna..!!
ytharth ko ukera aapne
kabhi hamare blog pe aayen....ek nimantran!!
बहुत ही बढ़िया
विवेक जैन vivj2000.blogspot.com
aapne latest post pe comment kyon desable kar rakha hai???
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