हम बताते हैं मृतकों की कहानियां
वो मरा नहीं मारा गया
हम अपने शब्दों से उसकी हत्या
सिद्ध करते हैं
हम रुलाते हैं उसके परिजनों को
स्टोरी अच्छी बनती है
हम रोज़ ही बलात्कार के शिकार होते हैं
कभी आरुषि, कभी आरती के ज़रिये
बताते हैं पति ने पत्नी का गैंगरेप कराया
हम देखते हैं
धधकती आग, खाक हुआ सामान
दम घुटने से मरे दो मज़दूर
कहते हैं
आग अच्छी है
कोई बेचारा पिट रहा होता है
सड़क पर भीड़ से
या भीड़ फूंक रही होती है बसें
हम चिल्लाते हैं
विजुअल अच्छे हैं
दो बीघा ज़मीन के लिए
तीन का क़त्ल,छ को फांसी
बिजली का बकाया बिल भरने के लिए
मां ने बच्चों को गिरवी रखा
ख़बरें और भी हैं और हम रोज़
ख़बरें बनाते हैं
--
फिर आकर बैठ गई
ख़बरों के ढेर पर
एक का कैमरावर्क था
एक की रिपोर्ट थी
एक ने बाइट दी
एक ने ख़बर इंजेस्ट की
एक इस ख़बर को काटेगा
उस सबके बीच
एक इस ख़बर को बनाएगा
दिलचस्प, मज़ेदार
सनसनीखेज़ या इमोशनल
पहले पीलीभीत
फिर बदायूं, फिर बरेली
फिर बस्ती
फिर...
खाद्यान्न घोटाला
बनारस में धमाका
एक,जो थक गया है
रोज़ ख़बरें सिलते-उघाड़ते
एक, जो ख़बर बनाता है
पीड़ित महिला को इंसाफ दिलाने के लिए
जो घर जाकर खुद ही पीड़ित हो जाता है
एक
बड़ी-बड़ी बातें कर के, लिख के
जाता है घर को
चाय बनाता है
दिमाग़ की थकान उतारने के लिए
आखिर वो दिमाग़ की मज़दूरी करके आता है
चाय में अदरख डालता है
27 December 2010
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1 टिप्पणियाँ:
बहुत अच्छी ओर सच्ची कविता लगी जी यही सब तो हो रहा हे आज
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